नई दिल्ली – राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने आज (20 दिसंबर, 2025) हैदराबाद में ब्रह्मा कुमारीज शांति सरोवर द्वारा अपनी 21वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित ‘भारत का शाश्वत ज्ञान: शांति और प्रगति के मार्ग’ विषय पर सम्मेलन को संबोधित किया।
इस अवसर पर श्रीमती मुर्मु ने कहा कि वैश्विक समुदाय अनेक परिवर्तनों से गुजर रहा है। इन परिवर्तनों के साथ-साथ हमें मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, सामाजिक संघर्ष, पारिस्थितिक असंतुलन और मानवीय मूल्यों का क्षरण जैसी कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इसे देखते हुए सम्मेलन का विषय अत्यंत प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि हमें यह याद रखना चाहिए कि केवल भौतिक विकास से ही सुख और शांति नहीं मिलती। आंतरिक स्थिरता, भावनात्मक बुद्धिमत्ता और मूल्य-आधारित दृष्टिकोण आवश्यक हैं।
उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन ऋषि परंपरा ने हमें सत्य, अहिंसा और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व का संदेश दिया है। हमारी आध्यात्मिक विरासत विश्व की मानसिक, नैतिक और पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करती है। आधुनिकता और आध्यात्मिकता का संगम हमारी सभ्यता की सबसे बड़ी शक्ति है। वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा—संपूर्ण विश्व को एक परिवार मानने का विचार—आज वैश्विक शांति के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता है।
श्रीमती मुर्मु ने कहा कि आध्यात्मिकता सामाजिक एकता और राष्ट्रीय प्रगति की मजबूत नींव है। जब व्यक्ति में मानसिक स्थिरता, नैतिक मूल्य और आत्म-नियंत्रण विकसित होता है, तो उसका व्यवहार समाज में अनुशासन, सहिष्णुता और सहयोग को बढ़ावा देता है। आध्यात्मिक चेतना से प्रेरित लोग अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहते हैं और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास करते हैं। ऐसे व्यक्ति राष्ट्र निर्माण में भी सक्रिय योगदान देते हैं।
राष्ट्रपति को यह जानकर प्रसन्नता हुई कि ब्रह्मा कुमारीज संगठन दशकों से विभिन्न देशों में सार्वभौमिक भारतीय मूल्यों का प्रसार कर रहा है। यह संगठन लोगों में शांति और सकारात्मकता को बढ़ावा देकर समाज के नैतिक और भावनात्मक ताने-बाने को मजबूत कर रहा है। इस प्रकार, संगठन यह राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।
नई दिल्ली – राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने 18 दिसंबर 2025 को अल्पसंख्यक दिवस मनाया। इस अवसर पर छह अल्पसंख्यक समुदायों – मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी (ज़ोरोस्ट्रियन) के समुदायिक नेताओं ने अपने विचार व्यक्त किए।
माउंट कार्मेल स्कूल के अतिथि वक्ता डॉ. माइकल वी. विलियम्स ने सभा को याद दिलाया कि अल्पसंख्यक दिवस क्यों महत्वपूर्ण है, और शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में ईसाई समुदाय के लंबे और मौन योगदान को रेखांकित किया – ये ऐसी संस्थाएं हैं जो सांप्रदायिक सीमाओं से कहीं आगे बढ़कर सेवा करती हैं।
जामिया हमदर्द के मोहम्मद तौहीद आलम ने ‘सबका साथ, सबका विश्वास, सबका विकास’ के व्यापक ढांचे के भीतर अल्पसंख्यक कल्याण पर प्रकाश डाला और इस बात पर जोर दिया कि आज के शासन का मूल आधार समावेश है। खालसा कॉलेज के प्रोफेसर हरबंस सिंह ने गुरुबानी से प्रेरणा लेते हुए समझाया कि सहअस्तित्व और सामूहिक समृद्धि केवल नारे नहीं बल्कि जीवंत परंपराएं हैं।
आचार्य येशी फुंटसोक और डॉ. इंदु जैन ने बौद्ध और जैन समुदायों के सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में खुलकर बात की और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग से उचित समाधान की मांग की। अनुभवी पारसी नेता श्री मराज़बान नरीमन ज़ैवाला ने अल्पसंख्यक-केंद्रित कार्यक्रमों और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की भूमिका का विस्तार से वर्णन करते हुए अपने संबोधन का समापन किया। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग भारत के विभिन्न समुदायों को एक साझा नागरिक मंच पर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अल्पसंख्यक समुदाय के लिए खुला सत्र
अल्पसंख्यक समुदायों के काफी संख्या में प्रतिनिधियों ने इस कार्यक्रम में सक्रिय रूप से भाग लिया। खुले सत्र के दौरान, अल्पसंख्यक प्रमाण पत्र से लेकर विभिन्न सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन तक के मुद्दों पर कई प्रश्न उठाए गए। इस संवाद में सशक्त भागीदारी और संवाद के माध्यम से चिंताओं के समाधान के प्रति साझा प्रतिबद्धता दिखाई देती है।
एक समावेशी समाज का निर्माण
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (एनसीएम) की सचिव सुश्री अलका उपाध्याय ने अल्पसंख्यक समुदायों के उत्थान के उद्देश्य से चलाई जा रही सरकारी योजनाओं के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यक समुदायों ने राष्ट्र के समृद्ध सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक ताने-बाने में अमूल्य योगदान दिया है। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग एक समावेशी और न्यायसंगत समाज के निर्माण के लिए अथक प्रयास कर रहा है।
उन्होंने अल्पसंख्यक समुदायों के उत्थान के लिए शुरू की गई विभिन्न पहलों के बारे में बात की, जिनमें शिक्षा, कौशल विकास, वित्तीय सहायता और सशक्तिकरण से संबंधित योजनाएं शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि सरकारी कार्यों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि कोई भी पीछे न छूटे और सभी समुदायों को, चाहे उनकी पृष्ठभूमि कुछ भी हो, प्रगति और समृद्धि के समान अवसर प्राप्त हो। उन्होंने विभिन्न समुदायों के बीच निरंतर संवाद के महत्व को भी रेखांकित किया।
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की सचिव सुश्री उपाध्याय ने कहा कि अपनी स्थापना से ही राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के संरक्षण, कल्याण और सशक्तिकरण को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने आश्वासन दिया कि राज्य सरकारों, हितधारकों और अल्पसंख्यक समुदायों के साथ निरंतर संपर्क के माध्यम से अल्पसंख्यकों की आवाज़ सुनी जाती है, उनकी समस्याओं का समाधान किया जाता है और उनकी आकांक्षाओं को पूरा किया जाता है।
नई दिल्ली – प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने नई दिल्ली में आयोजित पारंपरिक चिकित्सा पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के दूसरे वैश्विक शिखर सम्मेलन के समापन समारोह की कुछ झलकियाँ साझा की हैं।
श्री मोदी ने एक्स पर एक अलग पोस्ट में कहा;
“पारंपरिक स्वास्थ्य सेवा में, हमारा ध्यान वर्तमान आवश्यकताओं से परे होना चाहिए। भावी पीढ़ियों के स्वास्थ्य और कल्याण के प्रति भी हमारी समान रूप से महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।”
“भारत कई स्तरों पर निरंतर प्रयासों के माध्यम से यह प्रदर्शित कर रहा है कि गंभीर परिस्थितियों में भी, पारंपरिक चिकित्सा एक प्रभावी और सार्थक भूमिका निभा सकती है।”
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के पारंपरिक चिकित्सा पर आयोजित वैश्विक शिखर सम्मेलन में आयोजित प्रदर्शनी में दुनिया भर से हर्बल उपचार और प्राचीन चिकित्सा प्रणालियों को प्रदर्शित किया गया जो आधुनिक स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में उनकी बढ़ती प्रासंगिकता और क्षमता को दर्शाता है।
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विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के पारंपरिक चिकित्सा पर आयोजित दूसरे वैश्विक शिखर सम्मेलन में अश्वगंधा पर एक स्मारक डाक टिकट जारी किया गया।
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आज विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अधानोम घेब्रेयेसस के साथ एक सार्थक चर्चा हुई। हमने समग्र स्वास्थ्य, निवारक देखभाल और कल्याण को बढ़ावा देने में पारंपरिक चिकित्सा की अपार संभावनाओं पर चर्चा की। साथ ही, पारंपरिक चिकित्सा में प्रमाण-आधारित पद्धतियों और वैश्विक सहयोग के महत्व पर भी बल दिया।
नई दिल्ली – भारत के कृषि निर्यात को एक महत्वपूर्ण बढ़ावा देते हुए, कर्नाटक के विजयपुरा जिले से जीआई-टैग प्राप्त ‘इंडी लाइम’ की 3 मीट्रिक टन (एमटी) मात्रा 19 दिसंबर 2025 को ओमान को निर्यात की गई। इसके साथ ही इस विशिष्ट खट्टे फल ने एक और वैश्विक बाजार में प्रवेश कर लिया।
ओमान को यह खेप भेजे जाने से पहले, 24 अगस्त 2025 को जीआई-टैग प्राप्त इंडी लाइम की 3-मीट्रिक टन(एमटी) की पहली निर्यात खेप दुबई भेजी गई थी। यूएई के बाजार में इस उत्पाद को उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली, जिसके परिणामस्वरूप दुबई को लगभग 12-एमटी का निर्यात किया गया, जो शुरुआती मात्रा से चार गुना अधिक है।
बाजार विविधीकरण के प्रयासों के तहत, जीआई-टैग प्राप्त इंडी लाइम की 350-किलोग्राम मात्रा को यूनाइटेड किंगडम भेजने के लिए भी एक और खेप को रवाना किया गया। अब तक विजयपुरा जिले से कुल मिलाकर लगभग 12.35-एमटी इंडी लाइम का निर्यात किया जा चुका है।
भारत–ओमान के बीच हाल ही में हस्ताक्षरित व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (CEPA)/मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को देखते हुए ओमान को इंडी लाइम का यह निर्यात और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। इस समझौते का उद्देश्य द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों को मजबूती प्रदान करना और भारतीय निर्यातकों के लिए बाजार तक पहुंच का विस्तार करना है।
इससे कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों, पशु उत्पादों सहित कई प्रमुख क्षेत्रों को लाभ मिलने की उम्मीद है, जिससे ओमानी बाजार में भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी। जीआई-टैग प्राप्त इंडी लाइम की सफल खेप सुदृढ़ व्यापार ढांचे के अंतर्गत भारतीय कृषि उत्पादों के लिए बढ़ते अवसरों को दर्शाती है।
अपनी विशिष्ट सुगंध, अधिक रस की मात्रा और लंबा शेल्फ लाइफ के लिए प्रसिद्ध इंडी लाइम की जीआई स्थिति ने इसे वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धी रूप से स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) जीआई-टैग प्राप्त कृषि उत्पादों के प्रचार, ब्रांडिंग और निर्यात को सक्रिय रूप से समर्थन दे रहा है। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों में क्षेत्र-विशिष्ट उत्पादों को बढ़ावा देना और वैश्विक गुणवत्ता एवं पादप-स्वास्थ्य (फाइटोसैनिटरी) मानकों का अनुपालन सुनिश्चित करना है।
विजयपुरा से जीआई-टैग प्राप्त इंडी लाइम के निर्यात से इस जीआई उत्पाद से जुड़े किसानों को प्रीमियम अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच मिली है, जिससे उनकी आय में सुधार हुआ है और घरेलू कीमतों में उतार-चढ़ाव पर निर्भरता कम हुई है।
अंतरराष्ट्रीय बाजारों में जीआई-टैग प्राप्त इंडी लाइम की लगातार सफलता उच्च गुणवत्ता वाले, क्षेत्र-विशिष्ट कृषि उत्पादों के एक विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता के रूप में भारत की क्षमता को सुदृढ़ करती है, इससे किसानों के लिए नए अवसर पैदा होते हैं और यह देश के कृषि-निर्यात पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूती प्रदान करती है।
नई दिल्ली – दूरसंचार विभाग, संचार मंत्रालय ने, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के सहयोग से आज नई दिल्ली में “एडवांसिंग सर्कुलर इकॉलॉमी इन द टेलीकॉम सेक्टर: इनेबलिंग पॉलिसी एंड प्रैक्टिस’’ शीर्षक से एक राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की। इस कार्यशाला में नीति निर्माता, उद्योग नेता, प्रौद्योगिकी प्रदाता, शिक्षाविद, अंतर्राष्ट्रीय संगठन और मूल्य श्रृंखला के हितधारक शामिल हुए, जिससे भारत के दूरसंचार क्षेत्र में परिपत्र अर्थव्यवस्था पद्धतियों को तेज़ी से अपनाने पर विचार-विमर्श किया जा सके।
इस कार्यशाला का उद्देश्य विभिन्न हितधारकों के दृष्टिकोणों को एक साथ लेकर आना और दूरसंचार मूल्य श्रृंखला में परिपत्रता को समाहित करने के लिए क्रियान्वयन योग्य मार्ग की पहचान करना था, जिसमें टिकाऊ उत्पाद डिजाइन, संसाधनों का कुशल उपयोग, जीवनचक्र प्रबंधन, डिजिटल उपकरण और वित्तपोषण तंत्र शामिल हैं। चर्चाएँ नीति ढांचे, उद्योग पद्धतियों और प्रौद्योगिकी समाधानों को समन्वित करने पर केंद्रित थीं, जिससे क्षेत्र की दीर्घकालिक स्थिरता और लचीलापन सुनिश्चित किया जा सके।
उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ. शिल्पी कर्मकार, परियोजना प्रबंधक, यूएनडीपी ने किया, जिन्होंने इसके उद्देश्यों का अवलोकन प्रस्तुत किया। स्वागत भाषण और संदर्भ प्रस्तुति डॉ. आशीष चतुर्वेदी, प्रमुख – एसीई, यूएनडीपी द्वारा दी गई। इसके बाद श्रीमती सुनीता वर्मा, वैज्ञानिक ‘जी’, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय; श्री कमेन्द्र कुमार, पूर्व निदेशक, टीसीआईएल और अध्यक्ष, तमिलनाडु दूरसंचार लिमिटेड; और डॉ. एंजेला लुसिगी, निवासी प्रतिनिधि, यूएनडीपी ने बहु-हितधारक सहयोग के महत्व को उजागर करते हुए विशेष भाषण दिया।
उद्घाटन भाषण देते हुए, श्री आर. एन. पालाई, सदस्य (प्रौद्योगिकी), डिजिटल कम्युनिकेशन्स कमीशन (डीसीसी) और भारत सरकार के कार्यकारी सचिव, दूरसंचार विभाग ने जोर दिया कि दूरसंचार में स्थिरता और परिपत्रता अब वैकल्पिक नहीं, बल्कि रणनीतिक आवश्यकता हैं। उन्होंने कहा कि, हालांकि भारतीय दूरसंचार क्षेत्र का भारत में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में दो प्रतिशत से भी कम का योगदान रहता है, लगभग 1.2 बिलियन उपयोगकर्ताओं तक इसकी पहुंच के चलते क्षेत्र पर पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार पद्धतियों को अपनाने में नेतृत्व करने की जिम्मेदारी है।
श्री पालाई ने कहा कि दूरसंचार आधुनिक अर्थव्यवस्था का अदृश्य आधारभूत ढांचा है और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी तथा विभिन्न क्षेत्रों में दक्षता सुधार करने वाला जलवायु कार्रवाई का मूक सक्षमकर्ता है। उन्होंने कहा कि दूरसंचार नेटवर्क में अक्षय ऊर्जा की ओर बदलाव नया सामान्य बनता जा रहा है, लेकिन स्थिरता केवल ऊर्जा दक्षता तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि और विस्तृत करके इसमें दूरसंचार उत्पादों तथा अवसंरचना के पूरे जीवनचक्र को शामिल किया जाना चाहिए। ई-कचरा प्रबंधन, राइट-टू-रिपेयर और टिकाऊ डिजाइन जैसे मुद्दों पर जोर देते हुए, उन्होंने भारत के व्यापक स्थिरता लक्ष्यों के अनुरूप पारंपरिक ‘उपयोग करो और फेंको’ मॉडल से पुनर्योजी तथा संसाधन-कुशल प्रणाली की ओर बदलाव का आह्वान किया।
डॉ. एंजेला लुसिगी ने अपने संबोधन में यूएनडीपी के भारत सरकार के साथ निकट सहयोग से काम करने का उल्लेख किया, जिसमें दूरसंचार क्षेत्र में परिपत्र अर्थव्यवस्था की ओर बदलाव को बढ़ावा देना भी शामिल है। उन्होंने दूरसंचार क्षेत्र में परिपत्र अर्थव्यवस्था योजना तैयार करने में दूरसंचार विभाग का समर्थन करने में यूएनडीपी की भूमिका पर जोर दिया।
डॉ. लुसिगी ने हितधारकों से आग्रह किया कि वे कार्यशाला का उपयोग दूरसंचार क्षेत्र के लिए ऐसा समयबद्ध रोडमैप विकसित करने के लिए करें, जिसे स्पष्ट नीति ढांचे, उद्योग प्रतिबद्धता, नवाचार और अवसंरचना में निवेश, मजबूत निगरानी तथा जवाबदेही तंत्र द्वारा समर्थित किया जाए।
कार्यशाला की एक मुख्य विशेषता श्री अरुण अग्रवाल, डीडीजी (सैटेलाइट), दूरसंचार विभाग द्वारा भारतीय दूरसंचार क्षेत्र में परिपत्र अर्थव्यवस्था कार्य योजना पर दी गई प्रस्तुति (प्रेज़ेंटेशन) थी। प्रस्तुति में नीतियों की दिशाओं और व्यावहारिक हस्तक्षेपों के सुझाव दिए गए, जिनमें टिकाऊ डिजाइन और निर्माण, दूरसंचार संपत्तियों का जीवनचक्र प्रबंधन, ई-कचरे में कमी, डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम को अपनाना और पारदर्शी तथा लचीली आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करना शामिल था।
तकनीकी विचार-विमर्श में सत्र I में “रीथिंकिंग द टेलीकॉम सप्लाई चेन फॉर सर्कुलैरिटी एंड सस्टेनिबिलिटी” पर पैनल चर्चा शामिल थी, जिसका संचालन श्री अरुण अग्रवाल ने किया, पैनल में श्री सुरेंद्र कुमार गोथरवाल, वैज्ञानिक ‘ई’, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय; डॉ. अंजलि तनेजा, नियामक मामलों की प्रमुख, इंटर आईकिया (IKEA) ग्रुप; सुश्री जसरूप संधू, उपाध्यक्ष, वोडाफोन आइडिया; डॉ. रेव प्राकाश, सलाहकार, जीआईज़ेड; और डॉ. संदीप चटर्जी, वरिष्ठ सलाहकार, एसईआरआई इंडिया शामिल थे। पैनल ने परिपत्रता हासिल करने के लिए सरकारी पहल, परिपत्र दूरसंचार आपूर्ति श्रृंखला में चुनौतियाँ और उन्हें दूर करने के लिए नीतिगत हस्तक्षेप, मूल्य श्रृंखला के प्रमुख पहलू, दूरसंचार में परिपत्रता के लिए डिजाइन और घटक संग्रहण, टिकाऊ खरीदारी, उद्योग में मौजूदा परिपत्र पद्धतियों आदि पर चर्चा की।
इसके बाद सत्र II में “डिजिटल टूल्स फॉर ट्रांज़ीशन टुवर्डस सर्कुलर इकॉनॉमी” पर पैनल चर्चा हुई, जिसका संचालन डॉ. शिल्पी कर्मकार, यूएनडीपी ने किया। पैनल में श्री राकेश देसाई, डीडीजी, टीईसी, दूरसंचार विभाग; सुश्री दीप्ति कपिल, अतिरिक्त निदेशक, सीपीसीबी; डॉ. प्रियंका कौशल, प्रोफेसर, आईआईटी दिल्ली; श्री प्रांशु सिंघल और करो सम्भव (संगठन) शामिल थे। सत्र में चर्चा भारत में अधिक परिपत्र दूरसंचार क्षेत्र का समर्थन करने वाले डिजिटल उपकरणों, ईपीआर कार्यान्वयन में डिजिटल प्लेटफॉर्म और डेटा टूल्स के उपयोग में सीपीसीबी के दृष्टिकोण, सामग्री पुनर्प्राप्ति और पारदर्शिता सुधारने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म और ब्लॉकचेन-आधारित ट्रेसबिलिटी, परिपत्रता सक्षम करने के लिए डेटा एनालिटिक्स, एआई और आईओटी (IoT) के एकीकरण आदि पर केंद्रित रही।
समापन सत्र में प्रतिभागियों ने जोर दिया कि भारत के दूरसंचार क्षेत्र को संवाद से क्रियान्वयन की ओर बढ़ना चाहिए। चर्चाओं में यह भी रेखांकित किया गया कि परिपत्रता को समन्वित पारिस्थितिकी-स्तरीय कार्रवाई के माध्यम से अपनाया जाना चाहिए और इसे मापनीय तथा चिरस्थायी व्यापार मॉडल द्वारा समर्थित किया जाना चाहिए। इसके अलावा, इन चर्चाओं में समन्वित, पारिस्थितिकी-स्तरीय कार्रवाई की आवश्यकता; सक्षम ढांचा बनाना; बहु-हितधारक सहयोग प्लेटफॉर्म को मजबूत करना; पायलट-टु-स्केल मार्गों को प्राथमिकता देना; साझा स्वामित्व—जहाँ सरकार दिशा और सक्षम परिस्थितियाँ प्रदान करे, उद्योग नवाचार के विकास और उसके अंगीकरण को आगे बढ़ाए, और साझेदार क्रियान्वयन, क्षमता निर्माण और वित्तपोषण का समर्थन करें, इस बात पर जोर दिया गया।
कार्यशाला का समापन दूरसंचार विभाग, यूएनडीपी और हितधारकों द्वारा सहयोग को मजबूत करने और भारत में अधिक परिपत्र, चिरस्थायी और लचीले दूरसंचार क्षेत्र की ओर तेज़ी से रुख़ करने की साझा प्रतिबद्धता के साथ हुआ।
नई दिल्ली – केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री श्री जगत प्रकाश नड्डा ने आज नई दिल्ली में नए उद्घाटन किए गए विश्व स्वास्थ्य संगठन के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्रीय कार्यालय (डब्ल्यूएचओ एसईएआरओ) भवन का दौरा किया और दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के देशों के मंत्रियों और वरिष्ठ प्रतिनिधियों के साथ बातचीत की।
उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए, श्री नड्डा ने क्षेत्रीय और वैश्विक स्वास्थ्य सहयोग को मजबूत करने के लिए भारत की अटूट प्रतिबद्धता पर जोर दिया। सामूहिक कदम उठाने के महत्व पर जोर देते हुए, उन्होंने कहा कि साझा सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों के लिए देशों के बीच मिलकर, तालमेल से और लगातार प्रयास करने की जरूरत है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि डब्ल्यूएचओ एसईएआरओ बिल्डिंग सिर्फ एक भौतिक ढांचा नहीं है, बल्कि यह दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के लोगों की साझा उम्मीदों और सामूहिक संकल्प का एक मजबूत प्रतीक है। उन्होंने कहा कि यह सुविधा सार्वजनिक स्वास्थ्य और भलाई को आगे बढ़ाने में साझेदारी और एकजुटता की भावना को दिखाती है, जो इस क्षेत्र में लगभग आधे अरब लोगों को सेवाएं देती है।
इस मौके पर, विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस एडहानोम घेब्रेयेसस ने डब्ल्यूएचओ एसईएआरओ भवन को मानवता की सेवा के लिए साझा मकसद और सामूहिक प्रतिबद्धता का एक मजबूत प्रतीक बताया। उन्होंने क्षेत्रीय कार्यालय की मेजबानी करने के लिए भारत सरकार और प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का दिल से आभार व्यक्त किया। डॉ. टेड्रोस ने कहा कि यह नई सुविधा क्षेत्रीय और वैश्विक दोनों स्तरों पर सार्वजनिक स्वास्थ्य को आगे बढ़ाने में विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारत सरकार के बीच स्थायी और भरोसेमंद साझेदारी का सबूत है।
इस कार्यक्रम में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण और आयुष राज्य मंत्री श्री प्रतापराव जाधव, केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, डब्ल्यूएचओ दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के सदस्य देशों के प्रतिनिधि, शोधकर्ता और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
नई दिल्ली – प्रथम परीक्षण पाठ्यक्रम (मानवरहित हवाई प्रणाली) [1 टीसी(यूएएस)] और 25वें उत्पादन परीक्षण पायलट (पीटीपी) पाठ्यक्रम का समापन समारोह 19 दिसंबर, 2025 को विमान एवं प्रणाली परीक्षण प्रतिष्ठान (एएसटीई) स्थित वायु सेना परीक्षण पायलट स्कूल में आयोजित किया गया।
इस अवसर पर एयर मार्शल के.ए.ए. संजीव, वीएसएम, महानिदेशक (विमान) मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। समारोह में भारतीय वायु सेना, डीआरडीओ, एचएएल, सोसाइटी ऑफ एक्सपेरिमेंटल टेस्ट पायलट्स (एसईटीपी) और सोसाइटी ऑफ फ्लाइट टेस्ट इंजीनियर्स (एसएफटीई) के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने भी सहभागिता की।
समारोह के दौरान मेधावी छात्र अधिकारियों को उनकी उत्कृष्ट उपलब्धियों के लिए ट्राफियां प्रदान की गईं। पीटीपी और टीसी (यूएएस) पाठ्यक्रमों से स्नातक होने वाले अधिकारी उत्पादन विमानों की परीक्षण उड़ान गतिविधियों के साथ विकासाधीन स्वदेशी मानवरहित विमानों एवं प्रणालियों के परीक्षण कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाएंगे। इससे रक्षा विमानन क्षेत्र में ‘आत्मनिर्भरता’ के प्रयासों को और अधिक गति मिलेगी।
विमान एवं प्रणाली परीक्षण प्रतिष्ठान (एएसटीई) के तत्वावधान में स्थापित एयर फोर्स टेस्ट पायलट्स स्कूल (एएफटीपीएस) देश का एकमात्र संस्थान है, जो फिक्स्ड विंग, रोटरी विंग और मानवरहित हवाई प्रणालियों के लिए प्रायोगिक व उत्पादन उड़ान परीक्षण दलों को प्रशिक्षण प्रदान करता है।
एएफटीपीएस ने वर्षों के दौरान अत्यंत कुशल परीक्षण दल तैयार किए हैं, जिन्होंने न केवल भारत की रक्षा विमानन परियोजनाओं में, बल्कि प्रतिष्ठित गगनयान कार्यक्रम सहित अंतरिक्ष से जुड़ी परियोजनाओं में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस संस्थान ने मित्र देशों के अधिकारियों को भी प्रशिक्षण प्रदान किया है।
अब तक एएफटीपीएस द्वारा कुल 47 फ्लाइट टेस्ट कोर्स, 24 प्रोडक्शन टेस्ट पायलट कोर्स और 4 आरपीए टेस्ट कोर्स सफलतापूर्वक संपन्न कराए जा चुके हैं।
यह उल्लेखनीय है कि एएफटीपीएस विश्व के कुछ चुनिंदा मान्यता प्राप्त टेस्ट पायलट स्कूलों में से एक है, जिसके कार्य एवं प्रतिष्ठा को सोसाइटी ऑफ एक्सपेरिमेंटल टेस्ट पायलट्स (एसईटीपी), सोसाइटी ऑफ फ्लाइट टेस्ट इंजीनियर्स (एसएफटीई) और एयरोनॉटिकल सोसायटी ऑफ इंडिया (एएसआई) जैसे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय निकायों द्वारा मान्यता प्राप्त है।
नई दिल्ली – जम्मू और कश्मीर सिर्फ प्राकृतिक सौंदर्य से समृद्ध एक क्षेत्र मात्र नहीं है; बल्कि प्राचीन काल से ही यह भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और दार्शनिक चेतना का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। इसी मूल भाव को रेखांकित करते हुए ‘संस्कृति: जम्मू और कश्मीर’ शीर्षक से एक महत्वपूर्ण फिल्म और कॉफी टेबल बुक का लोकार्पण इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) में किया गया। इस कार्यक्रम का आयोजन आईजीएनसीए के मीडिया केंद्र द्वारा किया गया। इस फिल्म का निर्माण आईजीएनसीए ने किया है। फिल्म के लेखक एवं सह-निर्माता श्री राजन खन्ना हैं, जबकि इसके निर्देशक और संपादक शिवांश खन्ना हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने की। इस अवसर पर वरिष्ठ लेखक एवं प्रसारक श्री गौरीशंकर रैना, फिल्म के लेखक श्री राजन खन्ना तथा मीडिया केंद्र के नियंत्रक श्री अनुराग पुनेठा उपस्थित थे। ‘संस्कृति: जम्मू और कश्मीर’ विषय पर एक सार्थक पैनल चर्चा भी आयोजित की गई, जिसमें डॉ. सच्चिदानंद जोशी, श्री राजन खन्ना और श्री गौरीशंकर रैना ने अपने विचार साझा किए।
डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि ‘संस्कृति: जम्मू और कश्मीर’ में दिखाए गए कई स्थानों पर शूटिंग करना आसान नहीं था, क्योंकि ये क्षेत्र न सिर्फ भौगोलिक रूप से दुर्गम इलाके हैं, बल्कि हाल के दिनों में वहां पहुंचना भी बहुत मुश्किल हो गया है। इनमें से कई स्थानों की तस्वीरें बहुत कम देखने को मिलती हैं। फिल्म में ऐसे दुर्लभ स्थलों पर किए गए शूट के दृश्य शामिल हैं। फिल्म के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने और खत्म करने तथा हमारी परंपरागत आस्थाओं को मिटाने के निरंतर प्रयासों के बीच यह फिल्म एक प्रकाशस्तंभ की तरह खड़ी होगी। यह बताएगी कि हमारी परंपराएं क्या हैं और हमारा इतिहास क्या है? इस फिल्म के माध्यम से वे युवा, जो जम्मू और कश्मीर के वास्तविक इतिहास को नहीं जानते हैं लेकिन उसे जानना-समझना चाहते हैं, निश्चित रूप से जुड़ सकते हैं।
आखिर में, उन्होंने फिल्म के निर्देशक शिवांश खन्ना से आग्रह किया कि वे महत्वपूर्ण मंदिरों के कुछ प्रभावशाली शॉट्स और दृश्य छोटे रील्स के रूप में प्रसारित करें। इससे लोगों की रुचि पूरी फिल्म देखने में बढ़ेगी और इसके व्यापक प्रचार में भी सहायता मिलेगी।
फिल्म के लेखक श्री राजन खन्ना ने कहा कि जिस प्रकार शरीर और आत्मा का संबंध होता है, उसी प्रकार राष्ट्र, संस्कृति और भूगोल का भी संबंध होता है। शरीर नश्वर है, लेकिन राष्ट्र और संस्कृति शाश्वत हैं। भारत फूलों के एक गुलदस्ते की तरह है और उसमें जम्मू-कश्मीर की संस्कृति एक विशिष्ट पुष्प के समान है, जिसमें अध्यात्म, इतिहास और चिंतन समाहित है। जब कोई इस क्षेत्र की यात्रा करता है, तो वह सिर्फ मंदिरों के दर्शन भर नहीं करता, बल्कि भारतीय संस्कृति की नींव बनाने वाले वेदों के भजन वहां लिखे हुए हैं, और उनकी संपूर्ण दार्शनिक परंपरा का अनुभव किया जा सकता है। हमारे पूर्वजों द्वारा बनाई गई महान संस्कृति की झलक जम्मू और कश्मीर में साफ दिखाई देती है।
उन्होंने आगे कहा कि कश्मीर का नाम आते ही प्रायः चर्चा आतंकवाद, जिहाद या लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों के इर्द-गिर्द घूमती है। लेकिन जब कश्मीर पर बात होती है, तो इसके 10,000 वर्ष पुराने इतिहास का उल्लेख क्यों नहीं होता? विश्व के प्राचीनतम नगरों में से एक माने जाने वाले अनंतनाग पर चर्चा क्यों नहीं होती? कश्मीर का इतिहास सिर्फ 1339 से 1819 की अवधि तक ही क्यों सीमित कर दिया गया है? कश्मीर का इतिहास ऋग्वेद से भी जुड़ा हुआ है। यदि हम स्वयं अपनी सभ्यतागत नींव को पुनः स्थापित नहीं करेंगे, तो हम किसे दोष देंगे? भविष्य भी हमें माफ नहीं करेगा।
श्री गौरीशंकर रैना ने कहा कि इस प्रकार की फिल्म बनाना अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य है। उन्होंने स्वयं इस प्रक्रिया से गुजरते हुए अनुभव किया है कि विशेष रूप से मंदिरों पर फिल्म बनाना कितना कठिन होता है, क्योंकि इसके लिए अनेक अनुमतियों की आवश्यकता होती है और कई बार ऐसे स्थानों तक पहुंचना पड़ता है, जहां जाना काफी मुश्किल होता है। इसमें अनेक प्रकार की कठिनाइयां आती हैं। उन्होंने आगे कहा कि ऐसी फिल्मों से जुड़ा शोध कार्य भी बहुत ज़्यादा समय लेने वाला और परिश्रमपूर्ण होता है। आज इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया का युग है और ऐसे समय में फिल्म एक अत्यंत प्रभावशाली माध्यम है, जिसके जरिए सार्थक कहानियों को आम-जन तक पहुंचाया जा सकता है।
इससे पहले अपने उद्घाटन वक्तव्य में श्री अनुराग पुनेठा ने कहा कि जब भी कोई फिल्म ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से किसी विषय का दस्तावेजीकरण करती है, तो वह एक अत्यंत महत्वपूर्ण काम करती है। विशेष रूप से ऐसे समय में, जब पिछले तीन-चार दशकों से कश्मीर को मुख्यतः एक संघर्ष क्षेत्र के रूप में दिखाया गया है, तब आईजीएनसीए और फिल्म द्वारा दृश्य के माध्यम से देश को यह बताना बहुत आवश्यक है कि जम्मू और कश्मीर की एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है, जो आज भी जीवित है। वहां की वास्तुकला हमारी सामूहिक स्मृति का अभिन्न अंग है। जो समाज अपनी विरासत को भूलकर बाकी सब कुछ याद रखता है, वह गंभीर संकट का सामना करता है। यह फिल्म उस स्मृति को फिर से सबके सामने वापस लाने का एक छोटा सा प्रयास है।
अंत में, श्री पुनेठा ने वक्ताओं, अतिथियों और उपस्थित लोगों के प्रति आभार करते हुए अपना भाषण समाप्त किया। कार्यक्रम का संचालन मीडिया केंद्र के श्री नरेंद्र सिंह ने किया।
फिल्म के बारे में
फिल्म ‘संस्कृति: जम्मू और कश्मीर’ जम्मू और कश्मीर के मनोहारी नजारों की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इसकी शुरुआत क्षेत्र की प्राचीन आध्यात्मिक चेतना के शांत और गहन स्मरण से होती है—एक ऐसी भूमि जिसे इतिहासकार कल्हण ने अपनी ‘राजतरंगिणी’ में असंख्य मंदिरों से सुसज्जित बताया था। आज भी इनमें से कुछ मंदिर अपनी गरिमामय उपस्थिति के साथ खड़े हैं, जबकि कई अन्य खंडहरों के रूप में समय और ऐतिहासिक उथल-पुथल के मूक साक्षी बने हुए हैं।
सशक्त और जीवंत दृश्यों के माध्यम से यह फिल्म सिख और डोगरा शासकों द्वारा मंदिरों और धार्मिक स्थलों के पुनरुद्धार के प्रयासों को सामने लाती है। यह श्रीनगर के हरवन मठ में आयोजित चतुर्थ बौद्ध संगीति(परिषद) की दार्शनिक और बौद्धिक विरासत के साथ-साथ गुरु हरगोबिंद जी के आगमन से जुड़ी सिख परंपरा को भी रेखांकित करती है।
फिल्म जम्मू और कश्मीर क्षेत्र की उन कम-ज्ञात आध्यात्मिक परंपराओं पर भी प्रकाश डालती है, जिन्हें ज्यादातर नजरअंदाज किया गया है- पहलगाम के प्राचीन ममलेश्वर मंदिर से लेकर गुलमर्ग के आस-पास के भूले हुए तीर्थस्थलों और जम्मू के ऐतिहासिक मंदिरों तक। ‘संस्कृति: जम्मू और कश्मीर’ एक सिनेमाई पुनःखोज के रूप में उभरती है, जो दर्शकों को एक लंबे समय से दबाई गई सांस्कृतिक और आध्यात्मिक कहानी से फिर से जुड़ने के लिए आमंत्रित करती है। यह फिल्म दर्शकों को उस भूमि से परिचित कराती है, जहां हर पत्थर अपने भीतर यादों, भक्ति और सांस्कृतिक निरंतरता का भार समेटे हुए है।
नई दिल्ली – महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के लिए संसद सदस्यों की संसदीय परामर्श समिति की बैठक आज नई दिल्ली में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती अन्नपूर्णा देवी की अध्यक्षता में आयोजित की गई। बैठक में मिशन वात्सल्य योजना पर चर्चा हुई।
महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती सावित्री ठाकुर भी उपस्थित थीं। लोकसभा और राज्यसभा दोनों के संसद सदस्यों ने बैठक में भाग लिया, जिनमें डॉ. बच्छाव शोभा दिनेश, श्रीमती जोबा मांझी, डॉ. सुधा मूर्ति और श्रीमती मंजू शर्मा शामिल थीं, जिन्होंने अपने विचार और अवलोकन साझा किए।
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के सचिव श्री अनिल मलिक ने समिति को मिशन वात्सल्य योजना के उद्देश्यों, कार्यक्षेत्र और प्रगति के बारे में जानकारी दी। इसके बाद महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के संयुक्त सचिव श्री अजीत कुमार ने विस्तृत प्रस्तुति दी।
बैठक के दौरान, संसद सदस्यों ने देश भर में मिशन वात्सल्य के कार्यान्वयन को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से बहुमूल्य सुझाव और विचार साझा किए। श्रीमती अन्नपूर्णा देवी ने रचनात्मक सुझावों के लिए संसद सदस्यों को धन्यवाद दिया और अधिकारियों को इन सुझावों की जांच करने और उन्हें प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री ने जमीनी स्तर पर जागरूकता फैलाने और भागीदारी के महत्व पर जोर देते हुए सांसदों से अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में जाकर योजना के बारे में जागरूकता बढ़ाने का आग्रह किया। उन्होंने सांसदों को जमीनी स्तर पर सामने आने वाली चुनौतियों पर अपनी प्रतिक्रिया साझा करने और उन्हें उजागर करने के लिए भी प्रोत्साहित किया, ताकि मंत्रालय लक्षित लाभार्थियों तक सेवाओं की सुचारू और प्रभावी डिलीवरी सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय कदम उठा सके।
महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती सावित्री ठाकुर के समापन भाषण के साथ बैठक समाप्त हुई, जिसमें उन्होंने सभी सदस्यों को उनसे प्राप्त बहुमूल्य प्रतिक्रियाओं और सुझावों के लिए धन्यवाद दिया।
नई दिल्ली – जनजातीय कार्य मंत्रालय (MoTA) ने राष्ट्रीय जनजातीय अनुसंधान संस्थान (एन टीआरआई) के सहयोग से आज सिविल सर्विसेज अधिकारी संस्थान, नई दिल्ली में अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 पर राष्ट्रीय परामर्श कार्यशाला का आयोजन किया। यह कार्यशाला माननीय प्रधानमंत्री द्वारा अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वनवासियों के अधिकारों, गरिमा एवं आजीविका की बहाली पर उनके निरंतर जोर तथा अधिनियम के अंतर्गत वन संसाधनों पर उनके उचित स्वामित्व के माध्यम से जनजातीय समुदायों को सशक्त बनाने के उनके दृष्टिकोण के अनुरूप आयोजित की गई। इस कार्यशाला में नीति निर्माताओं, वरिष्ठ अधिकारियों, विधि विशेषज्ञों, विद्वानों एवं सिविल सोसाइटी संगठनों को एकत्रित कर अधिनियम के कार्यान्वयन को मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण चुनौतियों एवं भविष्य की राहों पर विचार–विमर्श किया गया।
उद्घाटन सत्र में, माननीय केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री ने बताया कि वन अधिकार अधिनियम, 2006 एक मील का पत्थर विधान है जो अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य परंपरागत वनवासियों पर होने वाले ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने के उद्देश्य से बनाया गया है। समुदायिक वन अधिकारों के महत्व पर जोर देते हुए, केंद्रीय मंत्री ने सभी हितधारकों से अपनी अनुभव साझा करने तथा विचार–विमर्श से उभरने वाली कारगर सिफारिशें प्रस्तुत करने का आह्वान किया। उन्होंने राज्यों से अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य परंपरागत वनवासियों को सशक्त बनाने के लिए केंद्रित हस्तक्षेपों को प्राथमिकता देने का आग्रह किया, विशेष रूप से गैर–लकड़ी वन उत्पादों (एन टी एफ पी) जैसे साल, पत्तियों एवं महुआ की सुरक्षा, मूल्य संवर्धन एवं विपणन के कार्य में यह संज्ञान लेते हुए कि वन अधिकार अधिनियम अधिकारों को सुरक्षित करना सतत आजीविकाओं को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।
इसके अतिरिक्त, जनजातीय कार्य सचिव ने वन अधिकार अधिनियम की जनजातीय कल्याण एवं आजीविका संवर्धन के लिए उत्प्रेरक की भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने सभी मान्यता प्राप्त वन अधिकारों, जिसमें व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR), समुदाय अधिकार (CR) एवं समुदाय वन संसाधन (CFR) अधिकार शामिल हैं, के भौगोलिक टैगिंग पर बल दिया ताकि पारदर्शिता एवं निगरानी को मजबूत किया जा सके। उन्होंने सभी हितधारकों से FRA व्यवस्था की प्रमुख चुनौतियों के समाधान प्रस्तुत करने का आग्रह किया, विशेष रूप से आजीविका संवर्धन, रिकॉर्डों का डिजिटलीकरण तथा विशेष रूप से संवेदनशील जनजातीय समूहों (PVTGs) के लिए आवास अधिकारों को सुरक्षित करने पर ध्यान केंद्रित करते हुए।
श्री अनंत प्रकाश पांडेय, संयुक्त सचिव द्वारा वन अधिकार अधिनियम की भूमिका पर जोर दिया गया जो स्वामित्व सुरक्षा, लोकतांत्रिक वन शासन, आजीविका सुरक्षा एवं जैव विविधता संरक्षण को मजबूत करने को लेकर है, जो भारत के विकसित भारत के दृष्टिकोण के अनुरूप भी है।
कार्यशाला में तीन पैनल चर्चाओं का आयोजन किया गया– पहला तकनीकी सत्र सरकारी भूमि रिकॉर्डों में वन अधिकार रिकॉर्ड (RoFR) को शामिल करने के लिए रणनीतियों एवं मार्गों के निर्माण पर केंद्रित था, जो कानूनी स्वामित्व सुरक्षा प्राप्त करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। दूसरा पैनल FRA की धारा 3(1)(i) एवं 5 के अंतर्गत समुदाय वन शासन को कार्यान्वित करने तथा ग्राम सभाओं एवं CFR प्रबंधन समितियों को मजबूत करने पर केंद्रित था, जबकि अंतिम पैनल FRA के अंतर्गत PVTG आवास अधिकारों को सौंपने के लिए समर्पित था। पहले पैनल में, पैनलिस्टों ने बताया कि FRA पूर्व–विद्यमान अधिकारों को सौंपने का प्रावधान करता है, लेकिन सच्ची स्वामित्व सुरक्षा तभी प्राप्त हो सकती है जब ये अधिकार सरकारी रिकॉर्डों में सटीक रूप से दर्ज हों। FRA के कार्यान्वयन के लगभग दो दशकों के बावजूद कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं, जिनमें सीमा निर्धारण एवं स्थल सत्यापन में जटिलताएँ, दावों एवं अधिकारों के विस्तार से संबंधित विवाद, विशेष रूप से परंपरागत सीमाओं एवं अधिसूचित वन सीमाओं के बीच शामिल हैं।
पहले पैनल से प्रमुख सुझावों में दावेदारों को सहायता प्रदान करने के लिए, विशेष रूप से सीमा निर्धारण एवं विधिक स्पष्टता के लिए प्रशिक्षित कर्मियों वाले वन अधिकार केंद्रों को संस्थागत बनाने की आवश्यकता शामिल थी। राजस्व एवं वन रिकॉर्डों के एकीकरण की महत्ता प्रभावी ।
FRA डेटा का पूर्ण डिजिटलीकरण, राज्यों में एक समान डेटा रिकॉर्डिंग प्रारूपों की आवश्यकता, तथा विरासत डेटा का FRA संभावित एटलस के साथ एकीकरण। इसके अतिरिक्त डिजिटलीकरण से पूर्व राजस्व रिकॉर्डों के सुधार की आवश्यकता। इसके अलावा, उप सचिव श्री गणेश नागराजन ने वन अधिकार अधिनियम (FRA) की सभी प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने के लिए एकल-खिड़की पोर्टल के निर्माण का प्रस्ताव दिया, जिसमें ब्लॉकचेन प्रौद्योगिकी का उपयोग कर FRA दावा प्रबंधन, विरासत रिकॉर्डों का डिजिटलीकरण, तथा राजस्व एवं वन विभाग शेप फाइलों के साथ FRA संभावित एटलस का एकीकरण शामिल है। उन्होंने सूचित किया कि मंत्रालय द्वारा ऐसा सिस्टम विकसित किया जा रहा है, जिसमें अन्य योजनाओं के अंतर्गत संभावित हकधारियों की पहचान करने के लिए निर्णय समर्थन तंत्र शामिल है, जिसका उद्देश्य FRA पट्टा धारकों के लिए आजीविकाओं को सुरक्षित एवं संवर्धित करना है।
दूसरे सत्र में दीर्घकालिक अनुकूलित वन प्रबंधन की महत्ता और इसके अनुसरण के लिए ग्राम सभा महासंघों को सुगम बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। इसके अतिरिक्त, श्री आर. रघु प्रसाद, आईजीएफ, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने ग्राम सभाओं को वन संसाधनों के जिम्मेदार प्रबंधकों के रूप में सशक्त बनाने पर बल दिया, तथा वन विभाग से धनराशि, जिसमें CAMPA कोष शामिल है, को CFR प्रबंधन योजनाओं की तैयारी एवं कार्यान्वयन के लिए निर्देशित करने पर भी प्रकाश डाला गया।
स्मति मंजिरी मनोलकर, आयुक्त, TRTI, महाराष्ट्र ने महाराष्ट्र से सफलता की कहानियाँ साझा कीं, जो अधिकार मान्यता से संस्थाओं, आजीविकाओं एवं स्थिरता की मार्गदर्शिका बताती हैं, जिसे सरकारी संकल्पों के माध्यम से स्पष्ट नीतिगत समर्थन एवं बहु-हितधारक सहयोग द्वारा महाराष्ट्र में सफल बनाया गया है।
तीसरे सत्र में, PVTG आवास अधिकारों के इर्द–गिर्द चर्चा की गई कि PVTG आवास अधिकार विरासत की परंपराओं, प्रथाओं एवं सांस्कृतिक रीति–रिवाजों को समेटने वाले व्यापक अधिकारों का समूह हैं, जिनके लिए FRA के फॉर्म बी के माध्यम से विस्तृत दस्तावेजीकरण की आवश्यकता है।
ओडिशा के डोंगरिया कोंध, लंजिया सौरा के उत्कृष्ट मामलों पर भी चर्चा की गई, जहाँ आवास अधिकारों की मान्यता ने भौगोलिक संकेत (GI) टैग प्रदान करने तथा आवास संरक्षण एवं सूखा न्यूनीकरण के लिए यूनेस्को द्वारा अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त किया।
यह भी नोट किया गया कि PVTG आवास अधिकारों की प्रभावी मान्यता परिदृश्य–स्तरीय संरक्षण नियोजन एवं सतत शासन के लिए आधार भी कार्य कर सकती है। चूँकि अब तक केवल 3 राज्यों ने PVTGs के आवासों एवं सांस्कृतिक अधिकारों को मान्यता दी है, अतः पैनलिस्टों के कुछ सुझावों में PVTG क्षेत्रों के सभी जिला कलेक्टरों को आवास अधिकारों के कार्यान्वयन को त्वरित करने के निर्देश जारी करना तथा जिला प्रशासनों के साथ समन्वित संलग्नता को सुगम बनाने के लिए कार्य समूह गठित करना शामिल था।
कार्यशाला का समापन सरकारी भूमि रिकॉर्डों में वन अधिकारों के तेज एवं सटीक रिकॉर्डिंग, मजबूत अंतर–विभागीय समन्वय, ग्राम सभाओं की क्षमता निर्माण तथा FRA का विकास एवं संरक्षण ढांचों के साथ उन्नत अभिसरण की आवश्यकता पर आम सहमति जता कर हुई।
जनजातीय कार्य मंत्रालय ने साक्ष्य-आधारित नीतिगत सुधारों, संस्थागत सुदृढ़ीकरण तथा राज्यों, विशेषज्ञों एवं समुदायों के साथ निरंतर संलग्नता के माध्यम से FRA कार्यान्वयन को मजबूत करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।
उपायुक्त-सह-जिला दण्डाधिकारी, रांची श्री मंजूनाथ भजन्त्री एवं वरीय पुलिस अधीक्षक राँची, श्री राकेश रंजन द्वारा संयुक्त रूप से बैठक
सभी विभागों को समन्वय स्थापित करते हुए तैयारी पूर्ण करने का निर्देश
माननीया राष्ट्रपति महोदया के प्रस्तावित परिभ्रमण को लेकर सभी सुरक्षा मानकों का सुनिश्चित रूप से पालन करने के निर्देश
रांची,20.12.2025 – माननीय राष्ट्रपति, भारत सरकार श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के दिनांक 28 दिसंबर से 30 दिसंबर 2025 को प्रस्तावित परिभ्रमण कार्यक्रम को लेकर उपायुक्त सह जिला दंडाधिकारी, रांची श्री मंजूनाथ भजंत्री एवं वरीय पुलिस अधीक्षक राँची, श्री राकेश रंजन द्वारा संयुक्त रूप से समाहरणालय सभागार में जिलास्तरीय पदाधिकारियों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गयी।
बैठक में राष्ट्रपति दौरे की तैयारी, सुरक्षा व्यवस्था, यातायात प्रबंधन, स्वागत-सत्कार एवं कार्यक्रम स्थलों की व्यवस्था पर विस्तार से चर्चा की गई।
उपायुक्त श्री मंजूनाथ भजंत्री ने संबंधित विभागों को उनके कार्यों की स्पष्ट जिम्मेदारी देते हुए कहा कि राष्ट्रपति महोदया का दौरा त्रुटिरहित तरीके से संपन्न होना चाहिए। उन्होंने सभी विभागों को समन्वय स्थापित करते हुए तैयारी पूर्ण करने का निर्देश दिया।
बैठक में उपायुक्त श्री मंजूनाथ भजंत्री द्वारा रांची में प्रस्तावित कार्यक्रम एवं अन्य संभावित स्थलों की व्यवस्था सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया। उन्होंने साफ-सफाई, सुरक्षा, यातायात नियंत्रण, अग्निशमन, स्वास्थ्य सुविधा, पेयजल, शौचालय, पार्किंग व्यवस्था आदि सभी बिंदुओं पर विभागवार समीक्षा की। रुटलाइन में सुरक्षा व्यवस्था के लिए पुलिस प्रशासन को विशेष सतर्कता बरतने का निर्देश उपायुक्त द्वारा दिया गया।
उपायुक्त श्री मंजूनाथ भजंत्री ने कहा कि माननीया राष्ट्रपति महोदया के प्रस्तावित परिभ्रमण हेतु सभी अधिकारी अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन सजगता एवं संवेदनशीलता के साथ करें। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि तैयारियों की लगातार समीक्षा की जाएगी और कार्यों की प्रगति पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के प्रस्तावित झारखंड दौरे को लेकर जिला प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद करने के सख्त निर्देश जारी किए हैं।
28 दिसंबर 2025 से 30 दिसंबर 2025 को होने वाले इस दौरे की तैयारियां जोरों पर हैं।
मुख्य सुरक्षा और व्यवस्था के निर्देश:
1. सुरक्षा घेरा — बैरिकेडिंग, CCTV निगरानी, ड्रोन से निगरानी और पास सिस्टम को दुरुस्त रखना।
2. यातायात प्रबंधन — डायवर्जन, पार्किंग और आपातकालीन रूट्स की व्यवस्था।
3. समन्वय — सभी विभागों (पुलिस, नगर निगम, स्वास्थ्य, विद्युत आदि) के बीच बेहतर तालमेल सुनिश्चित करना।
4. आपात सेवाएं — सम्बंधित अस्पताल को रिजर्व रखना, चिकित्सा सुविधाएं और स्वच्छता पर विशेष ध्यान।
5. अन्य — किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए पूर्ण तैयारी।
जिला प्रशासन ने सभी सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन करने के निर्देश दिए हैं, ताकि राष्ट्रपति का परिभ्रमण पूरी तरह सुरक्षित और सुव्यवस्थित रहे।
बैठक में उप विकास आयुक्त राँची, सौरभ भुवनिया, अनुमंडल पदाधिकारी सदर श्री उत्कर्ष कुमार, अपर जिला दंडाधिकारी (विधि व्यवस्था) श्री राजेश्वर नाथ आलोक, पुलिस अधीक्षक, शहर, श्री पारस राणा, परियोजना निदेशक, आई० टी० डी० ए०, राँची, श्री संजय भगत, अपर समाहर्त्ता, राँची, श्री रामनारायण सिंह, विशिष्ट अनुभाजन पदाधिकारी, राँची, श्रीमती मोनी कुमारी, अपर समाहर्त्ता, नक्सल, राँची, श्री सुदर्शन मुर्मू, असैनिक शल्य चिकित्सक पदाधिकारी, राँची, डॉ. प्रभात कुमार, जिला भू-अर्जन पदाधिकारी, राँची, श्री के. के. राजहंस, उप-समाहर्त्ता, भूमि सुधार, सदर, राँची, श्री मुकेश कुमार, जिला परिवहन पदाधिकारी, राँची, श्री अखिलेश कुमार, जिला आपूर्ति पदाधिकारी, राँची, श्री रामगोपाल पांडेय, जिला पंचायती राज पदाधिकारी, राँची, श्री राजेश कुमार साहू, जिला शिक्षा पदाधिकारी, राँची, श्री विनय कुमार, जिला शिक्षा अधीक्षक, महाप्रबंधक, सुरक्षा बिरसा मुण्डा विमानपतन, राँची, जिला सूचना एवं जन संपर्क पदाधिकारी राँची, श्रीमती उर्वशी पांडेय, जिला सूचना एवं विज्ञान पदाधिकारी, राँची, श्री राजीव कुमार, सहायक निदेशक, सामाजिक सुरक्षा, राँची, श्री रविशंकर मिश्रा, जिला नियोजन पदाधिकारी, राँची, जिला योजना पदाधिकारी, राँची, श्री संजीव कुमार, जिला उद्यान पदाधिकारी, राँची, श्री महेश राम, कार्यपालक अभियंता, विद्युत आपूर्ति प्रमण्डल, राँची, कार्यपालक अभियंता, विद्युत कार्य प्रमण्डल, राँची, कार्यपालक अभियंता, पथ निर्माण विभाग, शहरी/ग्रामिण, राँची, कार्यपालक अभियंता, भवन निर्माण विभाग-1 एवं 2, राँची, कार्यपालक अभियंता, पेयजल एवं स्वच्छता विभाग, राँची, परियोजना निदेशक (प्रशासन), जुडको, राँची, ए.जी.एम., बी.एस.एन.एल., राँची, प्रभारी पदाधिकारी, मौसम केन्द्र, राँची, डी०पी०एम०, जे० एस० एल० पी०एस०, राँची, श्री निशिकांत नीरज, जिला खाद्य सुरक्षा पदाधिकारी, राँची, जिला अग्निशमन पदाधिकारी, राँची, संबंधित विभागों के पदाधिकारी उपस्थित थे।
राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने (19 दिसंबर, 2025) हैदराबाद स्थित राष्ट्रपति निलयम में उद्यान उत्सव के दूसरे संस्करण के उद्घाटन की तैयारियों का जायजा लिया।
उद्यान उत्सव 3 जनवरी से 11 जनवरी, 2026 तक सुबह 10 बजे से रात 8 बजे तक जनता के लिए खुला रहेगा, जिसमें अंतिम प्रवेश शाम 7 बजे होगा।
उत्सव में सभी आगंतुकों के लिए प्रवेश निःशुल्क है।
नौ दिवसीय कृषि और बागवानी उत्सव का उद्देश्य सतत कृषि, बागवानी और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार जीवनशैली के बारे में जन जागरूकता को और बढ़ाना है। यह भारत की हरित परंपराओं, सतत प्रथाओं और सामुदायिक भागीदारी का उत्सव होगा।
उत्सव में पुष्प और गैर–पुष्प आकर्षणों की एक विस्तृत श्रृंखला होगी, जिसमें मौसमी फूलों की क्यारियों को बेहतर बनाना, चुनिंदा पुष्प स्थापनाएं, सेल्फी पॉइंट और उन्नत उद्यान स्थान शामिल हैं। आगंतुक कृषि और बागवानी से संबंधित विषयगत स्टालों, लाइव प्रदर्शनों, पर्यावरण अनुकूल शिल्प कार्यशालाओं और इंटरैक्टिव ज्ञान क्षेत्रों का भी पता लगा सकते हैं।
नई दिल्ली – प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग (डीएआरपीजी) ने 19 से 25 दिसंबर तक मनाए जाने वाले सुशासन सप्ताह 2025 का शुभारंभ किया। डीएआरपीजी की सचिव रचना शाह ने आज राष्ट्रव्यापी ‘प्रशासन गांव की ओर’ अभियान के लिए दिशानिर्देश जारी किए। इस शुभारंभ के साथ ही एक सप्ताह तक चलने वाले प्रशासनिक अभियान की शुरुआत हुई है, जिसका उद्देश्य जमीनी स्तर पर सेवाओं के कार्यान्वयन पर विशेष ध्यान देते हुए नागरिक-केंद्रित शासन को मजबूत करना है।
शुभारंभ समारोह को संबोधित करते हुए सचिव रचना शाह ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती (25 दिसंबर) के उपलक्ष्य में प्रतिवर्ष मनाया जाने वाला सुशासन सप्ताह, वर्षों से एक स्मृति उत्सव से विकसित होकर एक केंद्रित और कार्य-उन्मुख शासन पहल बन चुका है। उन्होंने कहा कि सुशासन केवल नीतियों और संस्थागत ढांचों में ही नहीं, बल्कि इस बात में भी परिलक्षित होता है कि सार्वजनिक सेवाएं नागरिकों तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचती हैं और शिकायतों का कितनी तत्परता से समाधान किया जाता है।
‘प्रशासन गांव की ओर’ पहल सुशासन सप्ताह अभियान का मुख्य आधार बनी हुई है, यह शिकायत निवारण और जनसेवा वितरण में जिला प्रशासनों की अग्रणी भूमिका को दर्शाती है। दिशा-निर्देशों के अनुसार, देशभर के जिला कलेक्टर तहसील, ब्लॉक और पंचायत स्तर पर विशेष शिविरों का आयोजन करेंगे, जिससे अधिकारियों और नागरिकों के बीच सीधा संवाद स्थापित हो सकेगा और शिकायतों का मौके पर ही समाधान हो सकेगा, साथ ही जनसेवाओं का बेहतर वितरण सुनिश्चित होगा। यह अभियान दो चरणों में संचालित जा रहा है इनमें पहला चरण 11 से 18 दिसंबर तक तैयारी के लिए और दूसरा चरण 19 से 25 दिसंबर तक सुशासन सप्ताह के दौरान कार्यान्वयन के लिए है।
कार्यान्वयन चरण के दौरान, जिले विशेष शिविरों, सीपीग्राम और राज्य शिकायत पोर्टलों के माध्यम से हल की गई शिकायतों, सेवा वितरण आवेदनों के निपटान, ऑनलाइन सेवाओं के विस्तार और सुशासन प्रथाओं के दस्तावेजीकरण सहित प्रमुख मापदंडों पर दैनिक प्रगति रिपोर्ट करेंगे। तैयारी चरण के तहत, जिला कलेक्टरों और जिला मजिस्ट्रेटों ने अभियान पोर्टल पर शिकायत निवारण, सेवा वितरण और शासन संबंधी पहलों से संबंधित जिला स्तरीय डेटा अपलोड करना शुरू कर दिया है। अभियान अवधि की शुरुआत तक सीपीग्राम और राज्य शिकायत पोर्टलों के माध्यम से प्राप्त शिकायतों का सप्ताह के दौरान समयबद्ध समाधान किया जा रहा है।
सुशासन सप्ताह 2025 की तैयारियों के दौरान, राज्यों और जिलों ने उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। 17 दिसंबर, 2025 तक की दैनिक प्रगति रिपोर्ट के अनुसार, राज्य शिकायत पोर्टलों के माध्यम से कुल 2,11,098 शिकायतों का निवारण किया गया है, जबकि सहभागी जिलों में 21,71,179 सेवा वितरण आवेदनों का निपटारा किया गया है। इसके अतिरिक्त, जिला स्तर पर 330 कार्यशालाएं और शिकायत निवारण शिविर आयोजित किए गए हैं। तैयारियों के चरण में 137 सुशासन प्रथाओं और सार्वजनिक शिकायत निवारण से संबंधित 21 दस्तावेजित सफलता की गाथाओं की पहचान भी हुई है, जिन्हें अभियान के दौरान व्यापक रूप से प्रसारित किया जाएगा।
अभियान के अगले चरण के रूप में, 23 दिसंबर, 2025 को सभी जिलों में जिला स्तरीय प्रसार कार्यशालाओं का आयोजन किया जाएगा। इन कार्यशालाओं में जिला-100 के विषय पर चर्चा, पिछले पांच वर्षों में कार्यान्वित की गई कम से कम तीन सुशासन पहलों की प्रस्तुति और नागरिकों, शिक्षाविदों और जिला स्तरीय अधिकारियों के साथ संवाद पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। कार्यशालाओं में जिला प्रशासनों द्वारा प्रस्तुतियाँ, स्थानीय नवाचारों पर चर्चा, प्रश्नोत्तर सत्र और अभियान पोर्टल पर साझा करने के लिए सर्वोत्तम प्रथाओं का दस्तावेजीकरण शामिल होगा।
पूर्व संस्करणों के परिणामों का उल्लेख करते हुए सचिव ने बताया कि सुशासन सप्ताह 2024 के दौरान देशभर में 18 लाख से अधिक जन शिकायतों का निपटारा किया गया और लगभग तीन करोड़ सेवा वितरण आवेदनों पर कार्रवाई की गई। इसके साथ ही एक हजार से अधिक सुशासन प्रथाओं और सैकड़ों नवाचार-आधारित सफलताओं का दस्तावेजीकरण भी किया गया। उन्होंने कहा कि ये परिणाम जमीनी स्तर पर प्रशासनिक जवाबदेही में सुधार को दर्शाते हैं।
सचिव ने जिला प्रशासनों से अभियान को मिशन की तरह चलाने का आग्रह करते हुए स्पष्ट और मापने योग्य परिणामों की मांग की। उन्होंने कहा कि राज्यों और जिलों की निरंतर भागीदारी यह सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण होगी कि अभियान से नागरिकों को ठोस लाभ प्राप्त हों।
शिकायत निवारण, सेवा वितरण और नवाचारों के दस्तावेजीकरण में शुरुआती गति पहले से ही दिखाई दे रही है, अधिकारियों ने कहा कि सुशासन सप्ताह 2025 से विश्वास-आधारित और समावेशी शासन को और मजबूत करने की आशा है, जिससे देश भर में दैनिक प्रशासनिक प्रथाओं में जवाबदेही और उत्तरदायित्व को शामिल करने के प्रयासों को बल मिलेगा।
महाराष्ट्र सरकार के मुख्य सचिव ने संबोधित किया, जबकि बिहार सरकार के मुख्य सचिव ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सभा को संबोधित किया। देश के विभिन्न हिस्सों के जिला प्रशासनों ने भी वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए इस अभियान में भाग लिया, जो इस अभियान के प्रति राष्ट्रव्यापी भागीदारी को दर्शाता है। अतिरिक्त सचिव पुनीत यादव ने कार्यक्रम का समन्वय और प्रबंधन किया और अपने संबोधन में सभी उपस्थित अधिकारियों से ‘प्रशासन गांव की ओर’ पहल में सक्रिय रूप से भाग लेने और सुशासन सप्ताह अभियान के सफल कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए सामूहिक रूप से काम करने का आग्रह किया।
नई दिल्ली – विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के एक स्वायत्त संस्थान, रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट (आरआरआई) के एक नए शोध अध्ययन से पता चला है कि अंतर-आकाशगंगा माध्यम में मौजूद पदार्थ का योगदान आकाशगंगा के चारों ओर फैले विसरित आवरण के मापन को प्रभावित कर सकता है। इस अध्ययन के दूरगामी निहितार्थ हैं, क्योंकि यह आवरण आकाशगंगाओं के निर्माण या विघटन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और आकाशगंगाओं के निर्माण की प्रक्रिया को समझने के लिए इसके द्रव्यमान का मापन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
आकाशगंगा को देखते ही मन में धूल और तारों की सुंदर सर्पिलाकार आकृतियों की चमक उभरती है। लेकिन आकाशगंगा के बाहरी किनारों से परे एक धुंधला, रहस्यमय प्रभामंडल फैला हुआ है, जो आकाशगंगा के आकार से 10-20 गुना अधिक दूर तक फैला हुआ है। आकाशगंगा का अधिकांश द्रव्यमान तारों के परे इसी प्रभामंडल में स्थित है, जो रहस्यमय डार्क मैटर (ब्रह्मांड को एक साथ रखने वाला अदृश्य गोंद) और गैस से बना है। प्रभामंडल के गैसीय भाग को परि-आकाश गंगा माध्यम (सीजीएम) कहा जाता है। परि-आकाशगंगा माध्यम के बाहर का क्षेत्र अंतर-आकाशगंगा माध्यम (आईजीएम) कहलाता है।
आकाशगंगा को ब्रह्मांडीय जाल (कॉस्मिक वेब) से जोड़ने के कारण, आकाशगंगा में गैस के वितरण का मानचित्रण अत्यंत महत्वपूर्ण है। ब्रह्मांडीय जाल वह तंतुमय संरचना है जो पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है। ऐसा करके, आकाशगंगा में गैस के अंतर्प्रवाह और बहिर्प्रवाह को नियंत्रित करके, आकाशगंगा के विकास में परि-आकाशगंगा माध्यम महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। परि-आकाशगंगा माध्यम में मौजूद अत्यधिक आयनित ऑक्सीजन (जिसमें से पाँच इलेक्ट्रॉन अलग हो गए हों) की मात्रा को मापकर, खगोलविद आकाशगंगा के द्रव्यमान का अनुमान लगाते हैं।
खगोलविद दूर स्थित आकाशगंगाओं के बेहद चमकीले केंद्रों से आने वाले प्रकाश का उपयोग करके केंद्र परि-आकाशगंगा माध्यम का मानचित्रण करते हैं। जब ऐसे किसी पृष्ठभूमि पिंड से आने वाला प्रकाश अग्रभूमि परि-आकाशगंगा माध्यम के केंद्र-आसमान में मौजूद गैस से होकर गुजरता है, तो कुछ तत्व विशेष तरंग दैर्ध्य को अवशोषित कर लेते हैं।
लेकिन अवलोकन तकनीक में एक अंतर्निहित समस्या है। जब खगोलविद अवलोकन करते हैं, तो मापा गया आयनित ऑक्सीजन दृष्टि रेखा के अनुदिश कुल एकीकृत मान होता है।
चूंकि परि-आकाशगंगा माध्यम और अंतर-आकाशगंगा माध्यम दोनों दृष्टि रेखा के समानांतर स्थित हैं, इसलिए प्रेक्षित मानों में परि-आकाशगंगा माध्यम और अंतर-आकाशगंगा माध्यम के योगदान को अलग-अलग बताना संभव नहीं है। वर्तमान मॉडल प्रेक्षित सभी आयनित ऑक्सीजन को परि-आकाशगंगा माध्यम से प्राप्त मानते हैं।
चित्र 1. आकाशगंगा के चारों ओर फैले परि-आकाशगंगा माध्यम का कलात्मक चित्रण।
रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट के इस नए शोध में मॉडलों का उपयोग करते हुए यह सुझाव दिया गया है कि परि-आकाशगंगा माध्यम से जुड़ी अधिकांश गैस अंतर-आकाशगंगा माध्यम से आ सकती है।
डॉ. सरकार ने कहा कि कल्पना कीजिए कि एक सड़क पर जादूगर अपने करतब दिखा रहा है। लोग धीरे-धीरे उसके चारों ओर इकट्ठा होने लगते हैं… और भीड़ बढ़ती जाती है। शुरुआत में, लोग शो देखने के लिए दौड़ पड़ते हैं। लेकिन जैसे ही वे भीड़ की सीमा तक पहुंचते हैं, वे रुक जाते हैं। डॉ. सरकार के उदाहरण में जादूगर आकाशगंगा है और भीड़ परि-आकाशगंगा माध्यम है। उन्होंने बताया, “जादूगर जितना बड़ा होगा, भीड़ उतनी ही बड़ी होगी। परि-आकाशगंगा माध्यम के बाहर का वह क्षेत्र, जो आकाशगंगा के गुरुत्वाकर्षण से बंधा नहीं है, अंतर-आकाशगंगा माध्यम कहलाता है।
चित्र 2. आकाशगंगाओं के चारों ओर आयनित ऑक्सीजन की उपस्थिति का कलात्मक चित्रण, और उनके अवलोकन का सिद्धांत।
डॉ. सरकार कहते हैं कि हम इस धारणा को चुनौती दे रहे हैं कि संपूर्ण आयनित ऑक्सीजन परि-आकाशगंगा माध्यम से संबंधित है। टीम ने परि-आकाशगंगा माध्यम और अंतर-आकाशगंगा माध्यम से उसमें गिरने वाली गैस का गणितीय विवरण इस्तेमाल किया। फिर उन्होंने प्रत्येक में मौजूद आयनित ऑक्सीजन (ब्रह्मांड में सबसे प्रचुर मात्रा में पाए जाने वाले तत्वों में से एक) की मात्रा की गणना की और इसकी तुलना प्रेक्षणों से की।
डॉ. सरकार का कहना है कि हमारा सुझाव है कि आयनित ऑक्सीजन का अपेक्षाकृत छोटा अंश परि-आकाशगंगा माध्यम से आ रहा है और परि-आकाशगंगा माध्यम के चारों ओर अंतर-आकाशगंगा माध्यमकी एक परत मौजूद है जो प्रेक्षित ऑक्सीजन में योगदान दे रही है। अंतर-आकाशगंगा माध्यम द्वारा परि-आकाशगंगा माध्यम का यह संदूषण परि-आकाशगंगा माध्यम के द्रव्यमान के अधिक अनुमान का कारण बन सकता है।
चित्र 3. कम द्रव्यमान वाली आकाशगंगाओं के मामले में अंतर-आकाशगंगा माध्यम में आयनित ऑक्सीजन की उपस्थिति का कलात्मक चित्रण।
डॉ. सरकार और उनके सहयोगियों को पहली बार गड़बड़ी का आभास तब हुआ जब उन्होंने देखा कि परि-आकाशगंगा माध्यम द्रव्यमान के मॉडल कम द्रव्यमान वाली आकाशगंगाओं के प्रेक्षणों से मेल नहीं खाते। अंतर-आकाशगंगा माध्यमद्वारा परि-आकाशगंगा माध्यम मापों को भ्रमित करने का उनका वर्तमान सिद्धांत सभी द्रव्यमानों की आकाशगंगाओं पर लागू होता है और कम द्रव्यमान वाली आकाशगंगाओं में देखी गई विसंगति को समझाने में सहायक हो सकता है।
डॉ. सरकार कहते हैं कि हमारी आकाशगंगा जैसी उच्च द्रव्यमान वाली आकाशगंगाओं के लिए, परि-आकाशगंगा माध्यम आयनित ऑक्सीजन में केवल 50 प्रतिशत का योगदान दे सकता है, शेष अंतर-आकाशगंगा माध्यम से आता है। कम द्रव्यमान वाली आकाशगंगाओं के लिए, यह 30 प्रतिशत तक कम हो सकता है। यह अध्ययन परि-आकाशगंगा माध्यम प्रेक्षणों की व्याख्या करते समय अंतर-आकाशगंगा माध्यम के योगदान पर विचार करने की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है।
रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट शोधकर्ता, इज़राइल के यरुशलम स्थित हिब्रू विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर, अपने मूल मॉडल को अधिक यथार्थवादी और व्यापक मॉडल में उन्नत करने की दिशा में काम कर रहे हैं, जिसमें शामिल मापदंडों की संख्या अधिक हो। डॉ. सरकार कहते हैं कि हमें यकीन है कि इसमें कुछ विसंगति है। अब हम इस विसंगति को सटीक रूप से मापने का प्रयास कर रहे हैं।
नई दिल्ली – कोसी नदी के तट पर, जहां दशकों से लोग बाढ़, अलगाव और लंबे चक्करों से जूझ रहे हैं, एक नया सपना साकार हो रहा है। 13.3 किलोमीटर लंबा भेजा-बकौर कोसी पुल अब निर्माण के अंतिम चरण में है। कोसी नदी पर बना यह पुल एक बार चालू होने के बाद यात्रा की दूरी को 44 किलोमीटर कम कर देगा। यह बाढ़ प्रभावित, सुविधाओं से वंचित मधुबनी और सुपौल क्षेत्रों को सीधे एनएच-27 और पटना से जोड़ देगा। इससे नेपाल और पूर्वोत्तर के लिए भी सुगम मार्ग खुलेंगे। इससे सीमा पार व्यापार, क्षेत्रीय वाणिज्य और बहुप्रतीक्षित निवेश को बढ़ावा मिलेगा। यह विकास बिहार में भारतमाला परियोजना के प्रथम चरण की बस रैपिड ट्रांजिट (बीआरटी) योजना के अंतर्गत ईपीसी मोड पर हो रहा है। 1101.99 करोड़ रूपये के निवेश से निर्मित यह पुल क्षेत्र में कनेक्टिविटी को बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। परियोजना के वित्त वर्ष 2026-2027 में पूरा होने का लक्ष्य है।
तीर्थयात्रियों को भगवती उच्चैत, बिदेश्वर धाम, उग्रतारा मंदिर और सिंहेश्वर स्थान जैसे पवित्र स्थलों तक आसानी से पहुंच मिलेगी। किसानों को बाढ़ के दौरान फंसे रहने का डर नहीं रहेगा। छात्र बिना किसी डर के स्कूल पहुंच सकेंगे। व्यापारी समय पर सामान पहुंचा सकेंगे। छोटी दुकानें बढ़ेंगी; परिवहन सेवाएं बेहतर होंगी; स्थानीय युवाओं को नए रोजगार मिलेंगे।
एक समय उग्र नदी से संघर्षों के लिए मशहूर इस क्षेत्र में, यह पुल संभावनाओं को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है। और जैसे ही कोसी पुल निर्माण के अंतिम चरण के नजदीक आ रहा है, उत्तरी बिहार के लोग एक ही भावना से एकजुट हो जाते हैं – उनकी दुनिया हमेशा के लिए बदलने वाली है।
संक्षिप्त तथ्य:
परियोजना की लंबाई (किलोमीटर में): 13.300 किलोमीटर
अनुमानित सिविल परियोजना लागत: 1101.99 करोड़ रुपये
पूर्ण होने की तिथि: वित्तीय वर्ष 2026-2027
यह पुल मधुबनी, सुपौल, सहरसा और आसपास के जिलों के लोगों के लिए मात्र इस्पात और कंक्रीट से कहीं अधिक है। यह एक जीवन रेखा है, आशा की एक अटूट कड़ी है, जो कोसी नदी के बाढ़ के मैदानों की चुनौतियों से प्रभावित समुदायों के लिए जीवन को सुगम बनाती है।
सहरसा के रहने वाले शिक्षक रोशन कुमार, जो मधुबनी के एक प्लस-टू स्कूल में रोज़ाना पढ़ाने जाते हैं, उनके लिए यह पुल वर्षों की थका देने वाली यात्राओं से मुक्ति का प्रतीक है। वे बताते हैं, “अभी भेजा पहुंचने के लिए मुझे बलवाहा पुल और कोसी तटबंध से होते हुए लगभग 70 किलोमीटर अतिरिक्त यात्रा करनी पड़ती है। पहले हमें दरभंगा या फुलपरास होकर जाना पड़ता था जो 150 से 200 किलोमीटर का सफर होता था। पुल चालू होने बाद सहरसा से मधुबनी की दूरी लगभग 70 किलोमीटर कम हो जाएगी। यह बदलाव जीवन बदल देने वाला है।” उनकी आवाज़ में नरमी आ जाती है जब वे आगे कहते हैं, “यह सिर्फ एक पुल नहीं है। इससे शिक्षकों, छात्रों, व्यापारियों… सभी के लिए समय, पैसा और ऊर्जा की बचत होगी।”
क्षेत्र में एक मेडिकल शॉप के मालिक पंकज के लिए, इस परियोजना का भावनात्मक महत्व और भी गहरा है। वे कहते हैं, “हमने बहुत कष्ट झेला है। मरीजों को अस्पतालों तक ले जाना एक बुरे सपने जैसा था। बाढ़ के कारण हमारा संपर्क टूट जाता था, नौकाएं बंद हो जाती थीं, और कई बार मदद देर से पहुंचने के कारण लोगों की जान चली जाती थी।” बन रही संरचना को देखकर उनकी आंखों में गर्व की चमक आ जाती है। “अब एम्बुलेंस आधे घंटे में पुल पार कर जाएगी। मरीज समय पर पहुंचेंगे। यह सम्मान की बात है। यह सुरक्षा की बात है। हमें गर्व है कि हमारे जिले में ऐसा पुल बन रहा है।”
क्षेत्र के युवाओं में भी यही उत्साह है। ग्यारहवीं कक्षा की छात्रा नेहा बताती हैं कि मानसून के दौरान इलाके को कितनी परेशानी झेलनी पड़ी थी। “लोग पार करने से डरते थे। सड़कें बह जाती थीं। लेकिन अब सब कुछ बदल जाएगा। हम सुरक्षित स्कूल पहुंचेंगे। हमारा इलाका आखिरकार राज्य के बाकी हिस्सों से जुड़ पाएगा।” इस पुल का परिवर्तनकारी प्रभाव इन व्यक्तिगत अनुभवों से कहीं अधिक व्यापक है।
नई दिल्ली – केंद्र सरकार ने मुंबई हार्बर में 887 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से एक विश्व स्तरीय मरीना विकसित करने की योजना को मंजूरी दी है, इस कदम से देश की वित्तीय राजधानी में तटीय नौवहन, समुद्री पर्यटन और वॉटरफ्रंट के नेतृत्व वाले शहरी विकास को महत्वपूर्ण बढ़ावा मिलने की आशा है।
प्रस्तावित ‘विकसित भारत मुंबई मरीना’ को पोर्ट्स, शिपिंग और जलमार्ग मंत्रालय द्वारा मंजूरी मिल चुकी है, जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा वैश्विक मानक के पर्यटन स्थलों के निर्माण और भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के लिए व्यक्त किए गए दृष्टिकोण के अनुरूप है।
इस अवसर पर केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा, “‘विकसित भारत मुंबई मरीना’ की यह मंजूरी तटीय नौवहन और समुद्री पर्यटन को मजबूत करने के हमारे प्रयासों में एक महत्वपूर्ण कदम है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के दृष्टिकोण से निर्देशित, यह परियोजना विश्व स्तरीय बुनियादी ढांचे का निर्माण करेगी, सार्वजनिक उपयोग के लिए तट खोलेगी, निजी निवेश को प्रोत्साहन देगी और रोजगार के नए अवसर पैदा करेगी। यह भारत के व्यापक नीली अर्थव्यवस्था लक्ष्यों को आगे बढ़ाते हुए मुंबई को वैश्विक समुद्री पर्यटन केंद्र के रूप में स्थापित करने में मदद करेगा।
इस परियोजना को हाइब्रिड डेवलपमेंट मॉडल के माध्यम से लागू किया जाएगा, जिसके तहत मुंबई पोर्ट अथॉरिटी ईपीसी आधार पर कोर मरीना इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के लिए लगभग 470 करोड़ रुपये का निवेश करेगी, जबकि एक निजी ऑपरेटर 417 करोड़ रुपये के अनुमानित निवेश के साथ तटवर्ती सुविधाओं का विकास करेगा। मंत्रालय ने बंदरगाह प्राधिकरण के निवेश को मंजूरी दे दी है, और निविदाएं जारी कर दी गई हैं, जिनकी बोलियां 29 दिसंबर, 2025 को बंद होगी ।
केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा, “यह प्रोजेक्ट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के मुंबई को ग्लोबल मरीना डेस्टिनेशन बनाने के विज़न को दिखाता है। यह प्रोजेक्ट मैरीटाइम टूरिज्म को मज़बूत करेगा, प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को आकर्षित करेगा और इससे जुड़े सेक्टर्स में 2,000 से ज़्यादा नौकरियां पैदा करेगा, साथ ही कोस्टल और ब्लू इकॉनमी एक्टिविटीज़ में नए मौके खोलेगा।”
लगभग 12 हेक्टेयर जल क्षेत्र में योजनाबद्ध, मरीना में 30 मीटर तक की लंबाई की 424 नौकाओं को रखने की क्षमता होगी। समुद्री बुनियादी ढांचे में एक एप्रोच ट्रेस्टल, पाइल्ड ब्रेकवाटर, सर्विस प्लेटफॉर्म, पोंटून और गैंगवे शामिल होंगे जिन्हें सुरक्षित और कुशल नौका संचालन का समर्थन करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
निजी ऑपरेटर द्वारा विकसित की जाने वाली तटवर्ती सुविधाओं में एक मरीना टर्मिनल भवन, एक नमो भारत अंतर्राष्ट्रीय नौकायन स्कूल, एक समुद्री पर्यटन विकास केंद्र, होटल और क्लब हाउस सुविधाएं, एक कौशल विकास केंद्र और नौका स्टैकिंग और मरम्मत बुनियादी ढांचा शामिल होंगे।
यह प्रोजेक्ट मैरीटाइम इंडिया विजन (एमआईवी) 2030, मैरीटाइम अमृत काल विजन (एमएकेवी) 2047, सागरमाला कार्यक्रम और क्रूज़ भारत मिशन जैसे मुख्य नेशनल फ्रेमवर्क के साथ-साथ मुंबई पोर्ट अथॉरिटी के पोर्ट मास्टर प्लान 2047 के साथ संरेखित है।
यह मरीना 2,000 से अधिक रोजगार सृजित करने की उम्मीद है, जो मरीना संचालन, क्रूज़ सेवाएं, आतिथ्य और संबद्ध गतिविधियों में होंगे, जबकि तटीय अवसंरचना में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देगा। इसका उद्देश्य सार्वजनिक पहुँच को जलतट तक बेहतर बनाना और मुंबई को एक प्रमुख समुद्री पर्यटन और क्रूज़ यातायात केंद्र के रूप में मजबूती से स्थापित करना है।
फोटो कैप्शन: प्रस्तावित ‘विकसित भारत मुंबई मरीना’ का कलात्मक चित्रण, जिसे मुंबई पोर्ट अथॉरिटी द्वारा विश्वस्तरीय समुद्री पर्यटन अवसंरचना को बढ़ावा देने के लिए विकसित किया जा रहा है।
नई दिल्ली – केंद्रीय शिक्षा मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान ने आज नई दिल्ली में शिक्षण और अध्ययन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के उपयोग पर परामर्शी समिति की तीसरी बैठक की अध्यक्षता की। शिक्षा एवं पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास (डोनर) राज्य मंत्री श्री सुकांत मजूमदार; कौशल विकास एवं उद्यमिता (स्वतंत्र प्रभार) एवं शिक्षा राज्य मंत्री श्री जयंत चौधरी; समिति के सदस्य, विद्यालय शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के सचिव श्री संजय कुमार; उच्च शिक्षा विभाग के सचिव डॉ. विनीत जोशी और मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी बैठक में उपस्थित थे।
इस अवसर पर श्री प्रधान ने कहा कि एआई में शिक्षा के क्षेत्र में कुछ सबसे बड़ी चुनौतियों- विशेष रूप से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को अधिक समावेशी, सुलभ और न्यायसंगत बनाने की दिशा में- का समाधान करने की क्षमता है।
उन्होंने सदस्यों के बहुमूल्य सुझावों और विचारों की सराहना की और उन्हें धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि हम अध्ययन को विद्यार्थी-केंद्रित और व्यक्तिगत बनाने, अध्ययन परिणामों में सुधार करने, हमारे विविध विद्यार्थी समुदाय की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ-साथ विद्यार्थियों और शिक्षकों को सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
स्कूली शिक्षा संबंधी उपायों पर एक विस्तृत प्रस्तुति दी गई, जिसमें रेखांकित किया गया कि एनईपी 2020 के अनुरूप आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को स्कूली शिक्षा प्रणाली में किस प्रकार व्यवस्थित रूप से एकीकृत किया जा रहा है। प्रस्तुति में पाठ्यक्रम सुधारों- जैसे कि आधारभूत स्तर से ही आयु-उपयुक्त गणनात्मक सोच और एआई साक्षरता, परियोजना-आधारित शिक्षा और माध्यमिक स्तर पर एक कौशल विषय के रूप में एआई का औपचारिक परिचय- को शामिल किया गया। इसमें दीक्षा 2.0, ई-जादुई पिटारा, गुरु-मित्र, तारा ऐप, माई करियर एडवाइजर और विद्या समीक्षा केंद्र सहित प्रमुख राष्ट्रीय डिजिटल उपायों को भी प्रदर्शित किया गया, जो व्यक्तिगत अध्ययन, शिक्षक सहायता, कैरियर मार्गदर्शन, मूल्यांकन, बहुभाषी पहुंच और छात्र प्रगति की वास्तविक समय निगरानी के लिए एआई का लाभ उठा रहे हैं।
उच्च शिक्षा में किए जा रहे उपायों पर एक विस्तृत प्रस्तुति भी दी गई, जिसमें शिक्षण-अध्ययन प्रक्रियाओं, अनुसंधान, नवोन्मेषण और रोजगार क्षमता को सुदृढ़ करने में एआई की रूपांतरकारी भूमिका पर बल दिया गया। चर्चा में केंद्र द्वारा वित्त पोषित संस्थानों में एआई-सक्षम पाठ्यक्रम अद्यतन, कौशल-आधारित और अंतःविषयक पाठ्यक्रमों का एकीकरण और उन्नत शिक्षा तथा अनुसंधान में सहायता करने के लिए डिजिटल और वास्तविक अवसंरचना के संवर्धन की रूपरेखा प्रस्तुत की गई। प्रस्तुति में रेखांकित किया गया कि इन उपायों का उद्देश्य भविष्य के लिए तैयार स्नातकों का निर्माण करना, उच्च शिक्षा संस्थानों के भीतर नवोन्मेषण इकोसिस्टम को बढ़ावा देना और यह सुनिश्चित करना है कि भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी और समावेशी बनी रहे।
नई दिल्ली – संसद ने 17.12.2025 को सबका बीमा सबकी रक्षा (बीमा कानून संशोधन) विधेयक, 2025 पारित कर दिया है। यह विधेयक बीमा क्षेत्र से संबंधित तीन प्रमुख अधिनियमों में संशोधन करता है: बीमा अधिनियम, 1938, भारतीय जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 और भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999।
इस विधेयक की एक प्रमुख विशेषता बीमा कंपनियों में 100 प्रतिशत तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देना है, जिससे भारत में अधिक विदेशी कंपनियों के लिए रास्ते खुल जाएंगे। यह कदम पूंजी विस्तार, उन्नत तकनीक को अपनाने और वैश्विक सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों को लाने के साथ-साथ रोजगार के अवसर बढ़ाने में भी सहायक होगा। बढ़ती प्रतिस्पर्धा से उत्पादों और सेवाओं में दक्षता आएगी, जो नागरिकों के लिए फायदेमंद साबित होगी।
इंटरमीडियरीज के लिए वन-टाइम लाइसेंसिंग और लाइसेंस को सीधे रद्द करने के बजाय लाइसेंस निलंबन के प्रावधान के माध्यम से व्यापार सुगमता को बढ़ावा दिया जा रहा है। बीमाकर्ताओं के लिए, शेयर पूंजी के हस्तांतरण हेतु पूर्व नियामक अनुमोदन की सीमा को 1 प्रतिशत से बढ़ाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया है और फॉरेन रीइंश्योरेंस ब्रांच के लिए नेट ओन्ड फंड की आवश्यकता को 5,000 करोड़ रुपये से घटाकर 1,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है। इसके अलावा, एलआईसी को देश में क्षेत्रीय कार्यालय खोलने और अपने विदेशी कार्यालयों को संबंधित देशों के कानूनों एवं विनियमों के अनुरूप ढालने की स्वायत्तता प्रदान की गई है।
पॉलिसीधारकों के हितों की रक्षा के लिए, बीमा के प्रति जागरूकता फैलाने हेतु पॉलिसीधारक शिक्षा एवं संरक्षण कोष नामक एक समर्पित फंड स्थापित किया जाएगा। अब पॉलिसीधारकों का डेटा डीपीडीपी अधिनियम 2023 के अनुरूप एकत्र और संरक्षित करना अनिवार्य होगा।
विनियमन बनाने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया शुरू करके और परामर्श प्रक्रिया को अनिवार्य बनाकर नियामक गवर्नेंस को मजबूत किया जा रहा है। आईआरडीएआई को बीमाकर्ताओं और मध्यस्थों द्वारा किए गए अनुचित लाभ को वापस वसूलने की शक्ति दी जा रही है। साथ ही, दंड के प्रावधानों को तर्कसंगत बनाया जा रहा है और जुर्माना लगाने के मानकों को परिभाषित किया जा रहा है।
इन सुधारों का उद्देश्य आम लोगों, परिवारों और उद्यमों तक बीमा कवरेज का विस्तार करना, इंश्योरेंस कवरेज का विस्तार करने, व्यापार सुगमता को बढ़ावा देने और नियामक निगरानी एवं गवर्नेंस में सुधार करना है। ये सभी उपाय भारतीय बीमा क्षेत्र को मजबूत करेंगे, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को वित्तीय मजबूती प्राप्त होगी।
नई दिल्ली – राष्ट्रीय रोजगार मेला पहल अक्टूबर 2022 में शुरू की गई थी। विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 40-50 शहरों में राष्ट्रीय स्तर पर अब तक 17 रोजगार मेला आयोजित किए जा चुके हैं। इन रोजगार मेलों में भाग लेने वाले मंत्रालयों/विभागों/संगठनों आदि द्वारा कई लाख नियुक्ति पत्र जारी किए गए हैं।
विभिन्न राज्यों/जिलों के उम्मीदवारों को जारी किए गए नियुक्ति पत्रों का विवरण संबंधित मंत्रालयों/विभागों/संगठनों आदि द्वारा रखा जाता है।
ओडिशा में भुवनेश्वर, कटक और संबलपुर सहित विभिन्न स्थानों पर 17 राष्ट्रीय रोजगार मेला आयोजित किए जा चुके हैं।
राष्ट्रीय रोजगार मेला युवाओं के बीच रोजगार सृजन को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की सरकार की प्रतिबद्धता को पूरा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। रोजगार मेला केंद्रीय सरकारी मंत्रालयों/विभागों/संगठनों आदि में मिशन मोड में रिक्त पदों को शीघ्रता से भरने के लिए उत्प्रेरक का काम करता है।
रोजगार मेला आयोजनों के माध्यम से नियुक्ति पत्रों के वितरण से विभिन्न सरकारी कार्यों के निर्वहन और नागरिक सेवाओं के कुशल वितरण के लिए महत्वपूर्ण मानव संसाधनों की तैनाती में सुविधा हुई है, जिससे देश भर में रोजगार/स्वरोजगार के सृजन में सकारात्मक प्रभाव उत्पन्न हुआ है।
इसके अलावा, भर्ती प्रक्रिया के संपूर्ण डिजिटलीकरण के लिए विभिन्न पहलों के माध्यम से, जिनमें कंप्यूटर आधारित परीक्षाओं का संचालन और अभ्यर्थियों को विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में कुछ परीक्षाएं देने की सुविधा प्रदान करना शामिल है। देश के सभी हिस्सों के अभ्यर्थियों को रोजगार के अवसरों में अधिक समानता और व्यापक पहुंच का लाभ मिला है। इनमें आदिवासी और आकांक्षी जिलों के अभ्यर्थी भी शामिल हैं।
नई दिल्ली – प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 19 दिसंबर, 2025 को शाम 4:30 बजे भारत मंडपम, नई दिल्ली में पारंपरिक चिकित्सा पर दूसरे डब्ल्यूएचओ वैश्विक शिखर सम्मेलन केसमापन समारोह में भाग लेंगे। प्रधानमंत्री समापन समारोह के दौरान सभा को भी संबोधित करेंगे। यह कार्यक्रम वैश्विक, विज्ञान-आधारित और जन-केंद्रित पारंपरिक चिकित्सा एजेंडे को आकार देने में भारत के बढ़ते नेतृत्व और अग्रणी पहल को दर्शाता है।
प्रधानमंत्री ने अनुसंधान, मानकीकरण और वैश्विक सहयोग के माध्यम से पारंपरिक चिकित्सा और भारतीय ज्ञान प्रणाली को मुख्यधारा में लाने पर लगातार जोर दिया है। इस दृष्टिकोण के अनुरूप, कार्यक्रम के दौरान, प्रधानमंत्री आयुष क्षेत्र के लिए एक मास्टर डिजिटल पोर्टल, माई आयुष इंटीग्रेटेड सर्विसेज पोर्टल (एमएआईएसपी) सहित कई ऐतिहासिक आयुष पहलों का शुभारंभ करेंगे। वे आयुष मार्क का भी शुभारंभ करेंगे, जिसकी परिकल्पना आयुष उत्पादों और सेवाओं की गुणवत्ता के लिए एक वैश्विक बेंचमार्क के रूप में की गई है।
इस अवसर पर, प्रधानमंत्री योग के प्रशिक्षण पर डब्ल्यूएचओ की तकनीकी रिपोर्ट और पुस्तक “फ्रॉम रूट्स टू ग्लोबल रीच: 11 इयर्स ऑफ ट्रांसफॉर्मेशन इन आयुष” का विमोचन करेंगे। वे अश्वगंधा पर एक स्मारक डाक टिकट भी जारी करेंगे, जो भारत की पारंपरिक औषधीय विरासत की वैश्विक प्रतिध्वनि का प्रतीक है।
प्रधानमंत्री दिल्ली में नए डब्ल्यूएचओ दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्रीय कार्यालय परिसर का भी उद्घाटन करेंगे, जिसमें डब्ल्यूएचओ इंडिया कंट्री ऑफिस भी होगा, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ भारत की साझेदारी में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।
प्रधानमंत्री योग के प्रति उनके निरंतर समर्पण और इसके वैश्विक प्रचार को मान्यता देते हुए, योग के प्रचार और विकास में उत्कृष्ट योगदान के लिए वर्ष 2021-2025 के लिए प्रधानमंत्री पुरस्कार प्राप्त करने वालों को सम्मानित करेंगे। ये पुरस्कार योग को संतुलन, कल्याण और सद्भाव के लिए एक कालातीत अभ्यास के रूप में पुष्टि करते हैं, जो एक स्वस्थ और मजबूत नए भारत में योगदान देता है।
प्रधानमंत्री ट्रेडिशनल मेडिसिन डिस्कवरी स्पेस को भी देखेंगे, जो भारत और दुनिया भर में पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान प्रणालियों की विविधता, गहराई और समकालीन प्रासंगिकता को दर्शाने वाली एक प्रदर्शनी है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और आयुष मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित, शिखर सम्मेलन 17 से 19 दिसंबर, 2025 तक भारत मंडपम, नई दिल्ली में “संतुलन की पुनर्स्थापना: स्वास्थ्य और कल्याण का विज्ञान और अभ्यास ” विषय के तहत आयोजित किया जा रहा है। शिखर सम्मेलन में वैश्विक हस्तियों, नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, स्वदेशी ज्ञान धारकों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के बीच न्यायसंगत, टिकाऊ और साक्ष्य-संचालित स्वास्थ्य प्रणालियों को आगे बढ़ाने पर गहन विचार-विमर्श हुआ।
नई दिल्ली – अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (आईसीएच) की राष्ट्रीय सूची, जिसमें राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों से प्राप्त पात्र आईसीएच तत्त्व शामिल हैं, का केंद्रीय स्तर पर संधारण संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत संगीत नाटक अकादमी (एसएनए) द्वारा किया जाता है। इस सूची का निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों तथा अन्य हितधारकों द्वारा प्रस्तुत अपेक्षित प्रलेखन के आधार पर नियमित रूप से अद्यतन किया जाता है, जिसमें निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार, वंचित, जनजातीय एवं स्वदेशी परंपराओं से संबंधित तत्त्व भी सम्मिलित होते हैं। अमूर्त सांस्कृतिक विरासतों की राष्ट्रीय सूची निम्नलिखित लिंक पर उपलब्ध है: https://www.sangeetnatak.gov.in/sections/ICH.
संस्कृति मंत्रालय के क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों (जोनल कल्चरल सेंटर्स–जेडसीसी) की गुरु-शिष्य परंपरा योजना के अंतर्गत शिष्यों को वरिष्ठ कलाकारों द्वारा विभिन्न कला रूपों में प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है, जिसमें दुर्लभ एवं लुप्तप्राय: कला रूप भी शामिल हैं।
इस योजना के अंतर्गत गुरु को ₹7,500/-, संगतकार को ₹3,750/- तथा शिष्यों को ₹1,500/- प्रति माह का मानदेय प्रदान किया जाता है। यह मानदेय एक कला रूप के लिए न्यूनतम छह माह से अधिकतम एक वर्ष की अवधि के लिए देय होता है। गुरुओं के नामों की अनुशंसा राज्य के संस्कृति कार्य विभागों द्वारा की जाती है।
जोनल सांस्कृतिक केंद्र (जेडसीसी) उभरते कलाकारों के लिए मंच उपलब्ध कराकर, विद्यार्थियों एवं युवा समूहों की सहभागिता को प्रोत्साहित करके तथा शैक्षणिक संस्थानों और स्थानीय समुदायों को जोड़कर ज्ञान के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरण सुनिश्चित करते हैं। ये प्रयास युवाओं की भागीदारी बढ़ाने, सामुदायिक गौरव को सुदृढ़ करने और पारंपरिक सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों में निरंतर जन-रुचि उत्पन्न करने के माध्यम से संकटग्रस्त कला रूपों के पुनर्जीवन में प्रभावी सिद्ध हुए हैं।
छठ महापर्व का नामांकन दस्तावेज़ संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत एक स्वायत्त निकाय तथा अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (आईसीएच) से संबंधित मामलों की नोडल एजेंसी, संगीत एवं नाटक अकादमी द्वारा क्षेत्रीय निकायों एवं अन्य हितधारकों की सक्रिय सहभागिता के साथ तैयार किया गया है। यह नामांकन दस्तावेज़ 2026–27 चक्र के लिए मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में सम्मिलित किए जाने हेतु यूनेस्को को प्रस्तुत किया गया है।
भारत सरकार द्वारा स्थापित सभी जोनल सांस्कृतिक केंद्र (जेडसीसी) युवाओं पर केंद्रित विभिन्न कार्यक्रमों का क्रियान्वयन करते हैं, जो संकटग्रस्त कला रूपों के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। इन पहलों में राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सवों (आरएसएम), सांस्कृतिक उत्सवों तथा अंतर-राज्यीय विनिमय कार्यक्रमों का आयोजन शामिल है, जिनके माध्यम से युवाओं को विविध पारंपरिक प्रथाओं से परिचित कराया जाता है। इसके अतिरिक्त, कार्यशालाओं, प्रशिक्षण शिविरों एवं शिल्प प्रदर्शनियों के माध्यम से लोक नृत्य, संगीत, रंगमंच और शिल्प के क्षेत्रों में उन्हें व्यावहारिक कौशल भी प्रदान किए जाते हैं।
जोनल सांस्कृतिक केंद्र (जेडसीसी) अपने कार्यक्रमों, गतिविधियों तथा प्रदर्शन कलाओं का डिजिटल रूप में प्रलेखन करने में संलग्न हैं। इसके अंतर्गत संकटग्रस्त लोक-कला रूपों की रिकॉर्डिंग एवं दस्तावेज़ीकरण के साथ-साथ लोककथा एवं मौखिक इतिहास से संबंधित पुस्तकों, प्रतिवेदनों तथा लोक-कथाओं का मुद्रण भी किया जाता है।
यह जानकारी आज राज्यसभा में एक लिखित उत्तर के माध्यम से केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत द्वारा दी गई।
नई दिल्ली – X प्लेटफॉर्म पर एक पोस्ट में केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि किसानों, कारीगरों, महिलाओं और MSMEs की समृद्धि के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी का राजनीतिक कौशल जीत गया। उन्होंने कहा कि भारत-ओमान CEPA के तहत कुल भारतीय एक्सपोर्ट के 99.38% हिस्से पर ओमान की 98.08% टैरिफ लाइन्स पर ज़ीरो-ड्यूटी एक्सेस मिलेगी, जो कि मील का पत्थर सिद्ध होगा। श्री शाह ने कहा कि हमारे मेहनती लोगों और उद्योगों के लिए नए अवसर खोलते हुए, यह समझौता प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में हमारी व्यापार कूटनीति में आए बदलाव का प्रमाण है, जिसमें जनता के हित वैश्विक समझौतों में सबसे आगे रहते हैं।
नई दिल्ली – देश में कैंसर के बढ़ते बोझ पर संसद में कई प्रश्नों के उत्तर में विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान और प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज कैंसर की रोकथाम, निदान, उपचार, अनुसंधान और विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए वहनीयता को मजबूत करने के लिए सरकार की बहुआयामी, भविष्य के लिए तैयार रणनीति की जानकारी दी।
मंत्री ने अस्पताल में भर्ती, कैंसर के बढ़ते मामले, दवाओं की सामर्थ्य, टीके, वैश्विक सहयोग और उन्नत परमाणु उपचार तक पहुंच से संबंधित चिंताओं को दूर किया। उन्होंने कहा कि सरकार अनुसंधान, प्रौद्योगिकी और सार्वजनिक स्वास्थ्य एकीकरण द्वारा संचालित कैंसर देखभाल को चुनिंदा उत्कृष्टता से सार्वभौमिक पहुंच में बदल रही है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने स्वीकार किया कि कैंसर रोगियों और उनके परिवारों को अक्सर अस्पताल में भर्ती के दौरान भावनात्मक और लॉजिस्टिकल तनाव का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि सरकार प्रवेश प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने की दिशा में काम कर रही है, साथ ही तृतीयक अस्पतालों पर रेफरल दबाव को कम करने के लिए जिला स्तर पर कैंसर विज्ञान सुविधाओं का विस्तार कर रही है।
मंत्री ने बताया कि 2014 से देश भर में 11 टाटा मेमोरियल सेंटर अस्पताल स्थापित किए गए हैं। इसके साथ ही 300 से ज़्यादा अस्पतालों को कवर करने वाला नेशनल कैंसर केयर ग्रिड भी बनाया गया है, जो मरीज़ों के घरों के पास स्टैंडर्ड और आसानी से मिलने वाली कैंसर सेवाएं सुनिश्चित करता है। नवी मुंबई में प्लेटिनम ब्लॉक सहित बड़े विस्तार कार्य भी चल रहे हैं।
कैंसर के बढ़ते मामलों पर चिंताओं को दूर करते हुए, डॉ. सिंह ने कहा कि यह बढ़ोतरी ग्लोबल घटना है। इसके लंबी उम्र, पर्यावरणीय कारक, जीवनशैली में बदलाव और गैर-संक्रामक बीमारियों की जल्दी शुरुआत जैसे कारण हैं। मंत्री ने कहा, “आज कैंसर सिर्फ़ बुढ़ापे की बीमारी नहीं रही। शुरुआती जांच ने कई कैंसर को जानलेवा से ठीक होने लायक बना दिया है।”
डॉ. जितेंद्र सिंह ने सदन को बताया कि बोर्ड ऑफ़ रेडिएशन एंड आइसोटोप टेक्नोलॉजी (बीआरआईटी), टाटा मेमोरियल सेंटर और टीचिंग अस्पतालों जैसे संस्थानों के ज़रिए बड़े पैमाने पर रिसर्च चल रही है। यह न सिर्फ़ कैंसर पर, बल्कि रेडियोप्रोटेक्टिव एजेंटों और सटीक-लक्षित टेक्नोलॉजी के ज़रिए कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी के साइड इफ़ेक्ट को कम करने पर भी ध्यान केंद्रित कर रही है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सरकार की कैंसर देखभाल नीति में किफ़ायती इलाज सबसे अहम है। टाटा मेमोरियल सेंटर में, लगभग 60% मरीज़ों को आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं के तहत मुफ़्त या बहुत कम कीमत पर इलाज मिलता है, जबकि सशुल्क सेवाएं भी कॉर्पोरेट अस्पतालों की तुलना में काफ़ी सस्ती हैं।
मंत्री ने कहा कि सरकार सरकारी अस्पतालों और देश में दवाओं के निर्माण के ज़रिए ज़रूरी कैंसर दवाओं की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित कर रही है, जिससे महंगे आयात पर निर्भरता कम हो रही है। डॉ. जितेंद्र सिंह ने यह भी बताया कि भारत ने अपनी पहली स्वदेशी एचपीवी वैक्सीन विकसित की है, जो जैव प्रौद्योगिकी विभाग की बड़ी उपलब्धि है। यह वैक्सीन सर्वाइकल कैंसर से बचाव में मदद करती है, जो युवा भारतीय महिलाओं में सबसे आम कैंसर में से एक है।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बारे में डॉ. जितेंद्र सिंह ने “रेज़ ऑफ़ होप” पहल के तहत टाटा मेमोरियल सेंटर की अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के साथ साझेदारी पर बल दिया, जो कम और मध्यम आय वाले देशों के हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स को प्रशिक्षण दे रही है। उन्होंने कहा कि टाटा मेमोरियल मरीज़ों की देखभाल, शिक्षण और अत्याधुनिक रिसर्च को अनोखे तरीके से जोड़ता है, डीम्ड यूनिवर्सिटी के रूप में काम करता है और असम सहित कई राज्यों में कैंसर विज्ञान, पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजी और न्यूक्लियर मेडिसिन में सुपर-स्पेशियलिटी प्रशिक्षण देता है।
प्रोस्टेट कैंसर के लिए ल्यूटेटियम-177 पीएसएमए -617 जैसे एडवांस्ड थेरानोस्टिक्स पर प्रश्नों के उत्तर में, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत ने पिछले एक दशक में डायग्नोस्टिक और थेराप्यूटिक इस्तेमाल के लिए 24 स्वदेशी रेडियोआइसोटोप विकसित किए हैं। इनमें प्रोस्टेट कैंसर और बचपन के ब्लड कैंसर के लिए विश्व स्तरीय नवाचार शामिल हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि अत्याधुनिक न्यूक्लियर मेडिसिन लॉजिस्टिक्स की चुनौतियों वाले ग्रामीण इलाकों में भी किफायती और आसानी से उपलब्ध हो।
नई दिल्ली – ताजे पानी के स्पंजी जीव पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण विविध सूक्ष्मजीव समुदाय से होते हैं और उनमें यह क्षमता होती है कि वे जैव-सूचक तथा आर्सेनिक, सीसा, और कैडमियम जैसे विषैले धातुओं के शोषक दोनों रूप में कार्य कर सकते हैं और जैव उपचार के लिए एक संभावित समाधान हो सकते हैं।
जैसे-जैसे प्रदूषण पूरे विश्व में जलीय पारिस्थितिक तंत्र के लिए खतरा बनता जा रहा है, प्रकृति के अपने जल शोधक स्वच्छ वातावरण के संघर्ष में शक्तिशाली सहयोगी के रूप में उभर रहे हैं।
मीठे पानी के स्पंज, जो सबसे शुरुआती बहुकोशिकीय यूकैरियोट्स होते हैं, बड़ी मात्रा में पानी को छानते हैं और पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण होते हैं।
माइक्रोबायोलॉजी स्पेक्ट्रम (अमेरिकन सोसाइटी फॉर माइक्रोबायोलॉजी) में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन में, बोस इंस्टीट्यूट, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार का एक स्वायत्त संस्थान, के वैज्ञानिकों ने सुंदरबन डेल्टा से मीठे पानी के स्पंजों का अध्ययन किया और विषाक्त धातु प्रदूषण के जैव संकेतक के रूप में कार्य करने की उनकी क्षमता की पहचान की।
चित्र: स्पंज में धातु के अवशोषण एवं संचय को दर्शाने वाला आरेख, साथ ही जीवाणु समुदायों की विविधता जो भारी धातु प्रतिरोध और संचलन में सक्षम हैं
जीव विज्ञान विभाग के डॉ. अभ्रज्योति घोष और उनकी टीम ने बताया कि स्पंज से जुड़े सूक्ष्मजीव समुदाय प्रदूषित जल को विषमुक्त करने और पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को बनाए रखने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
यह अध्ययन, डॉ. ध्रुबा भट्टाचार्य को प्रदान की गई डीएसटी एसईआरबी राष्ट्रीय पोस्ट-डॉक्टोरल फेलोशिप द्वारा समर्थित है और सुंदरबन के ताजे पानी के स्पंजों के बीच जीवाणु विविधता पर रिपोर्ट करने वाला पहला अध्ययन भी है, जो एक अल्प अन्वेषित क्षेत्र में नई अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।
इस अध्ययन से पता चला कि स्पंजों में पाए जाने वाले जीवाणु समुदाय आसपास के पानी से भिन्न होते हैं, जो प्रजातियों और आवास द्वारा निर्धारित होते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि स्पंजों में आर्सेनिक, सीसा और कैडमियम जैसी जहरीली धातुओं का स्तर बहुत ज्यादा पाया गया, जो उनकी मजबूत जैव संचय क्षमता को प्रदर्शित करता है। गंगा के मैदानी क्षेत्र में व्यापक भारी धातु प्रदूषण के मद्देनजर ये स्पंज जैव उपचार के लिए एक आशाजनक समाधान प्रस्तुत करते हैं।
अध्ययन में यह सामने आया कि स्पंज से जुड़े जीवाणुओं में धातु आयन परिवहन, धातु प्रतिरोध एवं रोगाणुरोधी प्रतिरोध से संबंधित जीन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो केवल संचय तक ही सीमित नहीं है। ये अनुकूलनीय विशेषताएं दर्शाती हैं कि जीवाणु सहजीवी न केवल जीवित रहते हैं बल्कि विषहरण करने एवं पर्यावरणीय तनाव को कम करने में सक्रिय योगदान देते हैं, विशेष रूप से धातु-दूषित आवासों में। यह शोध स्पंज-सूक्ष्मजीव समुदाय के पारिस्थितिक महत्व को उजागर करता है और मुहाना और मीठे पानी के पारिस्थितिक तंत्र में जल की गुणवत्ता और प्रदूषण स्तर की निगरानी के लिए प्रभावी जैव संकेतक के रूप में मीठे पानी के स्पंज की भूमिका को मजबूत करता है।
माइक्रोबायोलॉजी स्पेक्ट्रम नामक पत्रिका में प्रकाशित यह अध्यन स्पंज सूक्ष्मजीव पारिस्थितिकी के संदर्भ में हमारी समझ को व्यापक बनाता है और सतत जल गुणवत्ता प्रबंधन एवं जैव उपचार रणनीतियों के लिए नए मार्ग खोलता है।