Consortium-driven innovation model initiated by IIT Madras enables immediate and appropriate technology commercialization Dr. Jitendra Singh

आईआईटी मद्रास द्वारा शुरू किया गया कंसोर्टियम-संचालित नवाचार मॉडल तत्काल और उपयुक्त प्रौद्योगिकी व्यावसायीकरण को सक्षम बनाता है: डॉ. जितेंद्र सिंह

नई दिल्ली – विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान और प्रधानमंत्री कार्यालय, परमाणु ऊर्जा विभाग, अंतरिक्ष विभाग, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन विभाग के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज आईआईटी मद्रास अनुसंधान पार्क में स्थित इमर्सिव टेक्नोलॉजी एंड एंटरप्रेन्योरशिप लैब्स (आईटीईएल) फाउंडेशन और आईआईटी मद्रास में विभिन्न उन्नत अनुसंधान सुविधाओं का दौरा किया, जहां उन्होंने शहरी गतिशीलता, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, चिकित्सा उपकरण और मस्तिष्क अनुसंधान से संबंधित चल रही परियोजनाओं की समीक्षा की।

मंत्री महोदय ने आईआईटी रिसर्च पार्क द्वारा शुरू किए गए कंसोर्टियम आधारित नवाचार मॉडल की प्रशंसा की, जो प्रौद्योगिकी के तत्काल और उचित व्यावसायीकरण को संभव बनाता है। उन्होंने बताया कि इस मॉडल को अब अन्य शैक्षणिक संस्थान और विश्वविद्यालय भी तेजी से अपना रहे हैं।

आईटीईएल फाउंडेशन, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा मान्यता प्राप्त और जुलाई 2024 में स्थापित एक धारा 8 के अंतर्गत आने वाली गैर-लाभकारी संस्था है, जो गहन प्रौद्योगिकी स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन देकर और उद्योग-अकादमिक संघों का निर्माण करके भारत को वैश्विक प्रौद्योगिकी क्षेत्र में अग्रणी बनाने की दिशा में काम कर रही है। यह मॉडल शैक्षणिक संस्थानों, उद्योग जगत के नेताओं और निवेशकों को एक साथ लाकर प्रौद्योगिकियों का सह-विकास करने और उन्हें सीधे वाणिज्यिक क्षेत्र में स्थानांतरित करने का अवसर प्रदान करता है।

शोधकर्ताओं और स्टार्टअप संस्थापकों से बातचीत करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि कंसोर्टियम दृष्टिकोण-जिसमें उद्योग की भागीदारी विकास के चरण से ही शुरू हो जाती है- यह सुनिश्चित करता है कि नवाचार वास्तविक दुनिया की जरूरतों के अनुसार हों। उन्होंने कहा कि इस तरह की एकीकृत कार्यप्रणाली से शोध परिणामों को तेजी से लागू करने योग्य समाधानों में परिवर्तित करना संभव होता है।

प्रमुख प्रदर्शनों में से एक एचएएसएचटीआईसी मोबिलिटी पहल थी, जिसका उद्देश्य भारतीय शहरों में भीषण यातायात जाम की समस्या का समाधान करना है। इस परियोजना का लक्ष्य मौजूदा सड़कों के ऊपर बने एलिवेटेड ट्रैक पर चलने वाले AI-सक्षम, छोटे आकार के इलेक्ट्रिक मोबिलिटी सिस्टम के माध्यम से 15 किलोमीटर की शहरी यात्रा को लगभग 20 मिनट में पूरा करना है। यह अवधारणा भीड़भाड़ वाले महानगरीय क्षेत्रों में पॉइंट-टू-पॉइंट कनेक्टिविटी प्रदान करने, यात्रा के समय को कम करने और सड़क बुनियादी ढांचे पर दबाव कम करने के लिए डिज़ाइन की गई है। टीम ने मंत्री महोदय को बताया कि यह सिस्टम विशेष रूप से भारतीय शहरी परिस्थितियों के लिए विकसित किया जा रहा है, जिसमें सामर्थ्य, विस्तारशीलता और स्थिरता पर विशेष ध्यान दिया गया है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र के अंतर्गत विकसित निजी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी स्टार्टअप अग्निकुल कॉस्मो के कार्यों की भी समीक्षा की। यह कंपनी लचीले और मांग के अनुरूप उपग्रह प्रक्षेपण करने के लिए डिज़ाइन किए गए प्रक्षेपण यान बनाती है। 30 मई, 2024 को, अग्निकुल ने इन-स्पेस और इसरो के सहयोग से अपना पहला सफल प्रक्षेपण किया और अपनी मुख्य तकनीक का प्रदर्शन किया। कंपनी इस वर्ष के अंत में अपने पुन: प्रयोज्य रॉकेट के वाणिज्यिक प्रक्षेपण की तैयारी कर रही है। अधिकारियों ने इस बात पर प्रकाश डाला कि ऐसे स्टार्टअप भारत के बढ़ते अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी को दर्शाते हैं।

मंत्री जी ने आईआईटी मद्रास इनक्यूबेशन सेल का दौरा किया, जिसने जलवायु प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवा, डीप-टेक और एआई-आधारित समाधानों सहित विभिन्न क्षेत्रों में 500 से अधिक स्टार्टअप को बढ़ावा दिया है। यह इनक्यूबेशन सेल स्टार्टअप को मार्गदर्शन, प्रयोगशालाओं तक पहुंच, वित्तीय सहायता और उद्योग नेटवर्क प्रदान करता है, जिससे स्टार्टअप प्रोटोटाइप से लेकर बाजार में बिकने योग्य उत्पादों तक पहुंचने में सक्षम होते हैं।

स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी नवाचार केंद्र (एचटीआईसी) में मंत्री जी को लगभग 40 चिकित्सा संस्थानों, उद्योग भागीदारों और सरकारी एजेंसियों के सहयोग से किफायती, स्वदेशी चिकित्सा उपकरणों के विकास के बारे में जानकारी दी गई। जैव प्रौद्योगिकी विभाग से प्राप्त प्रारंभिक सहायता से 2011 में स्थापित होने के बाद से, एचटीआईसी ने 12 व्यावसायिक रूप से सफल ‘मेड-इन-इंडिया’ उत्पादों को विकसित किया है, जो भारत और विदेशों में दो करोड़ से अधिक रोगियों तक पहुंच चुके हैं। यह केंद्र चिकित्सा संबंधी अधूरी जरूरतों को पूरा करने और आयातित चिकित्सा प्रौद्योगिकियों पर निर्भरता कम करने पर ध्यान केंद्रित करता है।

इस दौरे में सुधा गोपालकृष्णन ब्रेन सेंटर का दौरा भी शामिल था, जहां शोधकर्ता संपूर्ण मानव मस्तिष्क की कोशिका-स्तरीय डिजिटल 3डी छवियां तैयार कर रहे हैं। अधिकारियों ने मंत्री जी को बताया कि भारत में इस स्तर पर इतने व्यापक मानव मस्तिष्क छवि डेटा का निर्माण पहली बार हुआ है। सेंटर की “धरणी” नामक द्वितीय तिमाही मानव भ्रूण मस्तिष्क एटलस परियोजना ने मस्तिष्क मानचित्रण अनुसंधान को काफी आगे बढ़ाया है और अग्रणी अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से सहयोग प्राप्त किया है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि ये पहलें दर्शाती हैं कि शिक्षा जगत, उद्योग और सरकार के बीच समन्वित प्रयास शहरी गतिशीलता और स्वास्थ्य सेवा से लेकर अंतरिक्ष और तंत्रिका विज्ञान तक, नागरिकों को सीधे प्रभावित करने वाले क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी विकास को कैसे गति दे सकते हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि शुरुआत से ही अनुसंधान संस्थानों को उद्योग की आवश्यकताओं से जोड़ना भारत के नवाचार इको सिस्टम को मजबूत करता है और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुसार स्वदेशी प्रौद्योगिकियों को विकसित करने की देश की क्षमता को बढ़ाता है।

यह दौरा शिक्षकों, शोधकर्ताओं और उद्यमियों के साथ बातचीत के साथ समाप्त हुआ, जिसमें सफल मॉडलों को बड़े पैमाने पर लागू करने और देश के अन्य संस्थानों में इस तरह के सहयोगात्मक ढांचे को दोहराने पर बातचीत की गयी।

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