
आईजीएसटीसी की निदेशक डॉ. कुसुमिता अरोरा ने कहा कि यह सम्मेलन प्रमुख हितधारकों यानी सरकारी क्षेत्र की हस्तियों, संरक्षण विशेषज्ञों, अकादमिक अनुसंधानकर्ताओं और उद्योग जगत के विशेषज्ञों को एक साझा मंच पर लाने का प्रयास है।
अपने ‘2+2 प्रोजेक्ट्स’ मॉडल के माध्यम से, आईजीएसटीसी भारत और जर्मनी दोनों के शिक्षाविदों और उद्योग जगत को एकजुट करके विभिन्न क्षेत्रों के बीच की बाधाओं को दूर करता है। यह अनूठा सहयोग सुनिश्चित करता है कि अनुसंधान केवल जर्नलों तक सीमित न रहे, बल्कि सीधे औद्योगिक समाधानों और सार्वजनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर में परिवर्तित हो।
“भारत का जलपुरुष” के रूप में विख्यात डॉ. राजेंद्र सिंह ने उद्घाटन भाषण में सामुदायिक नेतृत्व वाले जल संरक्षण मॉडल और जल संचयन में पारंपरिक ज्ञान पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने नदियों के जीर्णोद्धार, पारंपरिक जलाशयों के पुनरुद्धार और स्थानीय समुदायों को जल संसाधनों के सतत प्रबंधन के लिए सशक्त बनाने के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि जल प्रशासन जन-केंद्रित होना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दीर्घकालिक स्थिरता न केवल इंजीनियरिंग समाधानों पर बल्कि सामाजिक भागीदारी, व्यवहार परिवर्तन और जल संसाधनों के जमीनी स्वामित्व पर भी निर्भर करती है।
इस अवसर पर अपने संबोधन में जीआईजेड के डॉ. विक्रांत त्यागी ने जल संकट और अपशिष्ट जल प्रबंधन संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए वैज्ञानिक और तकनीकी क्रियाकलापों की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने सुरक्षित और सतत जल उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए विकेंद्रीकृत उपचार प्रणालियों, चक्रीय जल अर्थव्यवस्था से जुड़े दृष्टिकोणों और उपचार की उन्नत प्रौद्योगिकियों के एकीकरण के महत्व से अवगत कराया। शिक्षा जगत की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए, उन्होंने इस बात पर बल दिया कि अनुसंधान को प्रयोगशाला नवाचार से आगे बढ़कर बड़े पैमाने पर क्षेत्र-स्तरीय कार्यान्वयन की ओर बढ़ना चाहिए, विशेष रूप से उन शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में जहां जल की गंभीर कमी है।
प्रोफेसर लिगी फिलिप (आईआईटी मद्रास) ने जल स्थिरता के लिए वैज्ञानिक और प्रणाली-आधारित दृष्टिकोणों पर प्रकाश डाला। उन्होंने जल में उभरते नए रसायनों के कारण होने वाले प्रदूषण के निवारण की तात्कालिकता पर बल दिया।
अपने संबोधन में, भारत में जर्मनी के राजदूत महामहिम डॉ. फिलिप एकरमैन ने विज्ञान, सतत विकास और जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन के क्षेत्र में भारत-जर्मनी की बढ़ती साझेदारी पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जल प्रबंधन एक साझा वैश्विक चुनौती है। इसके लिए उन्होंने अनुसंधान, नवाचार और नीतिगत ढांचों में द्विपक्षीय सहयोग के महत्व पर बल दिया। संयुक्त प्रौद्योगिकी विकास और ज्ञान के आदान-प्रदान के प्रति जर्मनी की प्रतिबद्धता पर बल देते हुए, उन्होंने जलवायु अनुकूलन, पर्यावरण प्रौद्योगिकियों और सतत इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्रों में आईजीएसटीसी जैसे मंचों के माध्यम से भारत-जर्मनी सहयोग को मजबूत करने के लिए अपने समर्थन की पुष्टि की।
समापन भाषण देते हुए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के डॉ. अरिंदम भट्टाचार्य ने जलवायु परिवर्तन, तीव्र शहरीकरण और बढ़ती औद्योगिक मांग के संदर्भ में एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन के रणनीतिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि जल संबंधी चुनौतियां बहुक्षेत्रीय हैं और इनके लिए प्रौद्योगिकी, शासन और सामुदायिक सहभागिता को मिलाकर अंतःविषयक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। उन्होंने जमीनी स्तर की चुनौतियों का प्रभावी ढंग से समाधान सुनिश्चित करने के लिए व्यावहारिक अनुसंधान, प्रायोगिक परियोजनाओं और नीतिगत एकीकरण की आवश्यकता पर बल दिया।
इस सम्मेलन ने सतत जल प्रौद्योगिकियों और सुदृढ़ जल शासन ढांचों को आगे बढ़ाने में अंतरराष्ट्रीय सहयोग के महत्व पर जोर दिया। इस सम्मेलन के माध्यम से, आईजीएसटीसी ने स्पष्ट किया कि वह एकीकृत जल प्रबंधन को जलवायु अनुकूलन और स्थिरता मिशनों के अंतर्गत एक प्राथमिकता क्षेत्र मानता है, जिसमें प्रौद्योगिकी विकास, प्रणाली एकीकरण और व्यापक प्रदर्शन परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
आईजीएसटीसी और अन्य द्विपक्षीय मंचों के माध्यम से, डीएसटी का उद्देश्य संयुक्त अनुसंधान पहलों को बढ़ावा देना, उद्योग-अकादमिक साझेदारी को प्रोत्साहित करना और पर्यावरण स्थिरता, जन स्वास्थ्य और दीर्घकालिक संसाधन सुरक्षा का समर्थन करने वाले नवीन जल समाधानों के कार्यान्वयन में तेजी लाना है। चर्चाओं में इस बात पर बल दिया गया कि वैज्ञानिक उत्कृष्टता, सामुदायिक भागीदारी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को संयोजित करने वाले एकीकृत दृष्टिकोण भावी पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण होंगे।
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