उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों को संबोधित करते हुए श्री कुमार ने कहा कि भारत विकास के ऐसे मॉडल का अनुसरण कर रहा है जो विकास, गरीबी उन्मूलन, शहरीकरण, औद्योगीकरण और कार्बन उत्सर्जन में कमी को एक साथ समाहित करता है, जो विकसित देशों द्वारा अपनाए गए ऐतिहासिक उच्च-उत्सर्जन वाले मार्गों से भिन्न है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरणीय बहस तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विकास, शासन, सुरक्षा और मानव कल्याण की एक निर्णायक चुनौती बन गया है।
सचिव ने उल्लेख किया कि पेरिस समझौते के पहले ग्लोबल स्टॉकटेक में 2030 तक वैश्विक उत्सर्जन में 43 प्रतिशत की कमी का आह्वान किया गया है। उन्होंने कहा कि विशेषकर विकसित देशों की निष्क्रियता के कारण हालांकि वैश्विक रुझान एक महत्वपूर्ण अंतर दर्शाते हैं। श्री कुमार ने बताया कि 1850 और 2019 के बीच, विकसित देशों ने वैश्विक कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन में लगभग आधा योगदान दिया, जबकि भारत का योगदान ऐतिहासिक रूप से नगण्य रहा है।
सचिव ने इस बात पर प्रकाश डाला कि भारत में विश्व की 17 प्रतिशत आबादी रहती है, लेकिन इसका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन लगभग दो टन प्रति वर्ष है, जो वैश्विक औसत से काफी कम है। उन्होंने कहा कि जहां विकसित देशों ने कोयला आधारित विकास, तेल से चलने वाले परिवहन और वनों की कटाई के माध्यम से औद्योगीकरण किया, वहीं भारत शुरू से ही स्वच्छ तरीके से औद्योगीकरण कर रहा है।
श्री कुमार ने 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य का जिक्र करते हुए कहा कि उनका उद्देश्य एक ऐसे विकसित भारत का निर्माण करना है जो अतीत की हूबहू नकल न हो। इसमें परिवहन-उन्मुख शहर, हरित ऊर्जा से संचालित होने वाले कुशल उद्योग, नवीकरणीय ऊर्जा और भंडारण को एकीकृत करने वाला विद्युत ग्रिड और सामग्री की खपत को कम करने वाली चक्रीय अर्थव्यवस्था शामिल है।
समानता और अंतरपीढ़ीगत न्याय पर जोर देते हुए श्री कुमार ने कहा कि भारत कल की गरीबी की समस्या का समाधान भविष्य के पारिस्थितिक संकट को पैदा करके हल नहीं करेगा और एक ऐसे विकास मॉडल को आगे बढ़ाना जारी रखेगा जो आने वाली पीढ़ियों के लिए गरिमा, समावेशिता, उत्पादकता और स्थिरता की रक्षा करता है।
भारत की पर्यावरणीय उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए श्री कुमार ने कहा कि एफएओ की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, भारत वन क्षेत्र में विश्व स्तर पर नौवें और वार्षिक शुद्ध वन वृद्धि में तीसरे स्थान पर है। उन्होंने इसे विकास के साथ-साथ निरंतर संरक्षण प्रयासों का प्रमाण बताया। उन्होंने आर्द्रभूमि संरक्षण के तीव्र विस्तार का भी उल्लेख किया, जिसके तहत 2025 में 11 नए रामसर स्थल जोड़े गए, जिससे रामसर स्थलों की कुल संख्या 98 हो गई है, जो एशिया में सबसे अधिक है।
सचिव ने हाल के वर्षों में मंत्रालय द्वारा किए गए प्रमुख सुधारों पर जोर दिया, जिनमें ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम, वन संरक्षण एवं संवर्धन नियम, 2025; पर्यावरण संरक्षण (दूषित स्थलों का प्रबंधन) नियम, 2025; पर्यावरण लेखापरीक्षा नियम, 2025 और परिवेश 2.0 शामिल हैं। उन्होंने कहा कि ये पहलें सतत आर्थिक गतिविधियों और समावेशी विकास को बढ़ावा देते हुए पारदर्शी, कुशल और दूरदर्शी पर्यावरण शासन के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं।
जलवायु संबंधी प्रतिबद्धताओं पर श्री कुमार ने कहा कि भारत 2030 तक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की उत्सर्जन तीव्रता में 45 प्रतिशत की कमी लाने के लक्ष्य की ओर अग्रसर है। गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से संचयी विद्युत उत्पादन क्षमता का 50 प्रतिशत प्राप्त करने का संशोधित लक्ष्य जून 2025 में निर्धारित समय से पहले ही हासिल कर लिया गया था। उन्होंने कहा कि भारत अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान (एनडीसी) को संशोधित करने की प्रक्रिया में भी है।
अपने संबोधन का समापन करते हुए, सचिव ने कहा कि जहां विकसित दुनिया ने उच्च प्रति व्यक्ति उत्सर्जन और शुद्ध वन हानि के साथ ‘‘कोयला-प्रधान औद्योगीकरण’’ मॉडल का अनुसरण किया, वहीं भारत का मार्ग कम प्रति व्यक्ति उत्सर्जन, सौर और पवन ऊर्जा के माध्यम से बड़े पैमाने पर स्वच्छ ऊर्जा विस्तार, वन एवं वृक्ष आवरण में वृद्धि तथा मिशन लाइफ के माध्यम से जीवनशैली-आधारित दृष्टिकोण पर केंद्रित है।
टीईआरआई के डब्ल्यूएसडीएस के दौरान, वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने हिम-कनेक्ट का आयोजन किया, जो हिमालयी क्षेत्र में काम कर रहे शोधकर्ताओं को स्टार्ट-अप, उद्योग जगत के नेताओं, निवेशकों और नीति निर्माताओं से जोड़ने के लिए एक विशेष मंच है। इस शिखर सम्मेलन में एक्ट4अर्थ घोषणापत्र भी जारी किया गया, जो सम्मेलन से उत्पन्न त्वरित जलवायु कार्रवाई के प्रति सामूहिक प्रतिबद्धताओं को मजबूत करता है।
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