Ram temple will become the basis of reconstruction of the nation

*प्रो. (डॉ.) संजय द्विवेदी, पूर्व महानिदेशक, भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली*

Dr.Sanjay

आज पूरी दुनिया उत्सुकता के साथ 22 जनवरी के ऐतिहासिक क्षण का इंतजार कर रही है। दुनिया में कोई भी देश हो, अगर उसे विकास की नई ऊंचाई पर पहुंचना है, तो उसे अपनी विरासत को संभालना ही होगा। हमारी विरासत, हमें प्रेरणा देती है, हमें सही मार्ग दिखाती है। इसलिए आज का भारत, पुरातन और नूतन दोनों को आत्मसात करते हुए आगे बढ़ रहा है। एक समय था जब अयोध्या में राम लला टेंट में विराजमान थे, लेकिन आज राम मंदिर का भव्य निर्माण हो रहा है। राम मंदिर का निर्माण एक अनथक संघर्ष का प्रतीक है। अयोध्या यानि वह भूमि जहां कभी युद्ध न हुआ हो। ऐसी भूमि पर कलयुग में एक लंबी लड़ाई चली और त्रेतायुग में पैदा हुए रघुकुल गौरव भगवान श्रीराम को आखिरकार छत नसीब होने वाली है। राजनीति कैसे साधारण विषयों को भी उलझाकर मुद्दे में तब्दील कर देती है, रामजन्मभूमि का विवाद इसका उदाहरण है। आजादी मिलने के समय सोमनाथ मंदिर के साथ ही यह विषय हल हो जाता तो कितना अच्छा होता। आक्रमणकारियों द्वारा भारत के मंदिरों के साथ क्या किया गया, यह छिपा हुआ तथ्य नहीं है। किंतु उन हजारों मंदिरों की जगह, अयोध्या की जन्मभूमि को नहीं रखा जा सकता। एक ऐतिहासिक अन्याय की परिणति आखिरकार ऐतिहासिक न्याय ही होता है। यह बहुत संतोष की बात है कि भारत की न्याय प्रक्रिया के तहत आए फैसले से मंदिर का निर्माण संपन्न हुआ है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस अर्थ में गौरवशाली हैं कि उनके कार्यकाल में इस विवाद का सौजन्यतापूर्ण हल निकल सका और मंदिर निर्माण हो सका।

इस आंदोलन से जुड़े अनेक नायक आज दुनिया में नहीं हैं। उनकी स्मृति आती है। मुझे ध्यान है उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के नेता और मंत्री रहे श्री दाऊदयाल खन्ना ने मंदिर के मुद्दे को आठवें दशक में जोरशोर से उठाया था। उसके साथ ही श्री अशोक सिंहल जैसे नायक का आगमन हुआ और उन्होंने अपनी संगठन क्षमता से इस आंदोलन को जनांदोलन में बदल दिया। संत रामचंद्र परमहंस, महंत अवैद्यनाथ जैसे संत इस आंदोलन से जुड़े और समूचे देश में इसे लेकर एक भावभूमि बनी। तब से लेकर आज तक सरयू नदी ने अनेक जमावड़े और कारसेवा के प्रसंग देखे हैं। सुप्रीम कोर्ट के सुप्रीम फैसले के बाद जिस तरह का संयम हिंदू समाज ने दिखाया वह भी बहुत महत्त्व का विषय है। क्या ही अच्छा होता कि इस कार्य को साझी समझ से हल कर लिया जाता। किंतु राजनीतिक आग्रहों ने ऐसा होने नहीं दिया। कई बार जिदें कुछ देकर नहीं जातीं, भरोसा, सद्भाव और भाईचारे पर ग्रहण जरुर लगा देती हैं।

दुनिया के किसी देश में यह संभव नहीं है उसके आराध्य इतने लंबे समय तक मुकदमों का सामना करें। किंतु यह हुआ और सारी दुनिया ने इसे देखा। यह भारत के लोकतंत्र, उसके न्यायिक-सामाजिक मूल्यों की स्थापना का समय भी है। यह सिर्फ मंदिर नहीं है जन्मभूमि है, हमें इसे कभी नहीं भूलना चाहिए। विदेशी आक्रांताओं का मानस क्या रहा होगा, कहने की जरुरत नहीं है। किंतु हर भारतवासी का राम से रिश्ता है, इसमें भी कोई दो राय नहीं है। वे हमारे प्रेरणापुरुष हैं, इतिहास पुरुष हैं और उनकी लोकव्याप्ति विस्मयकारी है। ऐसा लोकनायक न सदियों में हुआ है और न होगा। लोकजीवन में, साहित्य में, इतिहास में, भूगोल में, हमारी प्रदर्शनकलाओं में उनकी उपस्थिति बताती है राम किस तरह इस देश का जीवन हैं।

राम शब्द संस्कृत की ‘रम’ क्रीड़ायाम धातु से बना है अर्थात हरेक मनुष्य के अंदर रमण करने वाला जो चैतन्य-स्वरूप आत्मा का प्रकाश विद्यमान है, वही राम है। राम को शील-सदाचार, मंगल-मैत्री, करुणा, क्षमा, सौंदर्य और शक्ति का पर्याय माना गया है। कोई व्यक्ति सतत साधना के द्वारा अपने संस्कारों का परिशोधन कर राम के इन तमाम सद्गुणों को अंगीकार कर लेता है, तो उसका चित्त इतना निर्मल और पारदर्शी हो जाता है कि उसे अपने अंत:करण में राम के अस्तित्व का अहसास होने लगता है। कदाचित यही वह अवस्था है जब संत कबीर के मुख से निकला होगा,

*‘मोको कहां ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में*

*ना मैं मंदिर ना मैं मस्जिद, ना काबे कैलास में।’*

राम, दशरथ और कौशल्या के पुत्र थे। संस्कृत में दशरथ का अर्थ है- दस रथों का मालिक। अर्थात पांच कर्मेंद्रियों और पांच ज्ञानेंद्रियों का स्वामी। कौशल्या का अर्थ है- ‘कुशलता’। जब कोई अपनी कर्मेंद्रियों पर संयम रखते हुए अपनी ज्ञानेंद्रियों को मर्यादापूर्वक सन्मार्ग की ओर प्रेरित करता है, तो उसका चित्त स्वाभाविक रूप से राम में रमने लगता है। पूजा-अर्चना की तमाम सामग्रियां उसके लिए गौण हो जाती हैं। ऐसे व्यक्ति का व्यक्तित्व इतना सहज और सरल हो जाता है कि वह जीवन में आने वाली तमाम मुश्किलों का स्थितप्रज्ञ होकर मुस्कुराते हुए सामना कर लेता है। भारतीय जनमानस में राम का महत्व इसलिए नहीं है कि उन्होंने जीवन में इतनी मुश्किलें झेलीं, बल्कि उनका महत्व इसलिए है, क्योंकि उन्होंने उन तमाम कठिनाइयों का सामना बहुत ही सहजता से किया। उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम भी इसलिए कहते हैं, क्योंकि अपने सबसे मुश्किल क्षणों में भी उन्होंने स्वयं को बेहद गरिमापूर्ण रखा।

राम का होना मर्यादाओं का होना है, रिश्तों का होना है, संवेदना का होना है, सामाजिक न्याय का होना है, करुणा का होना है। वे सही मायनों में भारतीयता के उच्चादर्शों को स्थापित करने वाले नायक हैं। उन्हें ईश्वर कहकर हम अपने से दूर करते हैं। जबकि एक मनुष्य के नाते उनकी उपस्थिति हमें अधिक प्रेरित करती है। एक आदर्श पुत्र, भाई, सखा, न्यायप्रिय नायक हर रुप में वे संपूर्ण हैं। उनके राजत्व में भी लोकतत्व और लोकतंत्र के मूल्य समाहित हैं। वे जीतते हैं किंतु हड़पते नहीं। सुग्रीव और विभीषण का राजतिलक करके वे उन मूल्यों की स्थापना करते हैं जो विश्वशांति के लिए जरुरी हैं। वे आक्रामणकारी और विध्वंशक नहीं है। वे देशों का भूगोल बदलने की आसुरी इच्छा से मुक्त हैं। वे मुक्त करते हैं बांधते नहीं। अयोध्या उनके मन में बसती है। इसलिए वे कह पाते हैं,

*जननी जन्मभूमिश्य्च स्वर्गादपि गरीयसी।*

यानि जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान है। अपनी माटी के प्रति यह भाव प्रत्येक राष्ट्रप्रेमी नागरिक का भाव होना चाहिए। वे नियमों पर चलते हैं। अति होने पर ही शक्ति का आश्रय लेते हैं। उनमें अपार धीरज है। वे समुद्र की तीन दिनों तक प्रार्थना करते हैं।

*विनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति*

*बोले राम सकोप तब भय बिनु होहिं न प्रीति।*

यह उनके धैर्य का उच्चादर्श है। वे वाणी से, कृति से किसी को दुख नहीं देना चाहते हैं। वे चेहरे पर हमेशा मधुर मुस्कान रखते हैं। उनके घीरोदात्त नायक की छवि उन्हें बहुत अलग बनाती है। वे जनता के प्रति समर्पित हैं। इसलिए तुलसीदास जी रामराज की अप्रतिम छवि का वर्णन करते हैं-

*दैहिक दैविक भौतिक तापा, रामराज काहुंहिं नहीं व्यापा।*

राम ने जो आदर्श स्थापित किए उस पर चलना कठिन है। किंतु लोकमन में व्याप्त इस नायक को सबने अपना आदर्श माना। राम सबके हैं। वे कबीर के भी हैं, रहीम के भी हैं, वे गांधी के भी हैं, लोहिया के भी हैं। राम का चरित्र सबको बांधता है। अनेक रामायण और रामचरित पर लिखे गए महाकाव्य इसके उदाहरण हैं। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त स्वयं लिखते हैं-

*राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है*

*कोई कवि बन जाए, सहज संभाव्य है।*

भगवान श्रीराम भारतीय संस्कृति के ऐसे वटवृक्ष हैं, जिनकी पावन छाया में मानव युग-युग तक जीवन की प्रेरणा और उपदेश लेता रहेगा। जब तक श्रीराम जन-जन के हृदय में जीवित हैं, तब तक भारतीय संस्कृति के मूल तत्व अजर-अमर रहेंगे। श्रीराम भारतीय जन-जीवन में धर्म भावना के प्रतीक हैं, उनमें मानवोचित और देवोचित गुण थे, इसीलिए वे “मर्यादा पुरुषोत्तम” कहलाए। भगवान श्रीराम का जीवन चरित्र भारत की सीमाओं को लांघकर विदेशियों के लिए भी शांति, प्रेरणा और नवजीवनदायक बनता जा रहा है। श्रीराम धर्म के साक्षात् स्वरूप हैं, धर्म के किसी अंग को देखना है, तो राम का जीवन देखिये, आपको धर्म की असली पहचान हो जायेगी। धर्म की पूर्णता उनके जीवन में आद्यन्त घटित हुई है।

श्रीराम ने लौकिक धरातल पर स्थिर रहकर धर्म एवं मर्यादा का पालन करते हुए मानव को असत्य से सत्य की ओर, अधर्म से धर्म की ओर तथा अन्याय से न्याय की ओर चलने की प्रेरणा दी है। कर्त्तव्य की वेदी पर अपने व्यक्तिगत सुख-प्रलोभनों की आहुति श्रीराम की जीवन कहानी का सार है। संसार में महापुरुष अपने जीवन, गुण, कर्म, स्वभाव, कर्त्तव्य, बुद्धि, तप-त्याग और तपस्या से जो अमर जीवन-संदेश देते हैं, वही मानवता की स्थायी धरोहर होती है। हमारा सौभाग्य है कि हम ऐसे दैवीय गुणों के धनी मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र की संताने हैं। श्रीराम का प्रेरक चरित्र भूली-भटकी मानव जाति में नवजीवन चेतना का संचार कर सकता है। उनके जीवन की घटनाएं आज के भोगी विलासी और मानवता का गला घोंटने वाले नामधारी मनुष्य को बहुत कुछ सोचने, करने और जीने की प्रेरणा दे सकती है। उनके जीवन के प्रत्येक क्रियाकलाप से अमर संदेश मिलता है। श्रीराम के द्वारा दर्शित आदर्शों एवं जीवन मूल्यों का भारतीय समाज में बहुत ऊंचा स्थान है। यदि हम सबक लेना चाहें, तो रामायण की प्रत्येक घटना से बहुत कुछ सीखा जा सकता है।

लक्ष्मण जी का श्रीराम जी के साथ वन-गमन करना, भरत जी का राज्य को ठुकराना, पादुका रखकर शासन-व्यवस्था चलाना, परस्पर भाइयों की प्रीति का श्रेष्ठ उदाहरण है। आज भाई-भाई एक दूसरे के रक्त के प्यासे हो रहे हैं, परिवार परस्पर की कलह के कारण टूट रहे हैं। सर्वत्र स्वार्थ, अहंकार और अकेले भोगने की भावना उद्दाम हो रही है। ऐसे में रामायण हमें शिक्षा देती है कि नश्वर सुख-भोग और धन-धाम-धरा के लिए परस्पर लड़ना नहीं चाहिए। चित्रकूट प्रवास-काल में शूर्पणखा द्वारा श्रीराम को अपनी ओर आकर्षित करके विवाह का प्रस्ताव रखने पर राम द्वारा दृढ़ता से मना कर देना प्रेरणा देता है कि यदि जीवन को सुखी और शान्तिमय बनाना है, तो एक पत्नीव्रत का आचरण करना चाहिए। स्वर्णमृग को देखकर सीताजी का उसे पाने की इच्छा करना तथा भगवान राम द्वारा मायावी मृग को पाने के लिए पीछे दौड़ना और सीता जी का हरण हो जाने की घटना आज के जीवन प्रसंगों को बहुत कुछ प्रेरणा दे सकती है। आज का मनुष्य धन की मृगतृष्णा के पीछे पागलों की तरह दौड़ा जा रहा है, जो प्राप्त है उससे संतुष्ट नहीं हो पा रहा है। विज्ञान की चमकीली, भड़कीली, दिखावटी, बनावटी चीजों के पीछे दिन-रात अधर्म-असत्य, छल-प्रपंच का सहारा लेकर दौड़ा जा रहा है। इससे हानि यह हुई है कि आत्मारूपी सीता छिन गई है, भौतिकवादी व्यक्ति सिर्फ शरीर के लिए जीने लगा है तथा इसी मृगतृष्णा में वह जीवन का अंत कर लेता है। रामायण कहती है दुनिया में आंखें खोलकर चलो, सभी चमकने वाली चीजें सोना नहीं होती हैं। चमक-दमक में व्यक्ति हमेशा धोखा खाता है, इसी धोखे में आत्मरूपी सीता का रावण द्वारा हरण होता है तथा बाद में राम-रावण का निर्णायक युद्ध होता है। यदि रामायण से कुछ सीखना है, तो चरित्र निर्माण, विचारों की उच्चता, भावों की शुद्धता, पवित्रता तथा जीवन को धर्म-मर्यादा एवं उच्चादर्श की ओर ले चलना सीखें। सीता जी का राम जी के साथ वन जाना संसार के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ देता है। वनवास राम जी को मिला था, सीता जी को नहीं, रामायण में वनवास का प्रसंग यह शिक्षा देता हैं की नारी की परीक्षा संपत्ति में नहीं विपत्ति में होती है।

राम अपने जीवन की सरलता, संघर्ष और लोकजीवन से सहज रिश्तों के नाते कवियों और लेखकों के सहज आकर्षण का केंद्र रहे हैं। उनकी छवि अति मनभावन है। वे सबसे जुड़ते हैं, सबसे सहज हैं। उनका हर रूप, उनकी हर भूमिका इतनी मोहनी है कि कविता अपने आप फूटती है। किंतु सच तो यह है कि आज के कठिन समय में राम के आदर्शों पर चलता साधारण नहीं है। उनसी सहजता लेकर जीवन जीना कठिन है। वे सही मायनों में इसीलिए मर्यादा पुरुषोत्तम कहे गए। उनका समूचा व्यक्तित्व राजपुत्र होने के बाद भी संघर्षों की अविरलता से बना है। वे कभी सुख और चैन के दिन कहां देख पाते हैं। वे लगातार युद्ध में हैं। घर में, परिवार में, ऋषियों के यज्ञों की रक्षा करते हुए, आसुरी शक्तियों से जूझते हुए, निजी जीवन में दुखों का सामना करते हुए, बालि और रावण जैसी सत्ताओं से टकराते हुए। वे अविचल हैं। योद्धा हैं। उनकी मुस्कान मलिन नहीं पड़ती। अयोध्या लौटकर वे सबसे पहले मां कैकेयी का आशीर्वाद लेते हैं। यह विराटता सरल नहीं है। पर राम ऐसे ही हैं। सहज-सरल और इस दुनिया के एक अबूझ से मनुष्य।

राम भक्त वत्सल हैं, मित्र वत्सल हैं, प्रजा वत्सल हैं। उनकी एक जिंदगी में अनेक छवियां हैं। जिनसे सीखा जा सकता है। अयोध्या का मंदिर इन सद् विचारों, श्रेष्ठ जीवन मूल्यों का प्रेरक बने। राम सबके हैं। सब राम के हैं। यह भाव प्रसारित हो तो देश जुड़ेगा। यह देश राम का है। इस देश के सभी नागरिक राम के ही वंशज हैं। हम सब उनके ही वैचारिक और वंशानुगत उत्तराधिकारी हैं, यह मानने से दायित्वबोध भी जागेगा, राम अपने से लगेगें। जब वे अपने से लगेगें तो उनके मूल्यों और उनकी विरासतों से मुंह मोड़ना कठिन होगा। सही मायनों में ‘रामराज्य’ आएगा। कवि बाल्मीकि के राम, तुलसी के राम, गांधी के राम, कबीर के राम, लोहिया के राम, हम सबके राम हमारे मनों में होंगे। वे तब एक प्रतीकात्मक उपस्थिति भर नहीं होंगे, बल्कि तात्विक उपस्थिति भी होंगे। वे सामाजिक समरसता और ममता के प्रेरक भी बनेंगे और कर्ता भी। इसी में हमारी और इस देश की मुक्ति है।

आज के भारत का मिजाज़, अयोध्या में स्पष्ट दिखता है। आज यहां प्रगति का उत्सव है, तो कुछ दिन बाद यहां परंपरा का उत्सव भी होगा। आज यहां विकास की भव्यता दिख रही है, तो कुछ दिनों बाद यहां विरासत की भव्यता और दिव्यता दिखने वाली है। यही तो भारत है। विकास और विरासत की यही साझा ताकत, भारत को 21वीं सदी में सबसे आगे ले जाएगी।

***************************

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *