Home हरियाणा मत्स्य पालन व्यवसाय कृषि के साथ-साथ समेंकित व्यवसाय का अनूठा उदाहरण है

मत्स्य पालन व्यवसाय कृषि के साथ-साथ समेंकित व्यवसाय का अनूठा उदाहरण है

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3-अप्रैल, 2015
चण्डीगढ़, 23 अप्रैल- मत्स्य पालन व्यवसाय कृषि के साथ-साथ समेंकित व्यवसाय का अनूठा उदाहरण है। मत्स्य पालन, कृषि, डेयरी तथा मुर्गीपालन के साथ बड़ा उपयोगी व्यवसाय है। कृषि के साथ झींगा मछली पालन कर किसान आर्थिक रूप से स्वावलंबी बन सकते हैं। प्रदेश में इस समय करीब 6.2 लाख हैक्टेयर भूमि खारे पानी से ग्रस्त है। इसका उपयोग सफेद झींगा पालन के लिए किया जा सकता है। यह खारेपन से ग्रस्त भूमि का सदुपयोग के साथ-साथ अच्छी आय प्राप्त करने का उत्तम साधन है। यदि तकनीकी ज्ञान से इसका पालन किया जाए तो आज का युवा इससे एक बहुत अच्छी आय प्राप्त कर सकता है। क्या है सफेद झींगाः सफेद झींगा मूलरूप से मेक्सिमन प्रजाति है जो प्रशांत महासागर में मेक्सिकों से पेरू तक पाई जाती है। इसका व्यस्क गहरे समुद्री पानी में पाया जाता है तथा लारवा व किशोर अवस्था समुद्र के किनारे व साथ लगते मुहानों में पाया जाता है। इसका रंग धुंधला सफेद होता है। इसका पालन 0.5 पीपीटी से 45 पीपीटी तक के खारेपन में किया जा सकता है। अतः यह अंतेर्दशिय पालन के लिए अति उपयोगी है। यह 15-33 सेल्सियस तापमान को सहन कर सकता है तथा 23-30 सेल्सियस तापमान तक अच्छी वृद्धि करता है। इस प्रकार से यह प्रजाति हरियाणा में करीब 9 माह तक वृद्धि कर सकती है। कहां से प्राप्त करें बीजः लवणीय भूमि तथा भू-जल में सफेद झींगा का पालन किया जा सकता है। इसके लिए मिट्टी व पानी की जांच मत्स्य विभाग से करवाई जानी आवश्यक है। इसका बीज व खुराक भारत के तटीय प्रदेशों जैसे आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु व गुजरात आदि से प्राप्त किया जा सकता है। तालाब के पानी में ऑक्सीजन की कमी न हो इसके लिए एरिमेटर लगाये जाते हैं। तालाब के पानी में विभिन्न प्रकार के मापदंड जैसे पीएच, खारापन, कार्बन डाईआक्साइड, आक्सीजन, नाइट्रईट, नाइट्रेड, फास्फेट, सल्फर, कैल्शियम, मैगनीशियन क्षरिमता आदि की जांच की भी निरंतर आवश्यकता पड़ती है। कैसे तैयार होता है झींगा उत्पादनः सफेद झींगा पालन के लिए तालाब निर्माण, ट्यूब्वैल, जनरेटर, जाल, पीवीसी पाईप, डीजल इंजन व बिजली के उपकरण खरीदने पर जो खर्चा आता है उसका 50 प्रतिशत सरकार द्वारा मत्स्य विभाग के माध्यम से किसान को सब्सिडी के रूप में दिया जाता है। तालाब में इसके बीज का संचय 50 प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से किया जाता है। इसकी फसल 100 से 120 दिनों में तैयार हो जाती है। इसका प्रति झींगा वजन 20-25 ग्राम हो जाता है। मादा झींगा नर से ज्यादा बढ़ती है। इसके बाद इसकी फसल को जाल लगाकर या तालाब का पानी निकालकर निकाली जाती है। पकड़ा गया झींगा की पैकिंग पिसी हुई बर्फ के साथ हवाबंद डिब्बों में की जाती है जिनको परिवहन करके मंडी तक बिक्री के लिए पहुंचाई जाती है। झींगा उत्पादन का खर्च व आमदनीः एक हैक्टेयर जल क्षेत्र में किसान द्वारा तालाब निर्माण, ट्यूब्वैल लगाने व मोटर इत्यादि, हार्सपावर के पैडल व्हील एरिमेटर, 35 केवी जरनेटर, बिजली उपकरण पीवीसी पाईप, 5 हॉर्सपावर इंजन, चौकीदार कमरा, तालाब की तैयारी, झींगा के बीज भी कीमत व खुराक की कीमत, डीजल व बिजली खर्च, प्रोबामोटिकस व अन्य खर्चे के रूप में अनुमानित कुल खर्च 25 लाख रुपये आता है। उन्होंने बताया कि जबकि किसान 100-120 दिनों की अपनी झींगा की फसल प्रति हैक्टेयर जलक्षेत्र में से अनुमानित दस हजार किलोग्राम प्राप्त कर सकता है। झींगा पालन अपने झींगा के उत्पाद को बाजार भाव 300-350 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से बेचकर 3-4 लाख रुपये कमा सकता है। सरकार द्वारा दिया जाता है अनुदानः सरकार द्वारा इस व्यवसाय को अपनाने के लिए बेरोजगारों को कई प्रकार के अनुदान प्रदान किए जाने के प्रावधान है। नए तालाब खुदाई के लिए तीन लाख रुपए प्रति हैक्टेयर की दर से ऋण प्रदान किया जाता है जिसमें सामान्य जाति के व्यक्तियों को 60 हजार रुपए तथा अनुसूचित जाति व जनजाति के व्यक्तियों को 75 हजार रुपए का अनुदान भी दिया जाता है। तालाब सुधार के लिए 75 हजार रुपए प्रति हैक्टेयर का ऋण दिया जाता है जिसमें सामान्य जाति के व्यक्तियों को 15 हजार रुपए तथा अनुसूचित जाति व जनजाति के व्यक्तियों को 18 हजार 750 रुपए का अनुदान दिया जाता है। उन्होंने बताया कि मछली पालन हेतू खाद्य खुराक के लिए प्रति हैक्टेयर 50 हजार रूपए का ऋण दिया जाता है जिसमें सामान्य जाति के व्यक्तियों को 10 हजार रुपए तथा अनुसूचित जाति व जनजाति को 12 हजार 500 रुपये का अनुदान दिया जाता है।

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