Farmers have won, will BJP also win?

राजकुमार सिंह –
साल भर पहले याचक की मुद्रा में देश की राजधानी दिल्ली की दहलीज पर पहुंच कर आंदोलनकारी बन गये किसान कल 11 दिसंबर को विजय दिवस मना कर घर वापसी करेंगे। इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि केंद्र सरकार के तीन विवादास्पद कृषि कानूनों के विरुद्ध पिछले साल 26 नवंबर को जब किसानों ने दिल्ली में प्रवेश न मिलने पर दहलीज पर ही अनंतकाल तक धरने पर बैठ जाने का ऐलान किया था, तब खुद उनके अलावा किसी को यह उम्मीद नहीं थी कि कठोर निर्णय लेने और उन पर अडिग रहने के लिए चर्चित, प्रचंड बहुमत से निर्वाचित नरेंद्र मोदी सरकार कानून वापसी की उनकी मांग कभी मानेगी। सरकार ने आंदोलनकारी किसानों के विभिन्न संगठनों के संयुक्त किसान मोर्चा प्रतिनिधियों से एक नहीं, 12 दौर की बातचीत की, लेकिन हर बार वार्ता तीन कृषि कानूनों की वापसी की शर्त पर ही टूटी। सरकार ने कृषि कानून वापसी से दो टूक इनकार कर दिया था और संयुक्त किसान मोर्चा कानून वापसी से कम पर तैयार ही नहीं था। दोनों पक्षों की हठधर्मिता से उपजी संवादहीनता के बीच ही 26 जनवरी का दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम भी सामने आया तो लगा कि किसान आंदोलन अपना नैतिक दबाव खो रहा है, जिससे सरकार को सख्ती का अवसर मिल जायेगा, पर वही नाजुक मोड़ आंदोलन को नयी धार दे गया।
26 जनवरी के घटनाक्रम के बाद बढ़ते पुलिस दबाव के चलते सूने होते धरनास्थलों पर, गाजीपुर बॉर्डर पर निकले किसान नेता राकेश टिकैत के आंसुओं से, फिर से जुटे किसानों के जज्बे को फिर न मौसम की मार हरा पायी और न ही सरकार। किसानों का यह अहसास और भी गहरा हो गया कि इस बार उनके आंदोलन की हार दरअसल सम्मानजनक जीवन के लिए संघर्ष की हार होगी, जिसका खमियाजा आने वाली पीढिय़ों को भी भुगतना पड़ेगा। इसी अहसास ने किसानों को सरकार की उपेक्षा के साथ ही कोरोना के कहर और मौसम की मार के बीच भी दिल्ली की दहलीज पर डटे रहने का मनोबल दिया। संघर्ष आसान नहीं था, बकौल संयुक्त किसान मोर्चा 700 किसानों की आंदोलनकाल में विभिन्न कारणों से मौत इसका प्रमाण है। इसलिए मानना होगा कि विश्व के सबसे लंबे आंदोलनों में शुमार इस आंदोलन की 380 दिन बाद अपनी शर्तों पर समाप्ति दरअसल एकजुटता और संघर्ष क्षमता के साथ किसानों के विश्वास की जीत भी है। भोलेभाले किसानों ने अपने शांतिपूर्ण, मगर सुनियोजित आंदोलन के जरिये एक मजबूत सरकार से जिस तरह अपनी मांगें मनवायी हैं, उसके विजय दिवस का संदेश बहुत दूर तक जायेगा। लोक के दबाव में अगर तंत्र को झुकना पड़े तो उससे अंतत: लोकतंत्र मजबूत ही होता है, पर मांगों को जस-का-तस मानने में भी पूरा साल गुजार देने वाली सरकार को इसका सकारात्मक फल नहीं मिल पाता, क्योंकि तब तक अविश्वास की खाई बहुत चौड़ी हो चुकी होती है। जनवरी में वार्ताओं के दौरान ही मांगें स्वीकार कर लेने पर जहां सरकार की संवेदनशीलता की चर्चा होती, वहीं नौ दिसंबर को सभी मांगें लिखित रूप में मानने को भी चुनावी डर से उपजी मजबूरी माना जा रहा है।
सच तो यह है कि नयी पीढ़ी तक इस बात पर विश्वास से ज्यादा आश्चर्य करने लगी थी कि बीसवीं शताब्दी में महात्मा गांधी के नेतृत्व में अहिंसक आंदोलन के जरिये उस अंग्रेज सत्ता को भारत से खदेड़ कर आजादी हासिल कर ली गयी थी, जिसके साम्राज्य में सूरज ही नहीं डूबता था। आम आदमी के मन में संघर्ष के टूटते विश्वास को किसान आंदोलन की सफलता मजबूत करेगी कि खासकर लोकतांत्रिक व्यवस्था में, सरकार कितनी भी मजबूत क्यों न हो, जनता की जायज मांगों के लिए संघर्ष की अनदेखी अनिश्िचतकाल तक नहीं कर सकती। यह अलग बात है कि इक्कीसवीं शताब्दी आते-आते बदली जीवन और कार्यशैली में कामकाजी आम आदमी के लिए संघर्ष का रास्ता सहज नहीं रह गया है, और इसी मजबूरी का लाभ व्यवस्था उठाती है। किसानों ने विवादास्पद तीन कृषि कानूनों को अपने जीवन-मरण का प्रश्न मान कर संघर्ष किया तो परिणाम सामने है कि कानून वापसी पर बातचीत से ही इनकार करने वाली सरकार के प्रधानमंत्री ने क्षमा-याचना करते हुए राष्ट्र के नाम संदेश में तीनों कानून वापस लेने की एकतरफा घोषणा की। हर किसी के मन में सवाल होगा कि अचानक सरकार का हृदय परिवर्तन कैसे हो गया? इस स्वाभाविक प्रश्न का उत्तर भी लोकतंत्र की शक्ति में निहित है। कोई सरकार कितने ही प्रचंड बहुमत से क्यों न चुनी गयी हो, समय-समय पर सत्तारूढ़ दल को जनता के बीच आना ही पड़ता है, और तब एक-एक वोट कीमती होता है।
सरकार के हृदय परिवर्तन का रहस्य पांच राज्यों के आसन्न विधानसभा चुनावों में निहित है। पूछा जा सकता है कि आखिर किसान आंदोलन जारी रहते हुए ही बिहार और पश्चिम बंगाल में भी तो विधानसभा चुनाव हुए। बेशक हुए और उनमें से बिहार में भाजपानीत राजग सत्ता बरकरार रखने में सफल रहा, जबकि पश्चिम बंगाल में भी भाजपा की सीटें कई गुणा बढ़ीं, पर मत भूलिए कि कृषि की बदहाली राष्ट्रव्यापी होने के बावजूद किसान आंदोलन का असर पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पूर्वी राजस्थान यानी कि दिल्ली के निकटवर्ती क्षेत्रों में ज्यादा रहा है। इसलिए अब जबकि अगले साल के शुरू में ही पंजाब, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में भी चुनाव होने हैं, किसान आंदोलन के राजनीतिक प्रभाव और परिणाम का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। माना कि पंजाब में भाजपा का बहुत कुछ दांव पर नहीं है, पर हाल तक कांग्रेसी मुख्यमंत्री रहे कैप्टन अमरेंद्र सिंह और शिरोमणि अकाली दल (संयुक्त) से गठबंधन कर वह इस सीमावर्ती राज्य में अपनी गोटियां तो बिछा ही रही है। उत्तराखंड में भाजपा की सरकार है, पर चंद महीने में तीन मुख्यमंत्री बदलने के बावजूद बरकरार रहने के आसार कम ही हैं। सबसे अहम है उत्तर प्रदेश, जो लोकसभा में सर्वाधिक सांसद चुन कर भेजता है। लंबे वनवास के बाद भाजपा वहां सत्ता में लौटी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके विश्वस्त केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह बखूबी जानते हैं कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही निकलता है। नहीं भुलाया जा सकता कि वर्ष 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को अकेलेदम बहुमत दिलवाने में उत्तर प्रदेश की ही निर्णायक भूमिका रही।
माना कि अगले लोकसभा चुनाव 2024 में होंगे, लेकिन अगर 2022 में लखनऊ की सत्ता ही भाजपा के हाथ से फिसल गयी तो दिल्ली किसने देखी है! चुनाव मुद्दों-नारों-जुमलों के साथ-साथ हवा पर भी लड़े जाते हैं, और हवा बनने में देर लगती है, बिगडऩे में नहीं। फिर लगभग 100 विधानसभा सीटों वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा प्रमुख अखिलेश यादव रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी के साथ जिस तरह विजयी समीकरण बनाने में जुटे हैं, उसके खतरे का आकलन चुनाव प्रबंधन में माहिर भाजपा-संघ नेतृत्व से बेहतर कौन कर सकता है? कांग्रेस-बसपा के अलग रहने के बावजूद अखिलेश कई अन्य छोटे दलों से भी गठबंधन कर भाजपा की चुनावी घेराबंदी कर रहे हैं, लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव परिणाम के मद्देनजर निर्णायक भूमिका पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ही मानी जा रही है। उत्तर प्रदेश हो या उत्तराखंड अथवा पंजाब, सरकार द्वारा मांगें मान लिये जाने पर आंदोलन समाप्त कर किसान सब कुछ भुला कर भाजपा समर्थक हो जायेंगे—ऐसी खुशफहमी शायद भाजपा-संघ रणनीतिकारों को भी नहीं होगी, पर हां साल भर से किसान आंदोलन पर सवार हो कर अपनी राजनीतिक-चुनावी रणनीतियां बनाने वाले विपक्षी दलों से बड़ा भावनात्मक मुद्दा चुनाव से ऐन पहले निश्चय ही छिन गया है। पर सिर्फ चुनावी मुद्दा छीनने के लिए, साल भर चले आंदोलन से सरकार की साख पर लगे सवालिया निशान को और गहरा करते हुए समर्पण की मुद्रा में सभी मांगों की लिखित स्वीकारोक्ति की यह राजनीतिक शैली मोदी-शाह की चार कदम आगे रहने की रणनीतिक छवि से फिलहाल तो उलट ही नजर आती है, बाकी तो जनता जनार्दन है।

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