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स्वतंत्रता आंदोलन के नायक – सीहोर के 356 क्रांतिकारियों की शहादत की कहानी

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Sehore martyrdom of the 356 revolutionaries-pib-finaljustice.in Sehore martyrdom of the 356 revolutionaries-pib-finaljustice.in-1 Sehore martyrdom of the 356 revolutionaries-pib-finaljustice.in-2मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 45 किलोमीटर दूर स्थित सीहोर में मकर संक्राति का पर्व गुड़, तिल्ली और मिठास के लिए नहीं बल्कि देश की आजादी के संघर्ष में शहीद हुए 356 अनाम शहीदों की शहादत के पर्व के रूप में याद किया जाता है। दरअसल, 13 अप्रैल 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड के ठीक 61 वर्ष पूर्व 14 जनवरी 1858 को सीहोर में 356 क्रांतिकारियों को कर्नल हिरोज ने सिर्फ इसलिए गोलियों से छलनी कर दिया क्योंकि इन देशभक्त शहीदों ने 6 अगस्त 1857 को अंग्रेजी साम्राज्य को ध्वस्त करते हुए तत्कालीन सीहोर कंटोनमेंट में सिपाही बहादुर के नाम से अपनी स्वतंत्र सरकार स्थापित कर ली थी । यह देश की अनूठी और इकलौती क्रांतिकारी सरकार 6 माह तक चली। लेकिन, क्रांतिकारियों के इस सामूहिक हत्याकाण्ड के बाद सीहोर कंटोनमेंट एक बार फिर अंग्रजों के अधीन हो गया। इस लोमहर्षक बर्बर हत्याकांड के बाद शहीदों के महान रक्त से सनी यह जगह मालवा के जलियांवाला के रूप में लोगों के बीच जानी जाती है।भोपाल के स्वराज संस्थान संचालनालय ने सिपाही बहादुर सरकार के नाम से एक किताब का प्रकाशन किया है। पुस्तक में लिखा है, “इस समाधि स्थल के चारों तरफ स्थित इसी मैदान में ही 14 जनवरी 1858 को हत्यारे कर्नल हिरोज ने 356 देशभक्तों को पंक्तिबद्ध खड़ा कर गोलियों से छलनी कर दिया था। दरअसल मेरठ की क्रान्ति का असर मध्य भारत में भी आया और मालवा के सीहोर में चूकि अंग्रेज पॉलीटिकल ऐजेन्ट का मुख्यालय था, लिहाजा यहां के सिपाहियों ने भी विद्रोह कर दिया। लगभग 6 महीने तक सीहोर कंटोनमेंट अग्रेजों से मुक्त रहा। इसी दौरान मध्य भारत के विद्रोहियों को खासकर झांसी की रानी के विद्रोह को कुचलने के लिए बर्बर कर्नल हिरोज को एक बड़े लाव लश्कर के साथ भेजा गया। इन्दौर में सैनिकों के विद्रोह को कुचलने के बाद कर्नल हिरोज 13 जनवरी 1858 को सीहोर पहुंचा और अगले दिन 14 जनवरी 1858 को विद्रोही सिपाहियों को सबक सिखाने की नीयत से उन्हें सीहोर की जीवन सलिला सीवन नदी के किनारे घेर कर गोलियों से भून डाला।” कहते हैं कि सीवन का जल क्रान्तिकारियों के लहू से लाल हो गया और शहीदों की मृत शरीर कई रातों तक वहीं पड़े रहे, बाद में स्थानीय नागरिकों ने इन मृत शरीरों को सीवन नदी के किनारे गड्डे खोदकर दफन कर दिया।

अब पिछले कुछ सालों से हर साल कुछ नागरिक मकर संक्रांति के दिन इन शहीदों को याद करने सीवन नदी के तट पर पहुंचते हैं और उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। हालांकि मालवा के इन अनाम सिपाहियों की बलिदान की गाथा अब भी गुमनामी के दौर से गुजर रही हैl

प्रेम चन्द्र गुप्ता*
सूचना सहायक, पीआईबी, भोपाल

(Source-PIB)

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