Protection of tribal identity and collective rights
नई दिल्ली – केंद्रीय जनजातीय कार्य राज्य मंत्री श्री दुर्गादास उइके ने आज लोकसभा में एक गैर-तारांकित प्रश्न का उत्तर देते हुए बताया कि वन अधिकार अधिनियम, 2006 अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों द्वारा वन भूमि और संसाधनों पर उनके अधिकारों की लंबे समय से चली आ रही अवहेलना को दूर करने के उद्देश्य से अधिनियमित किया गया था। अधिनियम की धारा 3(1)(i) में स्पष्ट रूप से “किसी भी सामुदायिक वन संसाधन की रक्षापुनर्जननसंरक्षण या प्रबंधन के अधिकार” का प्रावधान हैजिसे वे पारंपरिक रूप से सतत उपयोग के लिए संरक्षित और सुरक्षित करते आ रहे हैं।

जनजातीय कार्य मंत्रालय ने राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासनों को सामुदायिक वन अधिकारों (सीएफआर) की सुरक्षा और मान्यता सुनिश्चित करने के लिए परामर्श जारी किया है, ताकि वन संरक्षण अधिनियम (एफआरए) को अक्षरशः लागू करते हुए जनजातीय पहचान, पारंपरिक शासन प्रणाली और वन संसाधनों तक उनकी सामूहिक पहुंच की रक्षा की जा सके। इसके अलावा, मंत्रालय ने प्रभावी सीएफआर प्रशासन को सुगम बनाने के लिए 2023 में सामुदायिक वन संसाधनों के संरक्षण, प्रबंधन और सतत उपयोग के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

इसके अतिरिक्त, धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (डीए-जेजीयूए) के अंतर्गत राज्य सरकारों को आवश्यक वित्तीय सहायता प्रदान की गई है। इसका उद्देश्य जनजातीय समुदाय के नेतृत्व में वन प्रबंधन योजनाओं की तैयारी और कार्यान्वयन के लिए ग्राम सभाओं और सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन समितियों को मजबूत करना है।

जनजातीय कार्य मंत्रालय ने वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) के कार्यान्वयन की निगरानी करने और लंबित दावों के निपटान में तेजी लाने के लिए समय-समय पर समीक्षा बैठकों के माध्यम से राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासनों के साथ निरंतर संपर्क बनाए रखा है। लंबित दावों की उच्च दर वाले राज्यों को विशेष रूप से लंबित दावों के त्वरित निपटान के लिए विशेष अभियान चलाने का निर्देश दिया गया है। इसके अलावा, मंत्रालय ने राज्य सरकारों को दावों की समयबद्ध जांच और निपटान के लिए ग्राम सभाओं, उप-मंडल स्तरीय समितियों (एसडीएलसी) और जिला स्तरीय समितियों (डीएलसी) की नियमित बैठकें सुनिश्चित करने की सलाह दी है। राज्य स्तरीय निगरानी समितियों (एसएलएमसी) से भी अधिनियम के प्रभावी और कुशल कार्यान्वयन को सुगम बनाने के लिए जमीनी स्तर के मुद्दों की सक्रिय रूप से समीक्षा करने और उनका समाधान करने का आग्रह किया गया है।

यह मामला छत्तीसगढ़ राज्य सरकार से संबंधित था और इसका समाधान हो चुका है। जनजातीय कार्य मंत्रालय वन अधिकार अधिनियम, 2006 की भावना की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन के साथ नियमित परामर्श और समीक्षा बैठकें आयोजित की जाती हैं। समय-समय पर राज्यों को क्षमता विकास कार्यक्रम, तकनीकी सहायता और परामर्श जारी किए जाते हैं। जनजातीय कार्य मंत्रालय प्रगति की निगरानी भी करता है और डीए-जेजीयूए जैसी योजनाओं के तहत लक्षित कार्यक्रमों के माध्यम से राज्यों को सहायता प्रदान करता है।

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