अनिल सिन्हा –
अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों की आहट से संबंधित राज्यों में राजनीतिक उठापटक तेज हो गई है। बीजेपी ने उत्तराखंड में चार महीने में तीन मुख्यमंत्री दे दिए। कर्नाटक में (हालांकि वहां चुनाव 2023 में हैं) येदियुरप्पा को सीएम की कुर्सी से हटाया और गुजरात में तो मुख्यमंत्री के साथ उनका पूरा मंत्रिमंडल ही बदल डाला। मुख्यमंत्रियों की छुट्टी करने की इस लहर की चपेट में पंजाब भी आ गया है। वहां नए मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने शपथ ले ली है। वह राज्य के पहले दलित मुख्यमंत्री हैं। वहां दलितों की आबादी करीब एक तिहाई है, लेकिन उन्हें राज्य का नेतृत्व संभालने का मौका अभी तक नहीं मिल पाया था। अगर सामाजिक प्रगति के लिहाज से देखें तो यह एक क्रांतिकारी घटना है। पंजाब की राजनीति में संपन्न किसानों का, बल्कि कहें जाट समुदाय का वर्चस्व रहा है। सिखों और हिंदुओं, दोनों में वे ही नेतृत्व में रहे हैं।
विभाजन का जख्म
भारत-पाक विभाजन में सबसे ज्यादा नुकसान पंजाब ने ही उठाया। यह इसके बावजूद हुआ कि वहां मुस्लिम लीग की राजनीति का कोई असर नहीं था और बड़े किसानों ने एक सेकुलर गठबंधन बना रखा था। विभाजन ने राज्य की राजनीति और जीवन, दोनों को बदल दिया। बंटवारे के बाद दोनों ओर सामूहिक कत्लेआम हुए और इसका नतीजा है कि पाकिस्तान वाले हिस्से में हिंदुओं-सिखों की आबादी ना के बराबर रह गई। यही हाल भारत वाले हिस्से का हुआ। यहां भी डेढ़ प्रतिशत मुसलमान रह गए। पंजाब में हिंदुओं, सिखों और मुसलमानों की आपस में गुंथी हुई जिंदगी थी। विभाजन से सब कुछ टूट गया। विभाजन के बाद वहां की राजनीति नए सिरे से शुरू हुई। इस नई राजनीति में अकाली दल और कांग्रेस के अलावा वाम दल प्रमुख भूमिका में थे।
खालिस्तानी आतंकवाद भी विभाजन से कम बड़ी परेशानी लेकर नहीं आया। इसने भी वहां के जन-जीवन को अस्त-व्यस्त किया। ऑपरेशन ब्लू स्टार जैसी घटनाएं हुईं। इसके बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या कर दी गई। राज्य के लोग इस दौर से भी निकल गए। ध्यान देने लायक बात है कि इस कठिन दौर में भी खेती और औद्योगिक उत्पादन नीचे नहीं आया।
सामाजिक-आर्थिक हिसाब से देखें तो देश के बाकी हिस्सों की तरह यहां भी दलित हाशिए पर ही हैं। करीब 32 प्रतिशत की आबादी होने के बावजूद जमीन और संपत्ति में उनका न्यूनतम हिस्सा है। सिख धर्म के कारण उन्हें उस तरह के सामाजिक उत्पीडऩ का शिकार नहीं होना पड़ता है, जो देश के बाकी हिस्सों में दिखाई देता है, लेकिन उनका आर्थिक शोषण कम नहीं है। शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में भी उनकी भागीदारी काफी कम है।
यह भी समझना गलत होगा कि समुदाय के रूप में दलित आपस में एक हैं। उनका एक तिहाई हिस्सा सिख है और मजहबी सिख कहलाता है। वे खेती से जुड़े हैं और ज्यादातर भूमिहीन किसान और खेतिहर मजदूर हैं। चर्मकार और वाल्मिकी समाज की तादाद भी अच्छी है। वे क्षेत्रीय आधार पर भी आपस में बंटे हुए हैं। उनकी राजनीतिक भागीदारी क्षेत्रीय आधार पर भी तय होती है।
कांशीराम ने अस्सी के दशक में दलितों को एक करने की कोशिश की थी और उनके प्रयासों का असर 1992 के चुनावों में दिखाई पड़ा। बीएसपी ने तब विधानसभा की नौ सीटें जीत ली थीं और उसे कुल 16 प्रतिशत वोट मिले। पार्टी ने 1996 का लोकसभा चुनाव शिरोमणि अकाली दल के साथ मिलकर लड़ा और तीन सीटों पर कब्जा किया। कांशीराम भी चुने गए। लेकिन कांशीराम के बाद बीएसपी का फोकस उत्तर प्रदेश पर ही रहा और पंजाब में पार्टी का आधार कमजोर होता गया। 2017 के चुनावों में उसे सिर्फ डेढ़ प्रतिशत वोटों से संतोष करना पड़ा।
परंपरागत रूप से दलित कांग्रेस के साथ रहे हैं। उसके जनाधार में बीएसपी की ओर से सेंध लगी थी, लेकिन अब दलित वापस इस ओर आ गए हैं। कांग्रेस ने 2017 के चुनावों में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित 34 में से 22 सीटें जीती थीं। इसे ध्यान में रख कर ही अकाली दल ने आने वाले चुनावों के लिए मायावती से गठबंधन किया है। उसने बीएसपी को बीस सीटें दी हैं। अकाली दल ने यह वादा भी किया है कि उसकी सरकार आई तो वह दलित को उपमुख्यमंत्री पद देगा।
यह कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती थी कि दलित समुदाय को वह किस तरह संतुष्ट करे। सत्ता-विरोधी भावना से डरी हुई कांग्रेस के लिए दलित समुदाय का वोट काफी मायने रखता है। कांग्रेस के इस दांव ने अकाली दल के उपमुख्यमंत्री पद के वादे को तो निरर्थक बना ही दिया है, लेकिन क्या दलित समुदाय का दिल जीतने के लिए यह काफी होगा?
मजबूरियां कम नहीं
निश्चित रूप से विपक्षी दल इस कदम के पीछे छुपी कांग्रेस की मजबूरियां गिनाएंगे। सच भी है, पंजाब में दलित मुख्यमंत्री बनाने के पीछे कुछ तात्कालिक कारण भी काम कर रहे थे। एक बड़ा कारण तो यह था कि लंबे समय से कांग्रेस का नेतृत्व कर रहे कैप्टन अमरिंदर की जगह भरने के लिए ऐसे नेता की जरूरत थी, जो पार्टी के भीतर का शक्ति-संतुलन स्थिर रखे। नवजोत सिंह सिद्धू से खार खाए कैप्टन ने उनके खिलाफ ऐसा बयान दे दिया, जिससे विपक्ष को तिल मिल गया है। वह जब चाहे इसका ताड़ बना सकता है। जाटों के दो बड़े नेता सुखजिंदर सिंह रंधावा और सुनील जाखड़ के नाम पर सहमति न हो पाना भी एक कारण रहा, जिसकी वजह से अंत में चन्नी का नाम तय करना पड़ा।
इन सबके बावजूद कांग्रेस का यह फैसला दूरगामी परिणाम ला सकता है। उत्तर प्रदेश में मायावती कांग्रेस पर निशाना साधती रही हैं। प्रतीकों की राजनीति के दौर में यह कदम अनदेखा नहीं रह सकता। यह भी ध्यान रखना होगा कि तमाम किंतु-परंतु के बावजूद यह सामाजिक प्रगति की ओर एक कदम है।

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