बैठक के दौरान स्थायी समिति ने वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के प्रावधानों के अनुसार संरक्षित क्षेत्रों, वन्यजीव अभयारण्यों, बाघ अभ्यारण्यों और पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्रों और उसके आसपास स्थित वन्यजीव संरक्षण और विकास परियोजनाओं से संबंधित प्रस्तावों पर चर्चा की। पारिस्थितिकीय संवेदनशीलता, वैधानिक आवश्यकताओं और निर्धारित जोखिमों को कम करने या रोकने के उपायों को ध्यान में रखते हुए प्रस्तावों की जांच पड़ताल की गई।
समिति ने संचार अवसंरचना, ऑप्टिकल फाइबर केबल, बिजली ट्रांसमिशन लाइन, सड़क परियोजनाएं, पेयजल आपूर्ति, तापीय ऊर्जा, रक्षा, सिंचाई और अन्य अवसंरचना जैसे क्षेत्रों में कुल 58 नए प्रस्तावों पर विचार किया।
समिति ने कई महत्वपूर्ण नीतिगत मामलों पर भी विचार-विमर्श किया। इनमें डॉल्फिन, घड़ियाल आदि जैसे जलीय जीवों के संरक्षण के लिए चंबल नदी में पर्यावरणीय प्रवाह (ई-फ्लो) बनाए रखने का पारिस्थितिक महत्व, बाघ अभ्यारण्यों के भीतर स्थित गांवों के सामाजिक, आर्थिक और पारिस्थितिक पहलुओं की स्थिति, वन्यजीव प्रबंधन के लिए घास के मैदानों का महत्व और मानव-तेंदुआ संबंधों की वर्तमान चुनौतियों के प्रबंधन की रणनीतियों पर चर्चा की गई।
बैठक में भारतीय वन्यजीव संस्थान, भारतीय वानिकी अनुसंधान और शिक्षा परिषद और केंद्रीय जल आयोग सहित वैज्ञानिक और तकनीकी संस्थानों की भागीदारी पर भी जोर दिया गया, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि संरक्षण नीतियों को मजबूत अनुसंधान और अंतर-क्षेत्रीय समन्वय द्वारा समर्थित किया जा सके।
राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत गठित एक वैधानिक निकाय है। इसे वन्यजीवों और वनों के संरक्षण और सुरक्षा से संबंधित मामलों पर सरकार को सलाह देने का अधिकार दिया गया है। साथ ही यह सुनिश्चित करना भी इसका दायित्व है कि संरक्षित क्षेत्रों में और उसके आसपास विकास गतिविधियों को स्थायी और संतुलित तरीके से किया जाए।
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