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भारत के राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी का राष्ट्र के नाम विदाई संदेश

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प्यारे देशवासियो,

मैं पद मुक्त होने की पूर्व संध्या पर, मेरे प्रति व्यक्त किए गए विश्वास और भरोसे के लिए भारत की जनता, उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों और राजनीतिक दलों के हार्दिक आभार से अभिभूत हूं। मैं उनकी विनम्रता और प्रेम से सम्मानित हुआ हूं। मैंने देश को जितना दिया, उससे कहीं अधिक पाया है। इसके लिए, मैं भारत के लोगों के प्रति सदैव ऋणी रहूंगा।
मैं भावी राष्ट्रपति, श्री राम नाथ कोविंद को बधाई देता हूं और उनका हार्दिक स्वागत करता हूं और उन्हें आने वाले वर्षों में सफलता और खुशहाली की शुभकामनाएं देता हूं।
प्यारे देशवासियो,

हमारे संस्थापकों ने संविधान को अपनाने के साथ ही ऐसी प्रबल शक्तियों को सक्रिय किया जिन्होंने हमें लिंग, जाति, समुदाय की असमान बेडि़यों और हमें लंबे समय तक बांधने वाली अन्य शृंखलाओं से मुक्त कर दिया। इससे एक सामाजिक और सांस्कृतिक विकास की प्रेरणा मिली जिसने भारतीय समाज को आधुनिकता के पथ पर अग्रसर किया।
एक आधुनिक राष्ट्र का निर्माण कुछ आवश्यक मूल तत्वों – प्रत्येक नागरिक के लिए लोकतंत्र अथवा समान अधिकार, प्रत्येक पंथ के लिए निरपेक्षता अथवा समान स्वतंत्रता, प्रत्येक प्रांत की समानता तथा आर्थिक समता पर होता है। विकास को वास्तविक बनाने के लिए, देश के सबसे गरीब को यह महसूस होना चाहिए कि वह राष्ट्र गाथा का एक भाग है।
प्यारे देशवासियो,

पांच वर्ष पहले, जब मैंने गणतंत्र के राष्ट्रपति पद की शपथ ली तो मैंने अपने संविधान का न केवल शब्दशः बल्कि मूल भावना के साथ संरक्षण, सुरक्षा और परिरक्षण करने का वचन दिया। इन पांच वर्षों के प्रत्येक दिन मुझे अपने दायित्व का बोध था। मैंने देश के सुदूर हिस्सों की यात्राओं से सीख हासिल की। मैंने कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के युवा और प्रतिभावान लोगों, वैज्ञानिकों, नवान्वेषकों, विद्वानों, कानूनविदों, लेखकों, कलाकारों और विभिन्न क्षेत्रों के अग्रणियों के साथ बातचीत से सीखा। ये बातचीत मुझे एकाग्रता और प्रेरणा देती रही। मैंने कड़े प्रयास किए। मैं अपने दायित्व को निभाने में कितना सफल रहा, इसकी परख इतिहास के कठोर मानदंड द्वारा ही हो पाएगी।
मेरे देशवासियो,

जैसे-जैसे व्यक्ति की आयु बढ़ती है, उसकी उपदेश देने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। परंतु मेरे पास देने के लिए कोई उपदेश नहीं है। पिछले पचास वर्षों के सार्वजनिक जीवन के दौरान –
भारत का संविधान मेरा पवित्र ग्रंथ रहा है;

भारत की संसद मेरा मंदिर रहा है; और

भारत की जनता की सेवा मेरी अभिलाषा रही है।

मैं आपके साथ कुछ सच्चाइयों को साझा करना चाहूंगा जिन्हें मैंने इस अवधि के दौरान आत्मसात किया हैः
भारत की आत्मा, बहुलवाद और सहिष्णुता में बसती है। भारत केवल एक भौगोलिक सत्ता नहीं है। इसमें विचारों, दर्शन, बौद्धिकता, औद्योगिक प्रतिभा, शिल्प, नवान्वेषण और अनुभव का इतिहास शामिल है। सदियों के दौरान, विचारों को आत्मसात करके हमारे समाज का बहुलवाद निर्मित हुआ है। संस्कृति, पंथ और भाषा की विविधता ही भारत को विशेष बनाती है। हमें सहिष्णुता से शक्ति प्राप्त होती है। यह शताब्दियों से हमारी सामूहिक चेतना का अंग रही है। जन संवाद के विभिन्न पहलू हैं। हम तर्क-वितर्क कर सकते हैं, हम सहमत हो सकते हैं या हम सहमत नहीं हो सकते हैं। परंतु हम विविध विचारों की आवश्यक मौजूदगी को नहीं नकार सकते। अन्यथा हमारी विचार प्रक्रिया का मूल स्वरूप नष्ट हो जाएगा।
सहृदयता और समानुभूति की क्षमता हमारी सभ्यता की सच्ची नींव है। परंतु प्रतिदिन हम अपने आसपास बढ़ती हुई हिंसा देखते हैं। इस हिंसा की जड़ में अज्ञानता, भय और अविश्वास है। हमें अपने जन संवाद को शारीरिक और मौखिक सभी तरह की हिंसा से मुक्त करना होगा। एक अहिंसक समाज ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लोगों के सभी वर्गों विशेषकर पिछड़ों और वंचितों की भागीदारी सुनिश्चित कर सकता है। हमें एक सहानुभूतिपूर्ण और जिम्मेवार समाज के निर्माण के लिए अहिंसा की शक्ति को पुनर्जाग्रत करना होगा।
पर्यावरण की सुरक्षा हमारे अस्तित्व के लिए बहुत जरूरी है। प्रकृति हमारे प्रति पूरी तरह उदार रही है। परंतु जब लालच आवश्यकता की सीमा को पार कर जाता है, तो प्रकृति अपना प्रकोप दिखाती है। अकसर हम देखते हैं कि भारत के कुछ भाग विनाशकारी बाढ़ से प्रभावित हैं जबकि अन्य भाग गहरे सूखे की चपेट में हैं। जलवायु परिवर्तन से कृषि क्षेत्र पर भीषण असर पड़ा है। वैज्ञानिकों और प्रौद्योगिकीविदों को हमारी मिट्टी की सेहत सुधारने, जल स्तर की गिरावट को रोकने और पर्यावरण संतुलन को सुधारने के लिए करोड़ों किसानों और श्रमिकों के साथ कार्य करना होगा। हम सबको अब मिलकर कार्य करना होगा क्योंकि भविष्य में हमें दूसरा मौका नहीं मिलेगा।
जैसा कि मैंने राष्ट्रपति का पद ग्रहण करते समय कहा था, कि शिक्षा एक ऐसा माध्यम है जो भारत को अगले स्वर्ण युग में ले जा सकता है। शिक्षा की परिवर्तनकारी शक्ति से समाज को पुनर्व्यवस्थित किया जा सकता है। इसके लिए हमें अपने उच्च संस्थानों को विश्व स्तरीय बनाना होगा। हमारी शिक्षा प्रणाली द्वारा रुकावटों को सामान्य घटना के रूप में स्वीकार करना चाहिए और हमारे विद्यार्थियों को रुकावटों से निपटने और आगे बढ़ने के लिए तैयार करना चाहिए। हमारे विश्वविद्यालयों को रटकर याद करने वाला स्थान नहीं बल्कि जिज्ञासु व्यक्तियों का सभा स्थल बनाया जाना चाहिए। हमारे उच्च शिक्षा संस्थानों में रचनात्मक विचारशीलता, नवान्वेषण और वैज्ञानिक प्रवृत्ति को बढ़ावा देना होगा। इसके लिए विचार-विमर्श, वाद-विवाद और विश्लेषण के जरिए तर्क प्रयोग करने की जरूरत है। ऐसे गुण पैदा करने होंगे और मानसिक स्वतंत्रता को बढ़ावा देना होगा।
हमारे लिए, समावेशी समाज का निर्माण विश्वास का एक विषय होना चाहिए। गांधीजी भारत को एक ऐसे समावेशी राष्ट्र के रूप में देखते थे, जहां आबादी का प्रत्येक वर्ग समानता के साथ रहता हो और समान अवसर प्राप्त करता हो। वह चाहते थे कि हमारे लोग एकजुट होकर निरंतर व्यापक हो रहे विचारों और कार्यों की दिशा में आगे बढ़ें। वित्तीय समावेशन समतामूलक समाज का प्रमुख आधार है। हमें गरीब से गरीब व्यक्ति को सशक्त बनाना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारी नीतियों के फायदे पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।
एक स्वस्थ, खुशहाल और सार्थक जीवन प्रत्येक नागरिक का बुनियादी अधिकार है। खुशहाली मानव जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। खुशहाली समान रूप से आर्थिक और गैर-आर्थिक मापदंडों का परिणाम है। खुशहाली का लक्ष्य सतत विकास के उस लक्ष्य के साथ मजबूती से बंधा हुआ है जो मानव बेहतरी, सामाजिक समावेशन और पर्यावरणीय स्थिरता का मिश्रण है। गरीबी मिटाने से खुशहाली में भरपूर तेजी आएगी। सतत पर्यावरण से धरती के संसाधनों का नुकसान रुकेगा। सामाजिक समावेशन से प्रगति के फल सभी को सुलभ होंगे। सुशासन से लोग पारदर्शिता, जवाबदेही और सहभागी राजनीतिक संस्थाओं के माध्यम से अपना जीवन संवार पाएंगे।
मेरे देशवासियो,

राष्ट्रपति भवन में मेरे पांच वर्षों के दौरान, हमने एक मानवीय और खुशहाल टाउनशिप का निर्माण करने का प्रयास किया। हमने खुशहाली देखी जो प्रसन्नता और गौरव, मुस्कान और हँसी, अच्छे स्वास्थ्य, सुरक्षा की भावना और सकारात्मक कार्यों से जुड़ी हुई है। हमने हमेशा मुस्कुराना, जीवन पर हँसना, प्रकृति से जुड़ना और समुदाय के साथ शामिल होना सीखा। और इसके बाद, हमने अपने अनुभव का विस्तार पड़ोस के कुछ गांवों में किया। यात्रा जारी है।
प्यारे देशवासियो,

जबकि मैं विदा होने के लिए तैयार हो रहा हूं, मैं 2012 के स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के अपने प्रथम संबोधन में जो कहा था, उसे दोहराता हूं:‘इस महान पद का सम्मान प्रदान करने के लिए, देशवासियों तथा उनके प्रतिनिधियों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए मेरे पास पर्याप्त शब्द नहीं है, यद्यपि मुझे इस बात का पूरा अहसास है कि लोकतंत्र में सबसे बड़ा सम्मान किसी पद में नहीं बल्कि हमारी मातृभूमि, भारत का नागरिक होने में है। अपनी मां के सामने हम सभी बच्चे समान हैं, और भारत हम में से हर एक से यह अपेक्षा रखता है कि राष्ट्र-निर्माण के इस जटिल कार्य में हम जो भी भूमिका निभा रहे हैं, उसे हम ईमानदारी, समर्पण और हमारे संविधान में स्थापित मूल्यों के प्रति दृढ़ निष्ठा के साथ निभाएं।’
कल, जब मैं आपसे बात करूंगा तो राष्ट्रपति के रूप में नहीं बल्कि, आपकी तरह एक ऐसे नागरिक के रूप में बात करूंगा, जो महानता की दिशा में, भारत की प्रगति के पथ का एक यात्री है।
धन्यवाद,

जयहिंद ।

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(PIB)

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