इस्पात सचिव ने इस बात पर प्रकाश डाला कि 2030 तक इस्पात उत्पादन क्षमता लगभग 200 से 300 मिलियन टन तक पहुंच जाएगी। उन्होंने समझाया कि यदि 1 मिलियन टन इस्पात उत्पादन के लिए 1,500 से 2,000 श्रमिकों की आवश्यकता होती है, तो अतिरिक्त 80 मिलियन टन उत्पादन से रोजगार के व्यापक अवसर पैदा होंगे। उन्होंने कहा कि कुशल मानव संसाधन की कमी रोजगार के क्षेत्र में चुनौतियां पैदा करती हैं, इसलिए कौशल विकास आवश्यक है। उन्होंने सलाह दी कि ध्यान केवल सैद्धांतिक शिक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उद्योग की मांगों के अनुरूप व्यावहारिक प्रशिक्षण की ओर बढ़ना चाहिए। सचिव महोदय ने सभी संगठनों से अनुरोध किया कि एनआईएसएसटी के साथ समझौता ज्ञापन के तहत आईटीआई छात्रों और कार्यरत कर्मचारियों के लिए कम से कम एक पाठ्यक्रम प्रायोजित करें। उन्होंने यह कहते हुए अपनी बात समाप्त की कि एनआईएसएसटी का लक्ष्य स्वयं को द्वितीयक इस्पात क्षेत्र के लिए एक आवासीय संस्थान के रूप में स्थापित करना है, जो केवल स्थानीय मानव संसाधन तक सीमित न रहकर पूरे देश के प्रशिक्षुओं की जरूरतों को पूरा करे।
उद्योग जगत ने भी आईटीआई छात्रों और इस उद्योग के कर्मचारियों दोनों के लिए इस पहल का समर्थन करने हेतु कदम आगे बढाए हैं।
इस्पात मंत्रालय की यह पहल औद्योगिक विकास और नवाचार, विशेष रूप से द्वितीयक इस्पात क्षेत्र में एक कुशल कार्यबल तैयार करने के सरकार के व्यापक विजन के अनुरूप है।
पर्यावरणीय रूप से सतत प्रथाओं को अपनाने और हरित इस्पात उत्पादन की दिशा में प्रगति के लिए चार उद्योगिक इकाइयों को ‘ग्रीन स्टील प्रमाणन’ भी प्रदान किया गया।
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