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गांव की माटी की सुगंध

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 वर्षो बाद मैं अपने गाँव जाने की तैयारी कर रहा थाvyang

आज कल मै बहुत खुश था कि काॅलेज की परीक्षाएँ खत्म हो चुकी थी। वर्षो बाद मैं अपने गाँव जाने की तैयारी कर रहा था। लगभग दो वर्ष का था, तो पिताजी द्वारा शहर लाया गया था। शहर में पिताजी सरकारी मुलाजिम है। माँ मै और भाई पिताजी के साथ शहर में रहते हैं| पिताजी कभी-कभार गाँव जाया करते हैं। मुझे कभी गाँव जाने का मौका मिला नही। लेकिन मैने भी जिद ठान ली थी कि इस बार मैं गाँव जाऊँगा। वह दिन अब नजदीक आ रहा था गाँव कैसा होता है? गाँव की मिटटी कैसी होती है? फसल कैसे होते है? लहलहाती फसल को देखने की इच्छा मन में बार-बार बलवती हो रही थी। कब गाँव जाऊँ,कब गाँव पहुँचू? हालांकि माँ और पिताजी की इच्छा नहीं थी कि मैं गाँव जाऊँ। इसका कारण यह था कि पिताजी बता रहे थे कि गाँव में नक्सलियों ने  पाँव पसार दिए है। इसलिए गाँव जाना ठीक नहीं होगा। किसी अनहोनी आशंका से माँ भी डरी हुई थी। लेकिन मेरी गाँव देखने की इच्छा प्रबल थी। मेरी जिद के आगे दोनो को झूकना पड़ा और मुझे गाँव जाने की इजाजत देनी पड़ी। मैं गाँव जाने के लिए अपने समान बाँध रहा था। मेरा दोस्त रावण आ पहुँचा। आकर पूछा रामखेलावन भैया कहाँ जा रहे है? मै उससे बोला-गाँव जा रहा हूँ। तो वह बोला कुछ ला दिजिएगा। हाँ-हाँ ला देगें मैं बोला। वह मुझे बस स्टैण्ड तक छोडने आया। बस जब खुल पड़ी, तब वो वापस लौटा।

देखते-देखते बस ने शहर के सरहद को पार कर दिया। कुछ ही देर बाद चारो ओर हरे-भरे जंगल दिखाई देने लगे। लगभग सात-आठ घंटे के सफर के बाद बस गाँव पहुँची। जहाँ बस रूकी थी वहाँ से गाँव चार-पाँच किलोमीटर दूर था। मैं पूछ-पूछकर अपने गाँव पहुँचा। दादा-दादी मुझे देखकर बहुत खुश हुए। उन्हे सहसा विश्वास नहीं हुआ कि मैं वही दो वर्ष का रामखेलावन पाण्डे हूँ, जो अब गबरू जवान बन गया है। मै भी अपने दादा-दादी से मिलकर बड़ा खुश था। रात में खाने पर बातचीत हुई,सभी के बारे में पूछताछ हुई सोने के समय दादा ने कहा बेटा गाँव आए हो घर के बाहर इधर-उधर बिना किसी को बोले हुए मत जाना। जमाना थोड़ा खराब है। बिस्तर पर लेटते ही मुझे नींद आ गई सबेरा कब हुआ पता ही नहीं चला। सबेरे नित्य क्रिया से निवृत होकर मैं गाँव घुमने के उद्धेश्य से निकला, जो देखता मुझे वो संदिग्ध नजरों से देखता मुझसे मेरा नाम व पता पूछता। चूँकि मेरे दादाजी गाँव के सेवानिवृत शिक्षक थे। इसलिए हर कोई उन्हें जानता था। मै अपने चाल में गाँव के वातावरण से गैरवाकिफ इधर से उधर घुमता रहा। जब वापस घर पहुँचा तो दादा-दादी परेशान, आते ही सवाल दागा बिना बोले कहाँ चल गए थे। जानते नहीे गाँव का वातावरण बदल गया है। यह गाँव पहले वाला गाँव नहीं है| यहाँ सब-कुछ बदल गया हैं। इस गाँव में नक्सलियों ने पाँव फैला दिया है। वक्त बेवक्त वो चले आते हैं। और इसलिए बिना बोले गाँव में घुमना-फिरना नही। आप ये क्या बोल रहे हैं दादाजी? मैं तो गाँव को नजदीक से समझने आया था, मैं बोला।

मुझे रहते अभी दो दिन भी नहीं हुआ था कि नक्सलियो का एक दस्ता गाँव पहुँचा। सारे गाँव वालो को चैापाल पर बुलाया। दस्ते के आदमियों ने गाँव के ही एक आदमी को पकड़कर चैापाल पर खड़ा कर दिया। उसके हाथ पीछे बाँध दिए गए। वही जनअदालत लगाई गई। इस दौरान दस्ते के हथियार-बंद लोग गाँव के आस-पास पहरे देते नजर आए। चप्पे-चप्पे पर उनके आदमी फैले हुए नजर आते थे। जिस व्यक्ति को उन्होने पकड़ रखा था, सजा के तौर पर उसे पच्चीस लाठी मारने का हुक्म सुनाया गया। वो बेचारा गिड़गिड़ाता रहा, मैं पुलिस मुखबिर नहीं हूँ लेकिन उसकी सुनने वाला वहाँ कौन था? लाठियों की मार से वो अधमरा हो गया। उसकी चित्कार ने पूरे गाँव वालो को सहमा दिया वहाँ का दृश्य देखकर मेरी हालत खराब हो गइ, वहाँ से मैं खिसकना चाहा, तभी दस्ते के एक सदस्य की नजर मुझ पर पड़ी। उसने मुझे पकड़ा बोला तुम तो यहाँ के लगते नहीं कहीं तुम पुलिस मुखबिर तो नहीं और उसने मुझे पकड़कर चैापाल पर खड़ा कर दिया। अब शुरू हुआ मुझसे पूछताछ का सिलसिला। मेरे बारे में गाँव वालो से पूछा गया। मेरे बारे में तो गाँव वाले जानते नहीं थे| उन्होने मुझे पहचानने से इंकार कर दिया। मैं अपना परिचय देता रहा| मगर किसी को मेरी बातों में यकिन नहीं हुआ। यह मेरा दुर्भाग्य था कि उस दिन मेरे दादा-दादी किसी प्रायोजन में भाग लेने दूसरे गाँव गए थे। मेरी बातों का विश्वास दिलाने वाला कोई नहीं था।

दस्ते के लोग मुझे पकड़कर अपने साथ लेते चले गए| वे मुझसे मेरे बारे में जानने की कोशिश करते। मेरे गठीले बदन को देखकर उन्हें मेरे बात में विश्वास ही नहीं होता कि मै पुलिस वाला नहीं हूँ। उन्हें शक था कि मैं पुलिस वाला हूँ। मुझे हर समय ऐसा लगता कि वे मुझे मार डालेगें। एक दिन दस्ते का कमाण्डर मुझसे पुछताछ कर रहा था। मै परेशान होकर बोल उठा हे भगवान मुझे किस चक्कर में डाल दिए मेरी बातो को सुनकर दस्ते का कमाण्डर बोला कि तुम भगवान को कितने दिन से जानते हो वह हमारे हिट लिस्ट में है उसने हमारे कितने आदमियो को पकड़ा है। मै घबड़ा कर बोला कौन भगवान, दस्ते का कमाण्डर बोला वह यहाँ का थाना इंचार्ज है| अब हमें पूरा यकिन हो गया कि तुम पुलिस वाले हो| मैं बहुत मुश्किल से उन्हें समझा पाया कि मै ऊपर वाले भगवान को याद कर रहा था| मै थाना इंचार्ज भगवान को नही जानता| उन्हें बहुत मुश्किल से मेरी बातो पर यकिन हुआ था। उनके साथ इस तरह सात दिन बीत गए।

एक दिन दस्ते वाले मुझे लेकर मेरे गाँव गए उन्हें मेरे बारे में पता चल चुका था कि मैं कौन हूँ? शायद उन्होने अपने स्तर से मेरे बारे में खोजबीन की थी। वे मुझे गाँव के पास छोड़कर चले गए। मैं वहाँ से सीधे अपने घर पहुँचा। मुझे देखकर दादा-दादी बहुत खुश हुए। गाँव में बात फैल चुकी थी। इसलिए मेरे आने की खबर सुनकर मुझे देखने के लिए सभी मेरे घर पर इकठठे हो गए। यह मामला पुलिस की भी जानकारी में आ गया था। मेरे घर पहुँचने की खबर पुलिसवालों को भी लग गई थी। उस इलाके का दारोगा अपने पुलिसवालों के साथ घर आ धमका। दस्ते के बारे में पूछताछ करने के बहाने उठाकर थाने ले आया। थाने में मुझसे दस्ते के सदस्यों के बारे में पुछताछ की जाने लगी। दस्ते के अडडो के बारे में मुझसे जानकारी पूछी जाने लगी कि वे मुझे अपने किस-किस ठिकाने में ले गए। जब मैं उनको यह बताता की मुझे जानकारी नहीं है, तो उन्हें यकिन नहीं होता। उसके बाद मुझे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाने लगा। उनके व्यवहार से घबड़ा कर मै बोला हे राम जी आपने मुझे किस मुसीबत में डाल दिया मुझे बचाओ यह सुन दरोगा चैाका और बोला तुम राम जी को जानते हो बताओ उसके बारे में तुम क्या-क्या जानते हो इसका मतलब है कि तुम भी दस्ते के सदस्य हो मै घबड़ाया और बोला कौन राम जी दरोगा बोला वही रामजी जिसका तुम नाम ले रहे थे वो दस्ते का एरिया कमाण्डर है| अब तुम्हे जेल जाना ही पड़ेगा नहीे तो रामजी के बारे में सच-सच बताओ कि उसका ठिकाना कहाँ-कहाँ है? मै घबड़ाकर दरोगा से बोला कि मै उस रामजी को नही जानता| मै तो भगवान रामजी का बात कर रहा था दारोगा को मेरी बातो पर यकिन नही हो रहा था वो मुझे जेल भेजने की धमकी देने लगा। यह तो मेरी किस्मत अच्छी थी कि मेरे दादाजी के पहुँच के कारण मैं थाने से छूटा। अगर मेरी जगह कोई और होता तो शायद ही छूट पाता और न जाने उस पर कितने दफा लग गए होते।

थाने से छूटने के बाद मैं सीधा गाँव से शहर की ओर भागा| मैं भूल गया गाँव की मिटटी की खुशबू, लहलहाती फसलों,चहचहाती पक्षियों की आवाज और शायद हमेशा के लिए अपने गाँव को।

– दिलीप सिंह

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