
केंद्रीय मंत्री ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जनजातीय सशक्तिकरण के लिए आरंभ की गई कई पहलों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पहली बार जनजातीय समुदायों के तीन सदस्यों को केंद्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल किया गया है। उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय नायकों के योगदान को मान्यता देने पर प्रधानमंत्री के जोर और भगवान बिरसा मुंडा की जयंती 15 नवंबर को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ घोषित करने का भी जिक्र किया जिसे देश भर के सभी जनजातीय समुदायों का सम्मान बताया।

श्री रिजिजू ने यह भी कहा कि जनजातीय समुदायों ने राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन समुदाय के कई लोग अपने ऐतिहासिक योगदान और अंदरूनी ताकत से अनजान हैं। इस संदर्भ में, उन्होंने ऐसे विद्वानों के काम के प्रकाशन को बहुत महत्वपूर्ण बताया, लेखक की प्रशंसा की और इस पुस्तक को बढ़ावा देने के लिए समर्थन का आश्वासन दिया।
श्री रिजिजू ने कहा कि आज़ादी के लगभग 60-70 वर्ष तक, जनजातीय समुदायों का प्रतिनिधित्व ज़्यादातर प्रतीकात्मक ही रहा। दिल्ली विश्वविद्यालय में अपने विद्यार्थी जीवन को याद करते हुए, उन्होंने कहा कि कुछ ही संगठन और व्यक्ति थे जो सच में जनजातीय समाज को समझते थे और ईमानदारी से उनके बीच काम करते थे। उन्होंने वनवासी कल्याण आश्रम को ऐसा ही एक संगठन बताया जिसने समुदायों के साथ रहते हुए सेवा की। उन्होंने धर्मांतरण के बहाने सेवा के नाम पर जनजातीय समुदायों के साथ जुड़ने के खिलाफ चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि ऐसी प्रथाएं उनकी संस्कृति को कमजोर करती हैं और उनकी मूल पहचान को खत्म करती हैं। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि जनजातीय समाज के लिए पहचान और सम्मान सबसे ज़रूरी हैं।
पुस्तक विमोचन कार्यक्रम आईजीएनसीए के जनपद संपदा प्रभाग ने अपनी ज्ञानपथ श्रृंखला के तहत आयोजित किया। श्री रिजिजू इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए, जबकि राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (एनसीएसटी) के अध्यक्ष श्री अंतर सिंह आर्य विशिष्ट अतिथि थे। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की सदस्य डॉ. आशा लाकड़ा विशेष अतिथि के रूप में मौजूद रही।
एनसीएसटी के अध्यक्ष श्री अंतर सिंह आर्य ने जनजातीय समाज से जुड़े समकालीन मुद्दों, नीतिगत हस्तक्षेपों और स्थायी सांस्कृतिक संरक्षण की आवश्यकता पर बात की। डॉ. आशा लाकड़ा ने कहा कि पुस्तक के विषय सामाजिक न्याय और समावेशी विकास के व्यापक ढांचे में हैं।
यह पुस्तक जानी-मानी समाजशास्त्री और शिक्षाविद डॉ. स्वीटी तिवारी ने लिखी है। उन्होंने अपने काम के बारे में बात करते हुए जनजातीय समाज की ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक यात्रा पर बात की। उन्होंने कहा कि सबसे मुश्किल समय में भी जनजातीय समाज की लौ कभी धीमी नहीं पड़ी। सामाजिक उपेक्षा की ओर ध्यान दिलाते हुए, उन्होंने कहा कि गंगा-जमुनी तहज़ीब के बारे में तो बहुत बात होती है, लेकिन गंगा-दामोदर तहज़ीब के बारे में कम बात होती है। उन्होंने कहा कि दामोदर नदी झारखंड से बहती है, जो ऐसा राज्य है जहाँ बड़ी संख्या में जनजातीय आबादी रहती है। उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि शिक्षा सिर्फ़ साक्षरता नहीं है, बल्कि अधिकारों के बारे में जागरूकता है।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के जनपद संपदा प्रभाग के चेयरमैन प्रो. के. अनिल कुमार ने स्वागत भाषण दिया। उन्होंने ज्ञानपथ श्रृंखला की अवधारणा को समकालीन बौद्धिक चर्चा के लिए मज़बूत मंच बताया। इस अवसर पर वनवासी कल्याण आश्रम के श्री सुरेश कुलकर्णी भी मौजूद थे।
इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विद्वानों, शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और संस्कृति में रुचि रखने वाले दर्शकों ने हिस्सा लिया, और भारतीय जनजातीय समाज की गहरी, बहुआयामी समझ में योगदान दिया।
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