After 35 years, the court in Assam acquitted 38 former ULFA leaders in TADA case

गुवाहाटी,21 अगस्त (Final Justice Digital News Desk/एजेंसी)। एक ऐतिहासिक फैसले में गुवाहाटी में एक विशेष टाडा (आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियां) अदालत ने गैरकानूनी यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असोम (उल्फा) के 38 पूर्व नेताओं और सदस्यों को बरी कर दिया. इनमें अरबिंद राजखोवा, अनुप चेतिया, शशधर चौधरी, प्रदीप गोगोई, सुनील नाथ, कल्पज्योति नियोग, राजू बरुआ, मुनिन नोबिस और अनादर ठाकुरिया शामिल हैं.

यह मामला मूल रूप से असम के दिसपुर पुलिस स्टेशन में जबरन वसूली, आतंक फैलाने और अन्य गैरकानूनी गतिविधियों के आरोपों में केस संख्या 1/1991 के रूप में दर्ज किया गया था.

बाद में टाडा केस में बदल दिया गया. मुकदमे की कार्यवाही 2001 में शुरू हुई और लगभग 25 साल तक चली. इसके बाद बुधवार को फैसला आया.

इस मामले के 45 आरोपियों में से उल्फा (स्वतंत्र) कमांडर-इन-चीफ परेश बरुआ सहित तीन अभी भी फरार हैं, जबकि चार अन्य की पिछले कुछ वर्षों में मृत्यु हो चुकी है. फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए उल्फा के पूर्व महासचिव अनूप चेतिया ने कहा, सरकार वैध दस्तावेज पेश नहीं कर सकी, इसलिए हमें बरी कर दिया गया.

हमें न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसा है और आज के फैसले से हमें बड़ी संतुष्टि मिली है. हम लोकतांत्रिक तरीके से देश और जनता की सेवा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. एक और टाडा मामला अभी बाकी है, जिसमें हमारे 11-12 सदस्य शामिल हैं.

उल्फा के पूर्व अध्यक्ष अरबिंद राजखोवा ने आभार व्यक्त करते हुए कहा, हमारे कई साथियों को न्याय की प्रतीक्षा में गंभीर आर्थिक और भावनात्मक कष्टों का सामना करना पड़ा.

आज का फैसला उस लंबे इंतजार का अंत करता है और हम न्याय देने के लिए अदालत का तहे दिल से शुक्रिया अदा करते हैं.

इस बरी होने को असम के राजनीतिक और न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण क्षण के रूप में देखा जा रहा है. इससे तीन दशक से भी अधिक समय पहले उल्फा उग्रवाद के चरम पर शुरू हुआ एक अध्याय समाप्त हो गया है.

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