हिंदी लेखकों को मिलने वाली रॉयल्टी का मुद्दा वाजिब हैं

हिंदी लेखकों को मिलने वाली रॉयल्टी के लेकर जारी चर्चा में के दौरान जो मुद्दे उठाए गए हैं, वे वाजिब हैं और अहम भी। लेकिन बहस समस्या की जड़ तक पहुंची है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। इसलिए इस बहस से कोई समाधान निकलेगा, इसकी संभावना भी नहीं दिखती है।पिछले कुछ दिनों से हिंदी लेखकों की रॉयल्टी का सवाल खासकर सोशल मीडिया पर खूब चर्चित रहा है। इस दौरान जो मुद्दे उठाए गए हैं, वे वाजिब हैं।

लेकिन बहस समस्या की जड़ तक पहुंची है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। इसलिए इस बहस से कोई समाधान निकलेगा, इसकी संभावना भी नहीं है। मामले की शुरुआत तब हुई जब कुछ दिन पहले लेखक और अभिनेता मानव कौल ने सोशल मीडिया पर प्रसिद्ध लेखक विनोद कुमार शुक्ल के साथ अपनी एक तस्वीर पोस्ट की। तस्वीर के साथ उन्होंने इस बात का जिक्र किया कि इतने बड़े लेखक, जिनकी दर्जनों किताबें बेहद लोकप्रिय हैं, उन पुस्तकों की रॉयल्टी के तौर पर उन्हें महज कुछ हजार रुपये ही मिलते हैं।

कौल ने बताया कि पिछले एक साल में एक प्रकाशन संस्थान से छपी तीन किताबों पर शुक्ल को सिर्फ 6000 रुपये की रॉयल्टी मिली है। एक दूसरे प्रकाशन संस्थान ने उन्हें पूरे साल के महज 8000 रुपये दिए हैं। मतलब हिंदी का एक बड़ा लेखक अपने पुस्तक लेखन से साल में 14000 रुपये मात्र ही कमा रहा है। उधर प्रकाशकों ने मीडिया से कहा कि रॉयल्टी का कोई विवाद नहीं है।

इसका विवरण हर साल लेखकों को भेजा जाता है।एक प्रकाशक ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर शुक्ल की किताब “नौकर की कमीज’ के बारे में जानकारी दी। कहा कि इस किताब के कुल पांच पेपरबैक संस्करण प्रकाशित कि गएए हैं। हर संस्करण 1100 प्रतियों का रहा है, जिसका ब्योरा नियमित रूप से रॉयल्टी स्टेटमेंट में जाता रहा है। इसकी ई-बुक भी राजकमल ने किंडल पर जारी की है, जिसकी रॉयल्टी शुक्ल को जाती रही है।

स्पष्ट है कि ये मामला आज तक नहीं उठा था, तो इसकी वजह संभवत: यही रही होगी कि विनोद कुमार शुक्ल हिंदी में मिलने वाली रॉय़ल्टी से परिचित रहते हुए प्रकाशक उन्हें जो दे रहे थे, उसे स्वीकार कर रहे होंगे। इसलिए इस विवाद में मुद्दा प्रकाशकों की बदनीयती नहीं है। मुद्दा यह है कि आखिर हिंदी में रॉयल्टी की इतनी कम दर क्यों है?

आखिर एक हिंदी लेखक सिर्फ लेखन करके जीवन क्यों नहीं गुजार सकता? इन बड़े प्रश्नों के उत्तर हिंदी की संस्कृति और हिंदी के बाजार से जुड़ती है। विनोद कुमार शुक्ल से संबंधित विवाद ने इन सवालों पर सोचने का मौका दिया है। लेकिन ऐसा नहीं किया गया और सारी बात एक घटना पर केंद्रित रह गई, तो ये मामला स्टॉर्म इन ए टी-कप बन कर रह जाएगा।

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