डब्ल्यूएचओ की चेतावनी को गंभीरता से लें

*विश्व के सभी देश विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिशों,

सलाह और उसके द्वारा दी गई चेतावनी को बहुत गंभीरता से लेते हैं.

*लेकिन पर आश्चर्य है कि शराब पीने-पिलाने के काम में भारत सरकार

और राज्य सरकारें चेतावनी को पूरी तरह अनसुना कर रही हैं.

*वैश्विक तौर पर वर्ष 2016 में शराब से जुड़ी मौतों का आंकड़ा करीब तीस लाख था.

लक्ष्मीकांता चावला –
भारत सरकार और विश्व के सभी देश विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिशों, सलाह और उसके द्वारा दी गई चेतावनी को बहुत गंभीरता से लेते हैं। कोई भी बीमारी या महामारी हो, इस संगठन की ओर ही पूरी दुनिया देखती है। लेकिन पर आश्चर्य है कि शराब पीने-पिलाने के काम में भारत सरकार और राज्य सरकारें चेतावनी को पूरी तरह अनसुना कर रही हैं। कितनी भयानक सच्चाई है कि वैश्विक तौर पर वर्ष 2016 में शराब से जुड़ी मौतों का आंकड़ा करीब तीस लाख था। यह सबसे बड़ा और नवीनतम आंकड़ा है। संगठन के अनुसार, बहुत अधिक शराब पीने से जो मौतें हुई हैं उनकी संख्या एड्स, हिंसा और सड़क हादसों में होने वाली मौतों को मिलाने से प्राप्त आंकड़ों से भी ज्यादा है। इस रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में हर साल होने वाली बीस में से एक मौत शराब की वजह से होती है।
डब्ल्यूएचओ के शराब और अवैध नशीले पदार्थों पर नजर रखने वाले प्रोग्राम की मैनेजर करिना फेरिएरा बार्जेस का कहना है कि दुनिया भर में हर साल शराब पीने वाले तीस लाख लोगों की मौत होती है। यूरोप में एक-तिहाई मौतें शराब पीने से होती हैं। कोरोना से मरे लोगों में अधिकतर शराब पीते थे। इसमें भी पुरुष ज्यादा हैं। एक अध्ययन के अनुसार, प्रति दस मृत संक्रमितों में से एक व्यक्ति शराब पीता था।
अपनी रिपोर्ट में डब्ल्यूएचओ ने कहा कि करीब 23 करोड़ सत्तर लाख पुरुष और चार करोड़ साठ लाख महिलाएं शराब से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रही हैं। भारत में शराब पीने वाले लोगों को चेताने का काम दिल्ली के एम्स के डाक्टरों ने किया। उनका कहना है कि महामारी में शराब पीने का असर रोग प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ता है और संक्रमण का खतरा ज्यादा होता है।? लेकिन अफसोस कि पंजाब, केरल और अन्य राज्य राजस्व के लिए लोगों की जान जोखिम में डाल शराब की अधिक दुकानें खोलने पर आमादा हैं। केवल भारत में ही 2018 में शराब पीने से 2 लाख साठ हजार लोगों की मौत हुई थी। इसीलिए एम्स के डाक्टरों तथा डब्ल्यूएचओ ने कहा था कि लोगों की सेहत का ध्यान रखते हुए लाकडाउन में शराब की दुकानों का बंद रहना जरूरी है।
एक तरफ तो यह जीवन की रक्षा के लिए चेतावनी वाली रिपोर्ट है, पर दूसरी ओर पंजाब सरकार और कांग्रेस के प्रधान नवजोत सिंह सिद्धू ने तो कुछ सप्ताह पहले कहा कि पंजाब में शराब पीने-पिलाने का ऐसा प्रबंध करेंगे जिससे सत्तर हजार करोड़ रुपया वार्षिक कमाई हो सके। उनका यह कहना था कि आर्थिक समृद्धि से पंजाब सुखी होगा। लेकिन यह नहीं बताया कि शराब पीने से कितने लोग महामारी, बीमारी, मृत्यु का शिकार हो जाएंगे। कितनी हिंसा होगी, पारिवारिक क्लेश बढ़ेगा, परिवार टूटेंगे। माता-पिता में मतभेद से बचपन अनाथ हो जाएगा। लेकिन किसी ने नहीं कहा कि सिद्धू का शराब मॉडल हानिकारक और पंजाब के हित में नहीं है।
इस समय देश और दुनिया में बड़ी विकट स्थिति है। कोरोना महामारी बहुत तेजी से फैल रही है। भारत के पांच राज्यों में चुनाव है। शराब घातक होने की रिपोर्ट डब्ल्यूएचओ ने दी, पर सरकारों ने तो मुनाफे के लिये शराब पिलानी है। चुनाव के दिनों में राजनीतिक दल शराब बांटते हैं। लोग बीमार हों, नशे की हालत में परिवारों में या समाज में अशांति फैलाएं, दुर्घटनाओं में मारे जाएं या कोरोना पीडि़त हों, राजनेताओं को तो वोट चाहिए। यह लोकतंत्र का दुर्भाग्य है कि आजादी का अमृत महोत्सव मनाने वाली सरकारें इस वर्ष भी शराब की कोई कमी नहीं रखेंगी। उन्हें वोट चाहिए। कितना अच्छा हो अगर चुनाव आयोग शराब पीने-पिलाने वालों को चुनाव लडऩे से अयोग्य घोषित करे।
पिछले डेढ़ वर्ष से कोरोना महामारी के कारण गरीबी और अन्न-धन का अभाव झेल रहे भारतवासियों को राहत देने के लिए भारत सरकार मुफ्त अनाज बांटती है। यह सच है कि अनाज इतनी मात्रा में दिया जाता है कि कोई परिवार भूखा न रहे, लेकिन विडंबना यह है कि जिन परिवारों को गरीब होने के कारण अनाज दिया जाता है, उनमें एक बड़ी संख्या में शराब पीने वाले लोग भी हैं। देश के कुछ बुद्धिजीवी बड़े लंबे समय से यह आवाज उठा रहे थे कि जो लोग शराब स्वयं अपनी कमाई से खरीदकर पी सकते हैं वे अन्न क्यों नहीं खरीद सकते। क्या यह तर्कसंगत है कि अपनी कमाई से तो ये कुछ गरीब लोग शराब पी लें और इनका पेट भरने के लिए देश के लोगों के टैक्सों के पैसों से इन्हें मुफ्त में अनाज दिया जाए। भारत सरकार कानून बनाए कि जो लोग शराब पीते हैं उन्हें मुफ्त अनाज योजना से बाहर निकाल दिया जाए। वहीं चुनाव के दौरान कोई राजनीतिक पार्टी यह नहीं बताती कि चुनावों में मुफ्त शराब देने के लिए बजट की व्यवस्था कौन कर रहा है। चुनाव से पहले ही और महामारी की भयावहता के बीच यह जरूरी है कि शराब पीने वालों को नियंत्रित करने के लिए विशेष कदम उठाये जायें। इसका लाभ होगा कि कोरोना महामारी के दिनों में शराब न पीने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ेगी। बहुत अच्छा होगा कि डब्ल्यूएचओ के दिशा-निर्देशों पर चलते हुए शराब पीने-पिलाने और सरकारी गैर-सरकारी शराब की बिक्री पर रोक लगाई जाए।

मुख्यमंत्री के आदेश, बंधक बनी हुनर मंद बेटियां लौट रहीं अपने घर

*बेंगलुरु से मुक्त करायी गईं छह युवतियां

रांची, मुसाबनी की हुनरमंद अंजली पान अब खुश है। उसकी घर वापसी सुनिश्चित हो गई है। कुछ घंटों में वह अपने परिवार से मिल सकेगी। राज्य सरकार ने उसे बेंगलुरू से सुरक्षित मुक्त करा लिया है। अंजली पान जैसी ही पोटका प्रखंड की अन्य छह युवतियां अपने घर लौट रही हैं।

बंधक बनी थीं युवतियां

सिलाई में निपुण अंजली पान ने बताया कि कौशल विकास केंद्र डिमना से प्रशिक्षण लेने के बाद वह अपने सहयोगियों के साथ बेंगलुरु स्थित एक वस्त्र उद्योग में सिलाई – कढ़ाई का काम करने गयी थी। वहां पहुंचने पर सभी को काम पर लगा दिया गया।लेकिन, जिस तरह की सुविधा देने की बात कही गयी थी, वैसी नहीं दी गई। उनके साथ अच्छा व्यवहार भी नहीं किया जा रहा था। ना तो सही तरह से रहने की सुविधा दी और ना खाने की सुविधा मिली। वार्डेन से शिकायत करने पर वार्डेन द्वारा मारपीट की धमकी दी जाती थी। वे लोग घर लौटना चाहती थी, लेकिन आने नहीं दिया जा रहा था। उन्हें बंधक बना कर रखा गया था।

ऐसे हुई वापसी

युवतियों ने मामले की जानकारी कौशल विकास केंद्र डिमना को देने के साथ घर वापसी के लिए मुख्यमंत्री और स्थानीय विधायक से गुहार लगायी। मुख्यमंत्री के संज्ञान में मामला आते ही श्रम विभाग और पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्त को यथाशीघ्र युवतियों के सुरक्षित वापसी का आदेश दिया गया। इसके उपरांत श्रम   विभाग ने सक्रियता के साथ सभी के घर वापसी का मार्ग प्रशस्त किया।

 

अव्यावहारिक नीतियों से उपजा बेरोजगारी संकट

भरत झुनझुनवाला –
वर्तमान में अर्थव्यवस्था सुचारु रूप से चल रही दिखती है। जीएसटी की वसूली 1,30,000 करोड़ रुपये प्रति माह के नजदीक पहुंच गई है जो कि आज तक का अधिकतम स्तर है। कोविड के ओमीक्रोन वेरिएंट के आने के बावजूद शेयर बाजार का सेंसेक्स 5,500 से 6,000 के स्तर पर बना हुआ है। रुपये का मूल्य 70 से 75 रुपए प्रति डॉलर पर बीते कई वर्षों से स्थिर टिका हुआ है। तमाम वैश्विक संस्थाओं के आकलन के अनुसार, भारत विश्व की सबसे तेज बढऩे वाली व्यवस्था बन चुकी है। इन सब उपलब्धियों के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेरोजगारी को एक विशेष चुनौती बताया है। तमाम आकलन भी बताते हैं कि वर्तमान में देश की जनता द्वारा की जा रही खपत कोविड-पूर्व के स्तर से भी नीचे है। यानी जीएसटी की वसूली 1,30,000 करोड़ रुपये प्रति माह के स्तर पर पहुंचने और अर्थव्यवस्था के सुचारु रूप से चलता दिखने के बावजूद आम आदमी की खपत सपाट है और रोजगार नदारद हैं। इस समस्या की जड़ें नीति आयोग के चिंतन में निहित हैं।
वर्ष 2018 में नीति आयोग ने देश की 75वीं वर्षगांठ के लिए बनाए गए रोड मैप में कहा था कि औपचारिक रोजगार को बढ़ावा देना होगा और श्रम-सघन रोजगार को भी बढ़ावा देना होगा। नीति आयोग इन दोनों उद्देश्यों को एक साथ बढ़ावा देना चाहता है। आयोग समझता है कि यह दोनों उद्देश्य एक साथ मिलकर चल सकते हैं जैसे गाड़ी के दो चक्के मिल-जुलकर एक साथ चलते हैं। लेकिन वास्तव में इन दोनों उद्देश्यों के बीच में अंतर्विरोध है जैसे गाड़ी का एक चक्का आगे और दूसरा चक्का पीछे की तरफ चले तो गाड़ी डगमग हो जाती है। इसीलिए वर्तमान में रोजगार की गाड़ी डगमग हो चली है जैसा कि प्रधानमंत्री ने कहा है।
औपचारिक रोजगार और श्रम-सघन उद्योग के बीच पहला अंतर्विरोध श्रम की लागत का है। जैसे मान लीजिए नुक्कड़ पर मोमो बेचने वाले अनौपचारिक कर्मियों को हम औपचारिक छत्रछाया के नीचे ले आते हैं। अब इनका पंजीकरण होगा। पंजीकरण के बाद इन्हें अपने द्वारा बेचे गए मोमो का वजन नियमानुसार प्रमाणित करना होगा। इनके कार्य पर स्वास्थ्य निरीक्षक की नजर रहेगी। इन्हें अपनी दुकान को खोलने व बंद करने के समय निर्धारित करने होंगे। इन्हें सही क्वालिटी की प्लेट लगानी होगी। अपने सहायकों को दिए गए वेतन का प्रोविडेंट फंड काटना होगा और उन्हें न्यूनतम वेतन देना होगा। बैंक में जाकर प्रोविडेंट फंड जमा कराने में इनका समय लग जायेगा। सरकारी निरीक्षक महोदय को मुफ्त मोमो भी देने होंगे। इन तमाम कार्यों से इनके द्वारा बनाए गए मोमो की लागत बढ़ जाएगी। आज वर्तमान में यदि ये 7 रुपये में मोमो बेचते हैं जो औपचारिक रोजगारी बनने के बाद इनके द्वारा उत्पादित मोमो का मूल्य बढ़कर 10 रुपये हो जाएगा। इनके मोमो का मूल्य बढ़ जाने से इनकी जो कम दाम में बेचने की विशेषता है, वह समाप्त हो जाएगी। खरीदार 7 रुपये में नुक्कड़ पर मोमो खरीदने के स्थान पर 10 रुपये में मॉल में मोमो खरीदेगा क्योंकि नुक्कड़ पर भी मोमो का दाम अब मॉल की तरह 10 रुपये हो जाएगा। श्रम-सघन उद्योग की बलि औपचारिक रोजगार की वेदी पर चढ़ा दी जायेगी। दोनों उद्देश्य साथ-साथ नहीं चलेंगे।
औपचारिक उत्पादन में दूसरा संकट ऑटोमेटिक मशीनों का है। मॉल में मोमो बेचने वाले औपचारिक विक्रेता द्वारा डिश वॉशर लगाया जाएगा और ऑटोमेटिक ओवन होगा, जिसमें बिजली की खपत कम होगी। इन ऑटोमेटिक मशीनों के कारण मोमो के औपचारिक उत्पादन में रोजगार की संख्या कम होगी। इसलिए औपचारिक रोजगार के चलते श्रम-सघन नहीं बल्कि श्रम -विघन रोजगार उत्पन्न होंगे। रोजगार की संख्या कम होगी।
औपचारिक रोजगार में तीसरा संकट वित्तीय औपचारिकता यानी नोटबंदी और जीएसटी का है। नोटबंदी के बाद वर्ष 2017 में एक ओला के ड्राइवर से चर्चा हुई। उन्होंने बताया कि वे 35 वर्षों से चार महिलाओं को रोजगार दे रहे थे। उनसे घर पर कपड़ों में कसीदा करा रहे थे। नोटबंदी के बाद उनके क्रेताओं ने उन्हें नकद में पेमेंट करना बंद कर दिया। उनके पास व्यवस्था नहीं थी कि वे बैंक के माध्यम से कपड़े का पेमेंट ले सकें। यह भी कहा कि नकद माल खरीदने वाले ही नहीं रहे। अब बड़ी दुकानों में डेबिट कार्ड के पेमेंट से ही कपड़े खरीदे जा रहे हैं। उनका बाजार समाप्त हो गया। उन्होंने चारों महिलाओं को मुअत्तल कर दिया और स्वयं जीविका चलने के लिए ओला के ड्राइवर का काम शुरू कर दिया। लगभग यही स्थिति जीएसटी की है जीएसटी के कारण छोटे उद्योगों को तमाम कानूनी पेचों से जूझना पड़ रहा है, जिसके कारण उनका धंधा कम हो रहा है। यह बात तमाम रपटों में दिखाई पड़ती है।
इन तमाम कारणों से औपचारिक और श्रम-सघन रोजगार में सीधा अंतर्विरोध है। औपचारिक रोजगार के चलते श्रम-सघन उत्पादन का मूल्य बढ़ता है और ऑटोमेटिक मशीनों के उपयोग से श्रम का उपयोग घटता है। नोटबंदी और जीएसटी के कारण पुन: रोजगार घटता है। लेकिन नीति आयोग इस अंतर्विरोध को नहीं समझता अथवा नहीं समझना चाहता है इसलिए अनायास ही औपचारिक रोजगार को बढ़ावा देने में नीति आयोग ने देश में रोजगार ही समाप्त कर दिए हैं। न्यून स्तर के अनौपचारिक जीवन के स्थान पर नीति आयोग ने औपचारिक मृत्यु को देशवासियों के पल्ले में डाल दिया है, जिसके कारण प्रधानमंत्री ने कहा है कि रोजगार हमारे सामने प्रमुख चुनौती है।
संभवत: नीति आयोग भारत को विकसित देशों की तर्ज पर औपचारिक श्रम की तरफ धकेलना चाहता है। लेकिन आयोग इस बात को भूल रहा है कि वर्तमान में पश्चिमी देश भी अनौपचारिक रोजगार की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं। इसे वहां ‘गिगÓ रोजगार कहा जाता है जैसे श्रमिक घर में 3 घंटे बैठकर डेटा एंट्री इत्यादि करते हैं। इन गिग श्रमिकों को निर्धारित न्यूनतम वेतन से भी कम वेतन दिए जाते हैं, बिल्कुल उसी तरह जैसे अपने देश में नुक्कड़ पर मोमो विक्रेता को न्यूनतम वेतन से कम आय होती है। इसलिए हमें विकसित देशों के मोह को छोडऩा चाहिए। उनकी अंदरूनी रोजगार की परिस्थिति को समझना चाहिए। अपने देश में अनौपचारिक रोजगार को बढऩे देना चाहिए, नुक्कड़ के मोमो बेचने वाले को सम्मान देना चाहिए कि वह स्वरोजगार कर रहा है और सरकार पर मनरेगा का बोझ नहीं डाल रहा है। औपचारिक मृत्यु की तुलना में न्यून स्तर का अनौपचारिक जीवन ही उत्तम है। वर्तमान में अर्थव्यवस्था ऊपर से सुचारु रूप से चल रही दिखती है। अन्दर गड़बड़ है।

न्यायपालिका के सुझावों की फिर अनदेखी

अनूप भटनागर –
लड़कियों की विवाह की आयु बढ़ाकर लड़कों के समान करने के लिए संसद में विधेयक पेश करने वाली केंद्र सरकार के रुख से ऐसा लगता है कि समान नागरिक संहिता बनाने संबंधी संविधान का अनुच्छेद 44 अभी लंबे समय तक सुप्त प्रावधान ही रहेगा। इस निष्कर्ष पर पहुंचने की वजह केन्द्र सरकार का हलफनामा है जो उसने समान नागरिक संहिता के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय में लंबित जनहित याचिका में दाखिल किया है।
देश में तेजी से हो रहे सामाजिक बदलाव के परिप्रेक्ष्य में विभिन्न धर्मों, संप्रदायों और पंथों में प्रचलित विवाह और विवाह विच्छेद के कानून एवं रीति-रिवाज, तलाक की स्थिति में महिलाओं के अधिकार, गुजारा भत्ता और संपत्ति में उनके अधिकार जैसे मुद्दों के न्याय संगत समाधान के लिए अब समान नागरिक संहिता की जरूरत पहले से ज्यादा महसूस की जा रही है।
यही वजह है कि 1985 में शाहबानो प्रकरण से लेकर कई मामलों में न्यायपालिका ने संविधान के अनुच्छेद 44 में प्रदत्त समान नागरिक संहिता लागू करने पर विचार करने का सरकार को सुझाव दिया है। परंतु ऐसा लगता है कि महिलाओं के हितों की रक्षा के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने के न्यायपालिका के सुझावों के प्रति केंद्र गंभीर नहीं है या फिर वह इसमें राजनीतिक नफा-नुकसान की संभावनाएं तलाश रहा है। संविधान के अनुच्छेद 44 के अनुसार, ‘शासन भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिये एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा।’
बहुचर्चित शाहबानो प्रकरण में 1985 में उच्चतम न्यायालय ने समान नागरिक संहिता बनाने का सुझाव दिया था। इसके बाद भी हिन्दू व्यक्ति द्वारा पहली पत्नी से विवाह विच्छेद के बगैर ही धर्म परिवर्तन करके दूसरी शादी करने या फिर अंतरजातीय विवाह में उत्पन्न विवादों के समाधान में आड़े आने वाली परंपराओं और तीन तलाक की कुप्रथा से प्रभावित मुस्लिम महिलाओं के लिए गुजारा भत्ता जैसे मामले हल करने के लिए न्यायपालिका लगातार समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर जोर देती रही है।
लेकिन अब केन्द्र सरकार ने उच्च न्यायालय में दाखिल हलफनामे में साफ कर दिया है कि यह विधायिका के अधिकार क्षेत्र का मामला है जिस पर गहराई से अध्ययन की आवश्यकता है। सरकार ने यह हलफनामा भाजपा नेता और अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की जनहित याचिका में दाखिल किया है। उपाध्याय चाहते हैं कि न्यायालय समान नागरिक संहिता का मसौदा तीन महीने के भीतर तैयार करने का निर्देश केंद्र को दे।
केंद्र में दाखिल इस हलफनामे में कानून मंत्रालय ने कहा है कि संविधान के अंतर्गत सिर्फ संसद ही यह काम कर सकती है और न्यायालय कोई कानून विशेष बनाने का निर्देश विधायिका को नहीं दे सकता है। यह सर्वविदित है कि कानून बनाने का अधिकार संसद का ही है और इसीलिए शाहबानो प्रकरण से लेकर अभी तक कई मामलों में न्यायपालिका ने संसद को समान नागरिक संहिता लागू करने पर विचार करने का सुझाव दिया है। यह सुझाव वैसे भी महत्वपूर्ण है क्योंकि गोवा में पहले से ही समान नागरिक संहिता लागू है।
भारतीय जनता पार्टी हमेशा ही समान नागरिक संहिता की पक्षधर रही है और उसने अपने चुनावी घोषणा पत्र में इसे शामिल भी किया था। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने इस संवेदनशील विषय को जून, 2016 में विधि आयोग के पास भेजा था। हालांकि, उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश बलबीर सिंह चौहान की अध्यक्षता वाले विधि आयोग ने 31 अगस्त, 2018 को सरकार को भेजे अपने परामर्श पत्र में कहा था कि फिलहाल समान नागरिक संहिता की आवश्यकता नहीं है। विधि आयोग का मत था कि समान नागरिक संहिता बनाने में कुछ बाधाएं हैं। आयोग ने इनमें पहली बाधा के रूप में संविधान के अनुच्छेद 371 और इसकी छठवीं अनुसूची की व्यावहारिकता का उल्लेख किया था। अनुच्छेद 371(ए) से (आई) तक में असम, सिक्किम, अरुणाचल, नगालैंड, मिजोरम, आंध्र प्रदेश और गोवा के बारे में कुछ विशेष प्रावधान हैं, जिनके तहत इन राज्यों को कुछ छूट प्राप्त हैं।
विधि आयोग की राय है कि हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी और समाज के विभिन्न धर्मों और समुदायों में प्रचलित कानूनों में महिलाओं को ही कई तरह से वंचित किया गया है। और यही भेदभाव तथा असमानता की मूल जड़ है। इस समानता को दूर करने के लिये संबंधित पर्सनल लॉ में उचित संशोधन करके इनके कतिपय पहलुओं को संहिताबद्ध किया जाना चाहिए। उच्च न्यायालय में केन्द्र सरकार के हलफनामे के बाद एक बात तो साफ हो गयी है कि संविधान के अनुच्छेद 44 में प्रदत्त समान नागरिक संहिता का विषय फिलहाल जस का तस राजनीतिक मुद्दा ही बना रहेगा और निकट भविष्य में शायद ही प्रावधान अमल में आ सके।
इस बीच, अश्विनी उपाध्याय ने ‘एक देश-एक नागरिक संहिताÓ विषय पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिख कर इसे लागू करने के लाभ और इसे लागू नहीं करने से उत्पन्न हो रही समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित किया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि लड़कियों की विवाह की उम्र 18 साल से बढ़ाकर 21 साल करने संबंधी बाल विवाह निषेध संशोधन विधेयक के माध्यम से विभिन्न समुदायों में प्रचलित उनके निजी कानूनों में भी प्रस्तावित संशोधन करके समस्या का कुछ हद तक समाधान हो सकेगा। फिलहाल तो यह विधेयक संसदीय स्थायी समिति के पास विचारार्थ है।

मकर सक्रांति शुभ कार्यो की शुरुआत का पर्व !

डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट –
14 जनवरी को मकर राशि में सूर्य और शनि ग्रह का एक साथ होना बहुत ही दुर्लभ संयोग है। यह संयोग 29 साल के बाद पड़ रहा है। इससे पूर्व यह योग सन 1993 में बना था।मकर संक्रांति का पुण्यकाल मुहूर्त सूर्य के संक्रांति समय से 16 घटी पहले और 16 घटी बाद का पुण्यकाल होता है। इस बार पुण्यकाल 14 जनवरी को सुबह 7 बजकर 15 मिनट से शुरू हो जाएगा, जो शाम को 5 बजकर 44 मिनट तक रहेगा। इसमें स्नान, दान, जाप कर सकते हैं. वहीं स्थिर लग्न यानि समझें तो महापुण्य काल मुहूर्त 9 बजे से 10 बजकर 30 मिनट तक रहेगा। इसके बाद दोपहर 1 बजकर 32 मिनट से 3 बजकर 28 मिनट तक भी पुण्यकाल है।पंजाब, यूपी, बिहार और तमिलनाडु में यह समय नई फसल काटने का होता है। इसलिए किसान इस दिन को आभार दिवस के रूप में भी मनाते हैं। इस दिन तिल और गुड़ की बनी मिठाई बांटी जाती है। इसके अलावा मकर संक्रांति के दिन पतंग उड़ाने की भी परंपरा है।महाभारत काल में मकर संक्रांति दिसंबर में मनाई जाती थी। ऐसा उल्लेख मिलता है कि छ्ठी शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन के समय में 24 दिसंबर को मकर संक्रांति मनाई गयी थी। अकबर के समय में 10 जनवरी और शिवाजी महाराज के काल में 11 जनवरी को मकर संक्रांति मनाये जाने का उल्लेख मिलता है।
मकर संक्रांति की तिथि का यह रहस्य इसलिए है क्योंकि सूर्य की गति एक साल में 20 सेकंड बढ जाती है। इस हिसाब से 5000 साल के बाद संभव है कि मकर संक्रांति जनवरी में नहीं, बल्कि फरवरी में मनाई जाने लगे। मकर सक्रांति को देश मे विभिन्न नामो से जाना जाता है।तमिलनाडु में इसे पोंगल नामक उत्सव के रूप में मनाते हैं जबकि कर्नाटक, केरल तथा आंध्र प्रदेश में इसे केवल संक्रांति ही कहते हैं। मकर संक्रान्ति पर्व को कहीं-कहीं उत्तरायणी भी कहते हैं, यह भ्रान्ति है कि उत्तरायण भी इसी दिन होता है। किन्तु मकर संक्रान्ति उत्तरायण से भिन्न है। हिंदू धर्म में मकर संक्रांति का विशेष महत्व माना गया है। इस दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं। मकर संक्रांति के दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य का उत्तरायण होना बहुत ही शुभ माना जाता है। इस दिन गंगा नदी या पवित्र जल में स्नान करने का विधान है। साथ ही इस दिन गरीबों को गर्म कपड़े, अन्न का दान करना शुभ माना गया है। संक्रांति के दिन तिल से निर्मित सामग्री ग्रहण करने शुभ होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार असुरों पर भगवान विष्णु की विजय के तौर पर भी मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है।गरीब और असहाय लोगों को गर्म कपड़े का दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। इस माह में लाल और पीले रंग के वस्त्र धारण करने से भाग्य में वृद्धि होती है। माह के रविवार के दिन तांबे के बर्तन में जल भर कर उसमें गुड़, लाल चंदन से सूर्य को अर्ध्य देने से पद सम्मान में वृद्धि होने के साथ शरीर में सकारात्मक शक्तियों का विकास होता है। साथ ही आध्यात्मिक शक्तियों का भी विकास होता है।कहते है कि मकर संक्रांति के दिन भगवान विष्णु ने पृथ्वी लोक पर असुरों का संहार उनके सिरों को काटकर मंदरा पर्वत पर फेंका था। भगवान की जीत को मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। मकर संक्रांति से ही ऋतु में परिवर्तन होने लगता है। शरद ऋतु का प्रभाव कम होने लगता है और इसके बाद बसंत मौसम का आगमन आरंभ हो जाता है। इसके फलस्वरूप दिन लंबे और रात छोटी होने लगती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रांति के दिन सूर्यदेव अपने पुत्र शनिदेव के घर जाते हैं। ऐसे में पिता और पुत्र के बीच प्रेम बढ़ता है। ऐसे में भगवान सूर्य और शनि की अराधना शुभ फल देने वाला होता है।संक्रांति का यह पर्व भारतवर्ष तथा नेपाल के सभी प्रान्तों में अलग-अलग नाम व भांति-भांति के रीति-रिवाजों द्वारा भक्ति एवं उत्साह के साथ धूमधाम से मनाया जाता है।भारत में इसके विभिन्न नाम है छत्तीसगढ़, गोआ, ओड़ीसा, हरियाणा, बिहार, झारखण्ड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, राजस्थान, सिक्किम, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, पश्चिम बंगाल, गुजरात और जम्मू में मकर सक्रांति,तमिलनाडु मेंताइ पोंगल, उझवर तिरुनल गुजरात, उत्तराखण्ड में उत्तरायण, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब में माघी,असम में
भोगाली बिहु ,कश्मीर में शिशुर सेंक्रात ,उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार में खिचड़ी,पश्चिम बंगाल में
पौष संक्रान्ति ,कर्नाटक में मकर संक्रमण व पंजाब में लोहड़ी रूप में मनाया जाता है।इस खगोलीय परिवर्तन का स्वागत मकर सक्रांति रूप में हम करते है।साथ ही अपने बड़ो का सम्मान करने की परंपरा भी वर्षों से चली आ रही है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है।)

मकर संक्रांति का महत्व

कु. कृतिका खत्री –
–  मकर संक्राति के दिन सूर्य मकर राशी में प्रवेश करता है । हिन्दू धर्म में संक्रांति को भगवान माना गया है। भारतीय संस्कृति में मकरसंक्रांति का त्योहार आपसी कलह को मिटाकर प्रेमभाव बढ़ाने के लिए मनाया जाता है। इस दिन तिल गुड़ एक दुसरे को देकर आपसी प्रेम बढ़ाने का प्रयास किया जाता है। वर्तमान में सर्वत्र कोरोना महामारी के कारण सदा की भांति त्योहार मनाने में बाधा आ सकता है। तो भी इस आपातकाल में सरकार द्वारा बताए गए सभी नियमों का कठोरता से पालन कर यह त्योहार मनाया जा सकता है। यह त्योहार मनाते समय इसका महत्त्व, त्योहार मनाने की पद्धति, तिल गुड़ का महत्त्व, पर्व काल में दान का महत्त्व, अन्य स्त्रियों को हल्दी कुमकुम लगाने का आध्यात्मिक महत्त्व तथा इस दिन की जाने वाली धार्मिक विधियों की जानकारी इस लेख में देने का प्रयास किया है। हम इसका लाभ लेंगे।
तिथि – यह त्योहार तिथि वाचक न होकर अयन-वाचक है। इस दिन सूर्य का मकर राशि में संक्रमण होता है। वर्तमान में मकर संक्रांति का दिन 14 जनवरी है। सूर्य भ्रमण के कारण होने वाले अंतर को भरने ने लिए ही संक्रांति का दिन एक दिन आगे बढ़ाया जाता है। सूर्य के उत्सव को ‘संक्रांत’ कहते हैं। कर्क संक्रांति के उपरांत सूर्य दक्षिण की ओर जाता है और पृथ्वी सूर्य के निकट, अर्थात नीचे जाती है। इसे ही ‘दक्षिणायन’ कहते हैं। मकर संक्रांति के पश्चात सूर्य उत्तर की ओर जाता है और पृथ्वी सूर्य से दूर, अर्थात ऊपर जाती है। इसे ‘उत्तरायण’ कहते हैं। मकरसंक्रांति अर्थात नीचे से ऊपर चढने का उत्सव; इसलिए इसे अधिक महत्व है।
इतिहास – संक्रांति को देवता माना गया है। संक्रांति ने संकरासुर दैत्य का वध किया, ऐसी कथा है ।
तिल गुड़ का महत्व – तिल में सत्त्वतरंगें ग्रहण और प्रक्षेपित करने की क्षमता अधिक होती है । इसलिए तिलगुड का सेवन करने से अंत:शुद्धि होती है और साधना अच्छी होने हेतु सहायक होते हैं । तिलगुड के दानों में घर्षण होने से सात्त्विकता का आदान-प्रदान होता है । ‘श्राद्ध में तिल का उपयोग करने से असुर इत्यादि श्राद्ध में विघ्न नहीं डालते ।’ सर्दी के दिनों में आने वाली मकर संक्रांति पर तिल खाना लाभप्रद होता है । ‘इस दिन तिल का तेल एवं उबटन शरीर पर लगाना, तिल मिश्रित जल से स्नान, तिल मिश्रित जल पीना, तिल होम करना, तिल दान करना, इन छहों पद्धतियों से तिल का उपयोग करने वालों के सर्व पाप नष्ट होते हैं ।’ संक्रांति के पर्व काल में दांत मांजना, कठोर बोलना, वृक्ष एवं घास काटना तथा कामविषयक आचरण करना, ये कृत्य पूर्णत: वर्जित हैं ।’
त्यौहार मनाने की पद्धति – ‘मकर संक्रांति पर सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक पुण्य काल रहता है । इस काल में तीर्थ स्नान का विशेष महत्त्व हैं । गंगा, यमुना, गोदावरी, कृष्णा एवं कावेरी नदियोंके किनारे स्थित क्षेत्र में स्नान करने वाले को महापुण्य का लाभ मिलता है ।
मकर संक्रांति पर दिए गए दान का महत्व – मकर संक्रांति से रथ सप्तमी तक की अवधि पर्वकाल है। इस पर्व में किया गया दान और शुभ कार्य विशेष फलदायी होता है। धर्मशास्त्र के अनुसार इस दिन दान, जप और साथ ही धार्मिक अनुष्ठानों का अत्यधिक महत्व बताया गया है।
हल्दी और कुमकुम का आध्यात्मिक महत्व – हल्दी और कुमकुम लगाने से सुहागिन स्त्रियों में श्री दुर्गा देवी का अप्रकट तत्त्व जागृत होता है तथा श्रद्धा पूर्वक हल्दी और कुमकुम लगाने से यह जीव में कार्यरत होता है। हल्दी कुमकुम धारण करना अर्थात एक प्रकार से ब्रह्मांड में अव्यक्त आदिशक्ति तरंगों को जागृत होने हेतु आवाहन करना है । हल्दी कुमकुम के माध्यम से पंचोपचार करना अर्थात एक जीव का दूसरे जीव में उपस्थित देवता तत्त्व की पूजा करना है । हल्दी, कुमकुम और उपायन देने आदि विधि से व्यक्ति पर सगुण भक्ति का संस्कार होता है साथ ही ईश्वर के प्रति जीव में भक्ति भाव बढऩे में सहायता होती है ।
उपायन देने का महत्व तथा उपायन में क्या दें – ‘उपायन देना’ अर्थात तन, मन एवं धन से दूसरे जीव में विद्यमान देवत्व की शरण में जाना । संक्रांति-काल साधना के लिए पोषक होता है । अतएव इस काल में दिए जाने वाले उपायन से देवता की कृपा होती है और जीव को इच्छित फल प्राप्ति होती है । आजकल प्लास्टिक की वस्तुएं , स्टील के बर्तन इत्यादि व्यावहारिक वस्तुएं उपायन के रूप में देने के कारण उपायन देनेवाला तथा ग्रहण करने वाला दोनों के बीच लेन देन का सम्बन्ध निर्माण होता है । वर्तमान में अधार्मिक वस्तुओं के उपायन देने की गलत प्रथा आरम्भ हुई है इन वस्तुओं की अपेक्षा सौभाग्य की वस्तु जैसे उदबत्ती (अगरबत्ती), उबटन, धार्मिक ग्रंथ, पोथी, देवताओं के चित्र, अध्यात्म संबंधी दृश्य श्रव्य-चक्रिकाएं (ष्टष्ठह्य) जैसी अध्यात्म के लिए पूरक वस्तुएं उपायन स्वरूप देनी चाहिए । सात्विक उपायन देने के कारण ईश्वर से अनुसन्धान होकर दोनों व्यक्ति को चैतन्य मिलता है जिसके कारण ईश्वर की कृपा होती है।
मिटटी के बर्तनों (घडिया) के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का त्यौहार – सूर्य देव ने अधिक मात्रा में उष्णता देकर पृथ्वी के बर्फ को पिघलाने के लिए साधना (तपस्या) आरम्भ की । उस समय रथ के घोड़े सूर्य की गर्मी को सहन नहीं कर पा रहे थे और उन्हें प्यास लगी । तब सूर्यदेव ने मिट्टी के घड़े के माध्यम से पृथ्वी से जल खींचकर घोड़ों को पीने के लिए दिया; इसलिए संक्रांति पर घोड़ों को पानी पिलाने के कारण मटकों की प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए मिट्टी के बर्तनों की पूजा करने की प्रथा आरम्भ हुई। रथ सप्तमी के दिन तक सुहागिन महिलाऐं हल्दी कुमकुम के अवसर पर इन पूजित बर्तनों को एक-दूसरे को उपायन स्वरूप भेंट में देती हैं । मिट्टी के बर्तन (घडिय़ा) को अपनी अंगुलिओं के माध्यम से हल्दी-कुमकुम लगा कर घडि़ए पर धागा लपेटा जाता तथा उसमे गाजर, बेर, गन्ने के टुकड़े, मूंगफली, कपास, काले चने, तिल के लड्डू, हल्दी आदि वस्तु भरकर भेंट स्वरुप दिया जाता है ।
पतंग न उड़ाएं – इस काल में अनेक स्थानों पर पतंग उड़ाने की प्रथा है परन्तु वर्तमान में राष्ट्र एवं धर्म संकट में होते हुए मनोरंजन हेतु पतंग उडाना, ‘जब रोम जल रहा था, तब निरो बेला (फिडल) बजा रहा थाÓ, इस स्थिति समान है । पतंग उडाने के समय का उपयोग राष्ट्र के विकास हेतु करें, तो राष्ट्र शीघ्र प्रगति के पथ पर अग्रसर होगा और साधना एवं धर्मकार्य हेतु समय का सदुपयोग करने से अपने साथ समाज का भी कल्याण होगा ।

मुख्यमंत्री श्री हेमन्त सोरेन ने युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद जी की जयंती पर उन्हें शत-शत नमन किया

मुख्यमंत्री श्री हेमन्त सोरेन ने युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद जी की जयंती पर उन्हें शत-शत नमन किया। मुख्यमंत्री ने राष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर राज्यवासियों को शुभकामनाएं और बधाई दी।

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मुख्यमंत्री श्री हेमन्त सोरेन ने वर्चुअल माध्यम से सात नए पीएसए ऑक्सीजन प्लान्ट का उद्घाटन किया

*रांची में दो तथा जमशेदपुर, रामगढ़, देवघर चाकुलिया (पूर्वी सिंहभूम) और कुचाई  (सरायकेला- खरसावां) में एक -एक पीएसए

प्लान्ट अधिष्ठापित किए गए हैं

*सीमित संसाधनों के बीच बेहतर प्रबंधन से कोविड-19 को नियंत्रित करने का प्रयास

* लोगों को उनके घर के निकटवर्ती अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्रों में बेहतर चिकित्सीय सुविधा कराया जा रहा  उपलब्ध

 *सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जा रही स्वास्थ्य संरचनाओं का भविष्य में भी बेहतर इस्तेमाल सुनिश्चित हो – श्री हेमन्त सोरेन,

मुख्यमंत्री, झारखंड

रांची,कोविड-19 महामारी के बीच राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था को सुदृढ़ करने का प्रयास जारी है । इस कड़ी में स्वास्थ्य सुविधाओं का लगातार विस्तार हो रहा है। प्रखंड से लेकर जिला स्तर तक  स्वास्थ्य से संबंधित आधारभूत संरचना को मजबूत किया जा रहा है, ताकि लोगों को उनके घर के  निकटवर्ती अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्रों में बेहतर चिकित्सीय लाभ मिल सके ।  मुख्यमंत्री श्री हेमन्त सोरेन ने आज पाथ ऑर्गनाइजेशन के सहयोग से राज्य के विभिन्न अस्पतालों में सात नए पीएसए ऑक्सीजन प्लांट का ऑनलाइन उद्घाटन करते हुए कही । उन्होंने कहा कि सरकार के द्वारा जो भी स्वास्थ्य संरचनाएं खड़ी की गई हैं,  इसका कोरोना महामारी के अलावा भविष्य में भी बेहतर इस्तेमाल हो,  इसे सुनिश्चित करना जरूरी है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में हर दिन नई कड़ी जोड़ रहे हैं

मुख्यमंत्री ने कहा कि लगभग 2 वर्ष पहले जब कोविड-19  महामारी ने पूरी दुनिया में दस्तक दी थी तो झारखंड भी इससे अछूता नहीं था। हमारी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि कोरोना की जांच की सुविधा तक राज्य में उपलब्ध नहीं थी।लेकिन, आज हर जिले में पीएसए प्लांट अधिष्ठापित किए जा चुके हैं। कोरोना की जांच के लिए आरटीपीसीआर और अत्याधुनिक कोबास मशीन भी यहां है।  अस्पतालों में लगभग 25 हज़ार बेड उपलब्ध हैं। अब राज्य में ऑक्सीजन सपोर्टेड बेड, आईसीयू और वेंटीलेटर की पर्याप्त उपलब्धता  है। सरकार का प्रयास है कि चिकित्सीय संसाधनों की कमी से किसी मरीज को किसी तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़े।

तीसरी लहर को भी काबू में करने का प्रयास

मुख्यमंत्री ने कहा कि  सीमित संसाधनों के बीच बेहतर प्रबंधन के साथ हमने कोरोना के खिलाफ जंग शुरू की और सभी ने देखा है कि पहली दो लहरों को नियंत्रित करने में काफी हद तक कामयाबी हासिल की। अभी तीसरी लहर चल रही है और इसे भी काबू में करने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं ।

लोगों को जागरूक करना जरूरी

मुख्यमंत्री ने कहा कि कोविड-19 महामारी कब  तक जारी रहेगा । इसका आकलन करना बेहद मुश्किल है। लेकिन, ऐसे हालात में इसके संक्रमण से बचने के लिए हम सभी को सावधान तथा सतर्क रहना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि सरकार बेहतर चिकित्सीय व्यवस्था तो कर ही रही है । लेकिन, इसके साथ इस महामारी से बचाव के तौर- तरीके लोगों को बताने के साथ कोविड-19 दिशा निर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित कराना सबसे ज्यादा अहमियत रखता है।इसमें हम सभी का सहयोग बेहद जरूरी है।

 यहां अधिष्ठापित किए गए हैं पीएसए प्लांट

पाथ संगठन के सहयोग से रांची के सदर अस्पताल में दो, जमशेदपुर के मर्सी हॉस्पिटल में एक,  रामगढ़  ट्रॉमा सेंटर में एक, देवघर सदर अस्पताल में एक और चाकुलिया (पूर्वी सिंहभूम) तथा कुचाई (सरायकेला- खरसावां)  सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में एक -एक पीएसए ऑक्सीजन प्लांट अधिष्ठापित किए गए हैं ।

इस अवसर पर स्वास्थ्य मंत्री श्री बन्ना गुप्ता, मुख्य सचिव श्री सुखदेव सिंह, स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव श्री अरुण कुमार सिंह के अलावा मुख्यमंत्री आवासीय कार्यालय से मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव श्री राजीव अरुण एक्का और मुख्यमंत्री के सचिव श्री विनय कुमार चौबे के अलावा पाथ संगठन के कंट्री डायरेक्टर श्री नीरज जैन और स्टेट लीड,   झारखंड श्री अभिजीत सिन्हा ऑनलाइन मौजूद थे।

रजाई-कंबल या स्वेटर धोते समय कभी भी ना करें यह गलती

इस समय देशभर में कड़ाके की ठंड पड़ रही है। ऐसे में गिरते तापमान के साथ ही लोगों के कई सारे रजाई-गद्दे और स्वेटर बाहर निकल लिए हैं। ऐसे में ठंड से बचने के लिए लोग इसका खूब इस्तेमाल कर रहे हैं, हालाँकि रजाई- कंबल और स्वेटर को सही तरीके से ना धोने से यह जल्दी खराब हो जाते हैं, और इनके खराब होने से ना हमें गर्माहट मिलती है और इसको पहनने से खुजली भी होती है। अब आज हम आपको बताने जा रहे हैं वुलन कपड़े धोने का सही तरीका, जिससे उसकी सॉफ्टनेस, चमक और गर्माहट लंबे समय तक बनी रहेगी।
एक साथ ना धोएं खूब सारे कपड़े- वैसे तो कई बार वॉशिंग मशीन में हम ढेर सारे कपड़े एक साथ डाल देते हैं और उन्हें घंटों तक उन्हें मशीन में धुलने देते हैं। हालाँकि वूलन कपड़ों को धोते समय यह बात ध्यान रखें कि कभी भी मशीन को ओवरलोड न करे। केवल पांच से सात कपड़े ही मशीन में एक समय में धोना चाहिए, ताकि यह अच्छी तरीके से साफ हो सके।
हमेशा कपड़ों को उल्टा करके धोएं- वुलन कपड़ों को धोते समय इस बात का ध्यान रखें कि हमें इन कपड़ों को हमेशा उल्टा धोना चाहिए इससे कपड़े का रेशा खराब नहीं होता है और वुलन क्लॉथ सॉफ्ट बना रहता है।
पानी में ना गलाएं विंटर क्लोथ- वुलन कपड़ों को कभी भी ज्यादा देर तक सर्फ में गलाकर नहीं रखना चाहिए। कहा जाता है इससे इनका रंग निकल सकता है और सर्फ के पानी में ज्यादा देर रहने से इनकी सॉफ्टनेस भी खत्म हो जाती है। आप इन्हें बिना गलाएं तुरंत ही धो लें।
गर्म पानी में ना धोएं वुलन कपड़े- कई लोग गंदे कपड़े या वुलन कपड़े धोने के लिए गर्म पानी का इस्तेमाल करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसा करने से कपड़े ज्यादा अच्छे से साफ हो जाएंगे, जबकि स्वेटर या गर्म कपड़ों को गर्म पानी से धोने से इनकी सेल्फ लाइफ कम होती है। ऐसे में इन कपड़ों को हमेशा नॉर्मल पानी में ही धोना चाहिए।
बार-बार ना धोएं वुलन क्लॉथ- गर्म कपड़ों को बार-बार नहीं धोना चाहिए। ध्यान रहे एक वुलन कपड़े को कम से कम चार से पांच बार पहनने के बाद ही इसे धोएं।
रजाई और कंबल को धोते समय ध्यान रखेंगे बात- रजाई और कंबल को कभी भी वॉशिंग मशीन में नहीं धोना चाहिए, क्योंकि इससे इनकी रूई अपनी जगह से हिल जाती है और यह समतल नहीं रहती है। इस वजह से हमेशा रजाई और कंबल को हाथ से धोए। (एजेंसी)

थायराइड की समस्या से ग्रसित लोगों में अक्सर दिखने लगते हैं ऐसे शुरूआती लक्ष्ण

आज के जमाने में महिलाओं में थायराइड की समस्या काफी तेजी से बढती जा रही है। आज का खराब लाइफस्टाइल और गलत खानपान के कारण ये समस्यायें तेजी से शरीर में घर कर जाती है।
ऐसे में कई बार आपके गले का हिस्सा उभरा हुआ नजर आता है यदि इस डबल चिन को मोटापा समझ रहे हैं तो सावधान हो जाएं क्योंकि यह थायराइड का संकेत हो सकता है। जिसे थायराइड की बीमारी भी कहा जाता है।
गले में ये लक्षण थायराइड का संकेत
थाइराइड कैंसर के मामले में गले का इंफेक्शन, पेट की समस्या या श्वसन नली में एलर्जी भी हो सकती है। गर्दन में गांठ, सूजन, बार-बार ड्राईनेस, आवाज भारी होना, खराश हो रही है जो दवा से भी ना जाएं तो थायराइड की जांच करवा लें।
कैसे करें बीमारी पर कंट्रोल?
यदि आपको इस बीमारी का पता समय पर चल जाए तो दवा के सहारे इसे कंट्रोल किया जा सकता है। वहीं इसके साथ जरूरी है कि सही लाइफस्टाइल, अच्छी नींद, स्वस्थ खान-पान बीमारी को कंट्रोल करने के लिए सबसे जरूरी है। इसके साथ ही आप कुछ घरेलू नुस्खे भी अजमा सकते हैं जैसे-
1.आयरन से भरपूर चीजें खाएं, जैसे बादाम, हरी पत्तेदार सब्जियां, दालें, पालक, अंजीर, चुकंदर आदि।
2. रोज नाश्ते में 1 गिलास लौकी का जूस पीएं से भी फायदा होगा।
3. हल्दी वाला दूध पीने से भी थायराइड कंट्रोल में रहता है।
4. प्याज को दो हिस्सों में काटकर गले के आस-पास क्लॉक वाइज मसाज करें और रातभर के लिए छोड़ दें। लगातार ऐसे करने से थायराइड कंट्रोल होगा।

(एजेंसी)

सिर्फ स्वेटर पहनकर जाह्नवी कपूर ने दिखाईं ऐसी अदाएं, बढ़ा इंटरनेट का पारा!

बॉलीवुड एक्ट्रेस जाह्नवी कपूर अपने लुक्स और अदाओं के अलावा अपने ड्रेसिंग सेन्स के लिए जानी जाती हैं. हाल ही में जाह्नवी कपूर की एक तस्वीर वायरल हो रही है जिसमें अभिनेत्री सिर्फ स्वेटर में नजर आ रही हैं.
इस वायरल तस्वीर में जाह्नवी कपूर लाइट ब्राउन कलर का सिर्फ स्वेटर पहने हुई हैं. तस्वीर को देखकर साफ लग रहा है कि एक्ट्रेस ने इसके साथ कोई भी ट्राउजर या फिर पैंट नहीं पहनी है. तस्वीर में एक्ट्रेस बेहद खुश दिख रही हैं.
सामने आई इस तस्वीर में जाह्नवी कपूर कभी कुर्सी पर बैठकर पोज दे रही हैं तो कभी जमीन पर बैठकर अपनी अदाएं दिखा रही हैं. तस्वीर में एक्ट्रेस सटल मेकअप के साथ ओपन हेयर में नजर आईं जिसमें उनका लुक फैंस को काफी पसंद आ रहा है.
जाह्नवी कपूर का नाम यूं तो उनके को-एक्टर ईशान खट्टर के साथ जुड़ चुका है. ईशान के साथ वो कई बार स्पॉट भी की जाती थीं, लेकिन समय के साथ उनकी राहें अलग हो गईं. लेकिन इस बीच एक्ट्रेस का एक ऐसा वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वो एक लड़के के काफी करीब नजर आईं.
जाह्नवी कपूर कुछ समय पहले एक पार्टी की फोटो इंस्टाग्राम पर शेयर की थीं. इस पार्टी में उनके साथ उनकी छोटी बहन खुशी कपूर भी दिखाई दी थीं. जाह्नवी की इन तस्वीरों और वीडियो में एक्ट्रेस सफेद कलर की बॉडीकॉन ड्रेस पहने बेहद खूबसूरत दिखाई दीं. वहीं खुशी कपूर ब्लैक कलर की शर्ट में दिखीं. इसके साथ ही उन्होंने काले रंग की शर्ट और पैंट को ग्रे ओवरसाइज्ड ब्लेजर के साथ पेयर किया था. वहीं अक्षत अभिनेत्री को बाहों में भर कर बड़े ही प्यार से किस करते हुए भी दिखाई दिए. (एजेंसी)