The Ministry of Culture and the Sahitya Akademi jointly organized the birth centenary celebrations and a national seminar for Acharya Shri Dinesh Chandra Joshi in New Delhi.

नई दिल्ली – भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने साहित्य अकादमी, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के सहयोग से आज नई दिल्ली में “संस्कृत और भारतीय संस्कृति के क्षेत्र में आचार्य श्री दिनेश चंद्र जोशी का योगदान” विषय पर जन्मशती समारोह और एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का संयुक्त आयोजन किया। यह कार्यक्रम श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, के वाचस्पति सभागार में संपन्न हुआ।

प्रख्यात संस्कृत विद्वान, जाने-माने शिक्षाविद् तथा संस्कृत भाषा एवं भारत की सांस्कृतिक विरासत के विशिष्ट संवर्धक आचार्य श्री दिनेश चंद्र जोशी की जन्म शताब्दी के अवसर पर इस संगोष्ठी का आयोजन किया गया।

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उद्घाटन सत्र भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के संयुक्त सचिव, श्री समर नंदा के स्वागत भाषण के साथ शुरू हुआ। प्रारंभिक भाषण साहित्य अकादमी के संस्कृत सलाहकार बोर्ड के संयोजक, श्री हरेकृष्ण शतपथी ने दिया।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए, श्री समर नंदा ने उपस्थित जनसमूह को सूचित किया कि भारत सरकार के केंद्रीय गृह और सहकारिता मंत्री, श्री अमित शाह की अध्यक्षता वाली ‘राष्ट्रीय कार्यान्वयन समिति’ ने आचार्य श्री दिनेश चंद्र जोशी के सम्मान में 11 अप्रैल 2026 से 11 अप्रैल 2027 तक पूरे देश में आयोजित होने वाले स्मरणोत्सव कार्यक्रमों, अकादमिक संगोष्ठियों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, प्रदर्शनियों और आध्यात्मिक सभाओं को स्वीकृति दे दी है।

श्री समर नंदा ने कहा कि एक दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्र की घोर कठिनाइयों और सीमित संसाधनों के बावजूद, श्री दिनेश चंद्र जोशी अपनी विद्वत्ता, तपस्या, आध्यात्मिक अनुशासन और अटूट संकल्प के बल पर भारतीय संस्कृति के एक तेजस्वी पथप्रदर्शक के रूप में उभरे। उन्होंने कहा कि उनका जीवन एक शाश्वत प्रेरणा बना हुआ है, जो यह दर्शाता है कि व्यक्ति महान सुख-सुविधाओं से नहीं, बल्कि समर्पण, दृढ़ता और आंतरिक शक्ति से बनता है।

आचार्य दिनेश चंद्र जोशी के भारत की सांस्कृतिक विरासत के प्रति गहरे सरोकार को याद करते हुए, श्री नंदा ने कहा कि आचार्य जी ने ब्रिटिश शासन के दौरान भारत को देखा था और वह उस मनोवैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक हमले को स्पष्ट रूप से समझते थे, जिसने संस्कृत भाषा, गुरुकुल प्रणाली और सनातन संस्कृति की नींव को कमजोर करने का प्रयास किया था। नालंदा विश्वविद्यालय, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्रों के विनाश का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसे कृत्य केवल पुस्तकों और पांडुलिपियों पर हमले नहीं थे, बल्कि ये भारत की आत्मा और उसकी पवित्र ज्ञान परंपरा पर किए गए हमले थे।

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उन्होंने आगे बताया कि आचार्य का यह दृढ़ विश्वास था कि भारत की आध्यात्मिक चेतना की रक्षा के लिए संस्कृत का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। उनके लिए, देशभक्ति महज़ एक भावना नहीं, बल्कि एक पवित्र संकल्प था। अपने पूरे जीवनकाल में, उन्होंने संस्कृत और भारतीय संस्कृति के पुनरुद्धार तथा संरक्षण के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया।

उद्घाटन सत्र में श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति श्री मुरलीमनोहर पाठक सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति भी उपस्थित थे। अध्यक्षीय उद्बोधन साहित्य अकादमी के अध्यक्ष श्री माधव कौशिक ने दिया। श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रोफेसर श्री भागीरथी नंदा ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया।

उद्घाटन सत्र का एक प्रमुख आकर्षण आचार्य श्री दिनेश चंद्र जोशी को समर्पित एक स्मारक डाक टिकट का विमोचन था, जो संस्कृत विद्वत्ता और भारतीय संस्कृति में उनके अमूल्य योगदान की पहचान के रूप में किया गया। इस डाक टिकट का विमोचन संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपराओं के संरक्षण तथा संवर्धन के प्रति इस विद्वान की आजीवन सेवा को दी गई एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय श्रद्धांजलि थी।

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इस संगोष्ठी में तीन अकादमिक सत्र आयोजित किए गए, जो आचार्य श्री दिनेश चंद्र जोशी के योगदान के विभिन्न पहलुओं को समर्पित थे।

पहला सत्र “आचार्य श्री दिनेश चंद्र जोशी: वैदिक संस्कृति के एक महान संवर्धक” पर केंद्रित था, जिसकी अध्यक्षता रमाकांत पांडे ने की। इस सत्र में प्रकाश पंत, कीर्ति वल्लभ शाक्ता और अनिल कुमार ने शोध पत्र प्रस्तुत किए।

दूसरे सत्र में “आचार्य श्री दिनेश चंद्र जोशी: पौराणिक विरासत, आध्यात्मिक चेतना और तीर्थयात्रा संस्कृति के एक अग्रणी संवर्धक” विषय पर विचार-विमर्श किया गया। इस सत्र की अध्यक्षता बिहारी लाल शर्मा ने की, जिसमें राम विनय सिंह, राधे श्याम गंगवार और सर्वेश कुमार तिवारी ने प्रस्तुतियाँ दीं।

तीसरे सत्र में “आचार्य श्री दिनेश चंद्र जोशी: संस्कृत, संस्कृति और संस्कारों के एक दूत” विषय पर चर्चा की गई। इस सत्र की अध्यक्षता ओम नाथ बिमाली ने की, जिसमें प्रेम शंकर शर्मा, भारतेंदु पांडे और सुनील जोशी ने अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए।

समापन सत्र हरेकृष्ण शतपथी की अध्यक्षता में आयोजित किया गया। समापन भाषण महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय के कुलपति शिवशंकर मिश्र ने दिया। साहित्य अकादमी के उप सचिव एन. सुरेश बाबू ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया।

देश भर से विद्वानों, शिक्षाविदों, संस्कृत साहित्यकारों, शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों ने इस संगोष्ठी में उत्साहपूर्वक भाग लिया और संस्कृत अध्ययन, भारतीय दर्शन तथा सांस्कृतिक विरासत के क्षेत्र में आचार्य श्री दिनेश चंद्र जोशी के योगदान की चिरस्थायी प्रासंगिकता पर विचार-विमर्श किया।

समारोह के आयोजकों ने राष्ट्रीय स्तर पर निरंतर शैक्षणिक और विद्वत्तापूर्ण पहलों के माध्यम से संस्कृत भाषा, साहित्य और भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं को बढ़ावा देने की अपनी प्रतिबद्धता को पुनः दोहराया।

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