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हिन्दु नववर्ष के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में माननीया राज्यपाल के अभिभाषण

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dropadi-murmuदिनांक 8 अप्रैल को संध्या 4 बजे न्यूज एजेंसी हिन्दुस्थान समाचार और विष्व संवाद केन्द्र के संयुक्त तत्वाधान में हिन्दु नववर्ष के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में माननीया राज्यपाल के अभिभाषण 

सर्वप्रथम मैं आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक बधाई देती हूँ।
प्रकृति में विद्यमान सभी चराचर चेतन-अचेतन अपने विवेक एवं मान्यतों के अनुसार विभिन्न तिथियों को नव वर्ष उत्सव के रूप में मनाते हैं।
हिंदू नव वर्ष का प्रारंभ चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से माना जाता है। इसे हिंदू नव संवत्सर या नव संवत् भी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा ने इसी दिन से सृष्टि की रचना प्रारम्भ की थी ‘‘चैत्रे मासि जगत् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमेऽहनि’’ (ब्रह्म पुराण)। इसी दिन से विक्रम संवत के नए साल का आरंभ भी होता है। इसे युगादि (उगादि) नाम से भी भारत के अनेक क्षेत्रों में मनाया जाता है।
देखा जा रहा है कि विष्व में अलग-अलग तिथियों एवं अवसरों पर नव वर्ष मनाया जाता है। जहाँ एक जनवरी को अंग्रेजी नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है, वहीं जापानी नव वर्ष पूर्व में 20 जनवरी से 19 फरवरी के मध्य हुआ करता था, लेकिन अब यह दिसम्बर के अंतिम सप्ताह से जनवरी के प्रथम सप्ताह तक मनाया जाता है। इसी प्रकार अन्य देषों में भी अपने-अपने दिन निर्धारित है।
जिस प्रकार ईस्वी संवत् का सम्बन्ध ईसा से है, उसी प्रकार हिजरी सम्वत् का संबंध मुस्लिम जगत और हजरत मोहम्मद से है। किन्तु विक्रम संवत् का संबंध किसी भी धर्म से न होकर सारे विष्व की प्रकृति, खगोल सिद्धांत तथा ब्रम्हाण्ड के ग्रहों एवं नक्षत्रों से है। इसलिए भारतीय काल गणना पंथ निरपेक्ष होने के साथ सृष्टि की रचना एवं राष्ट्र की गौरवषाली परंपराओं को दर्षाती है। इतना ही नहीं, ब्रह्माण्ड के सबसे पुरातन ग्रंथ वेदों में भी इसका वर्णन है।
विक्रमी संवत् का पहला दिन उस राजा के नाम पर प्रारंभ होता है, जिसके राज्य में न कोई चोर हो, न अपराधी हो और न ही कोई भिखारी हौ। साथ ही राजा चक्रवर्ती सम्राट भी हो। सम्राट विक्रमादित्य ने इसी दिन राज्य स्थापित किया था।
प्रभु श्री राम ने भी इसी दिन को लंका पर विजय के बाद अयोध्या में राज्याभिषेक के लिए चुना।
शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात नवरात्र भी इसी दिन से प्रारंभ होता है।
समाज को आर्य मार्ग पर ले जाने हेतु स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने इसी दिन को आर्य समाज की स्थापना दिवस के रूप में चुना।
हजारों वर्ष पूर्व युधिष्ठिर का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ।
भारतीय सांस्कृतिक जीवन का विक्रमी संवत् से गहरा नाता है। भरतीय नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है जिसे विक्रम संवत् का नवीन दिवस भी कहा जाता है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था – यदि हमें गौरव से जीने का भाव जगाना है, अपने अन्तर्मन में राष्ट्र भक्ति के बीज को पल्लवित करना है तो राष्ट्रीय तिथियों का आश्रय लेना होगा। यह दिन हमारे मन में यह उदघोष जगाता है कि हम पृथ्वी माता के पुत्र हैं, सूर्य, चन्द्र व नवग्रह हमारे आधार हैं प्राणी मात्र हमारे पारिवारिक सदस्य हैं। तभी हमारी संस्कृति का बोध वाक्य ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम‘‘ का सार्थक सिद्ध होता है। सदियों पराधीनता की पीड़ाएं हमें झेलनी पड़ी। पराधीनता के कारण जिस मानसिकता का विकास हुआ, इससे हमारे राष्ट्रीय भाव का क्षय हो गया। जिस समाज में भगवान श्रीराम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, नानक व अनेक ऋषि-मुनियों का आविर्भाव हुआ। जिस धराधाम पर परशुराम, विश्वामित्र, वाल्मिकी, वशिष्ठ, भीष्म एवं चाणक्य जैसे दिव्य पुरुषों का जन्म हुआ। जहां परम प्रतापी राजा-महाराजा व सम्राटों की श्रृंखला का गौरवशाली इतिहास निर्मित हुआ, उसी समाज पर शक, हुण, डच, तुर्क, मुगल, फ्रांसीसी व अंग्रेजों जैसी आक्रान्ता जातियों का आक्रमण हो गया और अपनी संस्कृति अपना धर्म एवं अपनी परम्परा का विष पिलाकर हमें कमजोर एवं रुग्ण किया। किन्तु इस राष्ट्र की जिजीविषा ने, शास्त्रों में निहित अमृतरस ने इस राष्ट्र को मरने नहीं दिया।
विक्रमी संवत के स्मरण मात्र से ही विक्रमादित्य और उनके विजय अभिमान की याद ताजा होती है, भारतीयों का मस्तक गर्व से ऊंचा होता है, जबकि ईसवी वर्ष के साथ ही दासता एवं गुलामी की बू आने लगती है।
देश के पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को जब किसी ने पहली जनवरी को नववर्ष की बधाई दी तो उन्होंने उत्तर दिया था- किस बात की बधाई? मेरे देश और देश के सम्मान का तो इस नववर्ष से कोई संबंध नहीं। यही हम लोगों को भी समझना और समझाना होगा। क्या एक जनवरी के साथ ऐसा एक भी प्रसंग जुड़ा है जिससे राष्ट्र प्रेम जाग सके, स्वाभिमान जाग सके या श्रेष्ठ होने का भाव जाग सके?
आइये! स्वदेशी को अपनायें और गर्व के साथ भारतीय नव वर्ष यानि विक्रमी संवत् को ही मनायें तथा इसका अधिक से अधिक प्रचार करें।
नव वर्ष के अवसर पर मैं सभी राज्यवासियों को शुभकामनायें देतु हुए उनकी खुशहाली की कामना करती हूँ। सभी उन्नति करें, उनके चेहरे पर मुस्कान हो। सबकी तरक्की में ही राज्य की तरक्की निहित है।
जय हिन्द!

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