
रक्षा मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में भारत का रक्षा क्षेत्र अभूतपूर्व परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है और जर्मन उद्योग के साथ बढ़ती साझेदारियां दोनों देशों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो सकती हैं। श्री राजनाथ सिंह ने कहा, “हम जर्मनी के प्रमुख औद्योगिक उद्यमों की स्थापित क्षमताओं को भली-भांति पहचानते हैं, साथ ही उन्नत एवं उभरती प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में प्रसिद्ध जर्मन मिटेलस्टैंड—यानी छोटे और मध्यम आकार की कंपनियों—की ऊर्जा और गतिशीलता की भी सराहना करते हैं।” उन्होंने कहा कि भारत में भी हमारे स्टार्ट-अप और निजी उद्यम तेजी से उभरते हुए बड़े और स्थापित रक्षा उद्योगों की क्षमताओं को सुदृढ़ और पूरक बना रहे हैं। यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां भारत तथा जर्मनी स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे के पूरक हैं, और इससे हमारी साझेदारी को अधिक गहराई दी जा सकती है।
श्री राजनाथ सिंह ने आधुनिक वैश्विक चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना करने के लिए समन्वित प्रतिक्रियाओं और विश्वसनीय रणनीतिक साझेदारियों की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और जर्मन चांसलर श्री फ्रेडरिक मर्ज़ ने इस रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने पर विशेष जोर दिया है। हम यूरोपीय संघ के स्तर पर भी विचारों में स्पष्ट सामंजस्य देखते हैं, जो भारत के साथ बढ़ती भागीदारी में परिलक्षित होता है—जिसमें भारत-यूरोपीय संघ रक्षा और व्यापक रणनीतिक सहयोग भी शामिल है।
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रक्षा मंत्री ने दोहराया कि भारत और जर्मनी केवल रणनीतिक साझेदार ही नहीं हैं, बल्कि वर्तमान वैश्विक विमर्श को दिशा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने कहा, “हम साझा मूल्यों से जुड़े परिपक्व लोकतंत्र हैं और लचीलेपन, नवाचार तथा सुदृढ़ औद्योगिक भावना से संचालित गतिशील अर्थव्यवस्थाएं हैं। श्री सिंह ने कहा कि कानून निर्माता व समिति के सम्मानित सदस्यों के रूप में, आपका मार्गदर्शन, आपकी आवाज तथा आपका समर्थन हमारे रक्षा एवं रणनीतिक सहयोग के भविष्य को और अधिक सशक्त तथा समृद्ध बना सकता है। उन्होंने कहा कि जब इस युग का इतिहास लिखा जाएगा, तब भारत-जर्मनी साझेदारी कूटनीति के एक उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में सामने आएगी—एक ऐसी साझेदारी, जो किसी संकट की प्रतिक्रिया में नहीं, बल्कि दो परिपक्व लोकतंत्रों के साझा संकल्प और दूरदृष्टि के आधार पर विकसित हुई है।
श्री राजनाथ सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि वर्तमान भू-राजनीतिक अस्थिरता को अब केवल क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य में नहीं देखा जा सकता। उन्होंने कहा कि इसके प्रभाव वैश्विक होते हैं और ये केवल स्थानीय अशांति नहीं, बल्कि ऐसी गंभीर परिस्थितियां हैं जिनका ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा तथा वैश्विक आर्थिक स्थिरता पर व्यापक एवं दूरगामी असर पड़ता है, साथ ही इनसे भारी मानवीय क्षति भी होती है। उन्होंने कहा, “भारत जैसे विकासशील देश के लिए, जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के एक बड़े हिस्से के लिए पश्चिम एशिया पर निर्भर है, होर्मुजजलडमरूमध्य में किसी भी प्रकार की बाधा कोई दूरस्थ घटना नहीं है; यह एक ऐसी वास्तविकता है, जिसका हमारी सुरक्षा एवं आर्थिक स्थिरता पर सीधा व तात्कालिक प्रभाव पड़ता है।”
रक्षा मंत्री ने इन चुनौतियों और उनके प्रत्यक्ष प्रभावों को ध्यान में रखते हुए कहा कि भारत ने एक सक्रिय एवं समन्वित रणनीति अपनाई है। उन्होंने सांसदों को बताया कि पश्चिम एशिया से जुड़े मामलों पर मंत्रियों का एक समूह निरंतर बदलती परिस्थितियों का आकलन कर रहा है और उनके प्रभाव को कम करने के लिए समयबद्ध सुझाव दे रहा है। श्री सिंह ने कहा, “प्रमुख मंत्रालयों के बीच समन्वय स्थापित करते हुए हमारी प्राथमिकता ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखना, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना, महंगाई के दबाव को नियंत्रित करना तथा नागरिकों और उद्योगों को बाहरी व्यवधानों से सुरक्षित रखना रही है। यह वैश्विक संकटों का सामना शांत संयम, दूरदर्शिता एवं प्रभावी संस्थागत तालमेल के साथ करने की भारत की क्षमता को दर्शाता है।”
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सांसद एवं समिति के अध्यक्ष श्री थॉमस रोवेकैम्प ने सांसदों के साथ संवाद के लिए श्री राजनाथ सिंह का स्वागत किया। इससे पहले रक्षा मंत्री ने बर्लिन स्थित हम्बोल्ट विश्वविद्यालय परिसर में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर को पुष्पांजलि अर्पित की और भारत तथा जर्मनी के बीच के चिरस्थायी सांस्कृतिक एवं बौद्धिक संबंधों को रेखांकित किया।
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गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का 20वीं सदी की शुरुआत में जर्मनी के साथ गहरा और सार्थक संबंध रहा, जिसकी पहचान उनके व जर्मन विचारकों, कलाकारों तथा बुद्धिजीवियों के बीच पारस्परिक सम्मान और प्रशंसा से होती थी। जर्मनी के साथ उनका यह जुड़ाव सांस्कृतिक आदान-प्रदान, समृद्ध बौद्धिक संवाद और साझा मानवीय मूल्यों पर आधारित था। जर्मनी ने पूरे यूरोप में उनके साहित्य और विचारों को परिचित कराने तथा लोकप्रिय बनाने में एक अहम भूमिका निभाई।
रक्षा मंत्री के बर्लिन हवाई अड्डे पर पहुंचने पर उनका सैन्य सम्मान के साथ गरिमापूर्ण स्वागत किया गया। म्यूनिख से बर्लिन की अपनी यात्रा के दौरान उन्हें जर्मन वायु सेना के विशेष विमान से लाया गया, जिसकी सुरक्षा के लिए लड़ाकू विमान भी साथ-साथ उड़ान भर रहे थे।
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